आम लोगों के बीच बोलने को लेकर हम ज्यादा सावधान हो गए हैं: राजकुमार हिरानी

By: | Last Updated: Friday, 29 January 2016 12:06 PM
We have become careful about what we say: Rajkumar Hirani

नई दिल्ली: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहिष्णुता के मुद्दे पर अपने विचार प्रकट करने पर बॉलीवुड से जुड़े लोगों को लगातार निशाना बनाए जाने पर निर्देशक राजकुमार हिरानी ने कहा कि आम लोगों के बीच अपनी बात रखने को लेकर हस्तियां ज्यादा सावधान रहने लगी हैं. हाल के दिनों में आमिर खान, शाहरूख खान और करन जौहर को असहिष्णुता की बहस पर अपने विचारों को रखने के कारण काफी आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा था.

जब ‘पीके’ के निर्देशक हिरानी से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरे के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि जनता के बीच शब्दों के प्रयोग को लेकर वह ज्यादा सावधान रहने लगे हैं. उन्होंने कहा, ‘‘ हर फिल्मकार, हर व्यक्ति अब ज्यादा सावधानी से बोलता है क्योंकि वे इस बात को लेकर चिंतित रहते हैं कि उनके बयान को ना जाने किस तरह से पेश किया जाएगा और यदि उसे गलत संदर्भ में पेश किया गया तो फिर सोशल मीडिया पर उसे लेकर भयानक किस्म की बयानबाजी शुरू हो जाएगी.’’
निर्देशक राजकुमार हिरानी ने कहा कि हर मत का कोई ना कोई प्रतिमत अवश्य होता है. लेकिन अब झकझोर के रख देने वाली प्रतिक्रियाओं को देने की प्रवृत्ति बढ़ रही है और सोशल मीडिया पर यह विकराल रूप धारण कर लेती है.

उन्होंने कहा कि हर मत का संतुलित प्रतिमत होता है, यह ठीक है. लेकिन यदि प्रतिमत संतुलित ना हो तब क्या होगा. उन्होंने कहा कि इस बात का क्या मतलब है, ‘‘आपने यह बात कही है, मैं आपको पाकिस्तान भेज दूंगा.’’ हिरानी ने कहा, ‘‘कहां से इसमें यह सांप्रदायिक बातें सम्मिलित हो जाती हैं. मैं तुम्हें थप्पड़ मार दूंगा, ऐसी कोई प्रतिक्रिया नहीं हो सकती और यह सोशल मीडिया पर प्राथमिक तौर पर सामने आ रहा है.’’ उन्होंने चिंता जताई कि इस तरह की नफरत समाज को और बांटेगी.

फिल्मकार राजकुमार हिरानी ने कहा, ‘‘ इंसान के तौर पर हम बलि का बकरा खोजने का प्रयास करते हैं और आरोप एक दूसरे पर मढ़ देते हैं. ऐसा वातावरण बनाया जा रहा है और इसके लिए मैं मीडिया को जिम्मेदार मानता हूं. इसके परिणाम दस साल बाद सामने आएंगे. हम एक ऐसे समाज के निर्माण पर जाकर खत्म करेंगे जहां लोग समुदायों के नफरत करेंगे. यह अभी से शुरू हो चुका है.’’ हिरानी की आखिरी फिल्म ‘पीके’ को इसमें ईश्वर के वर्णन के कारण एक विशेष वर्ग की आलोचनाओं और विरोध झेलना पड़ा था.

उन्होंने कहा, ‘‘ ‘पीके’ के दौरान कुछ लोगों ने सिनेमाघरों में जाकर विरोध प्रदर्शन किया और इसके बारे में टीवी चैनलों को सूचित किया. ऐसे में यदि चैनल वाले नहीं आते तो वह विरोध प्रदर्शन भी नहीं करते.’’ उन्होंने कहा कि उनका मानना है कि एक नीति के तौर पर पत्रकारों को ऐसा कुछ नहीं दिखाना चाहिए यदि यह निजी तौर पर ध्यान खींचने के लिए किया गया है. यदि ऐसी खबरों को थोड़े भी गलत तरीके से रिपोर्ट किया गया तो जहर और घृणा फैलती है. वह इसे सोशल मीडिया में भी देख सकते हैं जो कि पहले नहीं थी. हमें एक नागरिक के तौर पर बदनाम किया जाता है. इस तरह की चीजें नहीं होनी चाहिए.

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