आकार पटेल का ब्लॉग: करारी हार के बाद पार्टी के लिए क्या कर रहे हैं राहुल गांधी?

By: | Last Updated: Saturday, 26 July 2014 10:16 AM

नई दिल्ली: नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनावों में जिस तरह कांग्रेस को बर्बाद कर दिया है क्या राहुल गांधी इसके कारण को समझ पाए हैं? अगर वाकई राहुल ने कांग्रेस की तबाही के इन कारणों को जान लिया है तो कांग्रेस के युवराज के क्रिया-कलापों में इसके लक्षण देखना कठिन ही है.

 

असुरक्षा, असंतोष और काफी हद तक कुछ विद्रोह ने कांग्रेस को संक्रमित कर दिया है. दूसरी तरफ बीजेपी पर मोदी ने अपनी पकड़ को और मजबूत कर लिया है. पर कांग्रेस के नेता कहां है?

 

हाल ही में आई खबरों के मुताबिक राहुल गांधी अपनी बहन प्रियंका और उनके परिवार के साथ छुट्टियां मनाने यूरोप गए थे. कई लोगों का इस खबर पर यह भी कहना है कि कांग्रेस चाहें पक्ष में हो या विपक्ष में मीडिया में उसकी बदनामी ही होती है. लेकिन क्या हम यह उम्मीद कर सकते हैं कि अपनी पार्टी को चुनावी इतिहास में अब तक की सबसे बुरी हार दिलाने के बाद कोई बाली में छुट्टियां मनाने जाए?

 

उन कांग्रेसी नेताओं के लिए जो इस हार से अब तक स्तब्ध हैं उनके लिए यह स्थिति संवेदनशील होती जा रही है. महाराष्ट्र में आगामी विधानसभा चुनाव से इस बात की पुष्टि हो जाएगी कि कांग्रेस वापसी न करने वाली स्थित में है. कांग्रेस की इस अपरिवर्तनीय स्थिति के लिए भाग्य जिम्मेदार नहीं होगा बल्कि पार्टी की वापसी के लिए किसी तरह के सही प्रयास ही नहीं किए जा रहे हैं.

 

पश्चिमी और उत्तरी भारत में पार्टी स्थाई तौर पर विपक्ष की भूमिका में आ चुकी है. पार्टी ने गुजरात में पिछले 30 सालों से कोई चुनाव नहीं जीता है. (अंतिम बार राजीव गांधी ने 1984-85 में क्लीन स्वीप किया था). पार्टी की यही स्थिति मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में है जहां इस साल के अंत तक पार्टी को कोई चुनाव जीते हुए 15 साल पूरे हो जाएंगे वहीं दो बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार में भी कांग्रेस की स्थिति अलग नहीं है. जबकि भारतीय जनता पार्टी ने इन राज्यों में खुद को शानदार तरीके से वापसी की है.

 

तमिलनाडु और बंगाल में भी कांग्रेस बीजेपी से पिछड़ चुकी है. महाराष्ट्र में, जहां पार्टी ने इतिहास में केवल एक बार हार देखी है वहां भी इस साल होने वाले चुनावों में पार्टी के खाते में हार लिखी जा सकती है. यही स्थिति दिल्ली में भी है.

 

यह कांग्रेस के लिए एक देशव्यापी संकट है और इससे उबरने के लिए उसे दशकों तक निरंतर, ध्यान केंद्रित करके कड़ी मेहनत की आवश्यकता होगी. लेकिन जैसा कि मैंने कहा, क्या कोई संकते मिल रहे हैं कि राहुल गांधी कहीं कुछ ऐसा काम कर रहे हैं?

 

कुछ हफ्तों पहले राहुल गांधी यह मांग कर रहे थे कि कांग्रेस नेता को लोकसभा में विपक्ष का नेता बनाया जाए. वह ऐसा चाहते ही क्यों हैं? सचमुच, मुझे यह समझ नहीं आ रहा. कांग्रेस इस पोस्ट को लेकर करेगी भी क्या? राहुल गांधी राजनीति और पार्टी में इतनी कम दिलचस्पी रखते हैं कि किसी प्रक्रियात्मक काम के अलावा उनकी इस मांग को समझना थोड़ा कठिन है. राजनीति में उनकी अरूचि का अंदाजा संसद में उनकी उपस्थिति से लगाया जा सकता है.

 

अगर मोदी विपक्ष नेता का पद कांग्रेस को देने के लिए मान भी जाएं (जो कि कल्पना से परे है) और इस औपचारिक पद को कांग्रेस पार्टी को गिफ्ट भी कर दें, तो भी इससे गांधी परिवार के रवैये में कुछ बदलाव नहीं होगा.

 

कांग्रेस के सैकड़ों प्रत्याशियों में से हर एक ने चुनावों में करोड़ो रूपये खर्च किए और हार गए. इनमें से कई नेताओं की तो जमानत भी जब्त हो गई. जिन नेताओं ने राजनीति को गंभीरता से किया है वे पार्टी नेतृत्व को लेकर गुस्से में हैं. वे सोच रहे होंगे कि क्या हारने के कारणों पर ज्यादा खर्च करना सही है या नहीं.  उन्हें इस बात के लिए आश्वस्त करने की आवश्यकता होगी कि कांग्रेस को पुनर्जीवित किया जा सकता है और इसकी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. यह सिग्नल उन्हें सिर्फ राहुल गांधी से मिल सकता है और हमें अभी तक कोई ऐसा संकते नहीं मिला है जिससे पता चले कि ऐसा हो रहा है.

 

भारतीय राजनीति में नेतृत्व क्षमता के लिए प्रखर समझ की नहीं बल्कि सिद्धान्तों और इरादों की जरूरत होती है. केवल दो बातें जरूर होती हैं- उत्साह और कड़ी मेहनत.

 

राहुल गांधी ने काम को लेकर अब तक कोई उत्साह और इच्छा नहीं दिखाई है. मैंने इसी हफ्ते टीवी पर एक बहस के दौरान यह बात कही और कांग्रेस के प्रवक्ता इस पर नाराज हो गए. उनका कहना था कि गांधी ने चुनाव प्रचार के दौरान कई सारी रैलियां की थीं. (जैसे कि वह अपने पार्टी पर कोई एहसान कर रहे हों). शायद उन्होंने किया हो, लेकिन हम यह जरूर कह सकते हैं कि जितनी मोदी ने की उसका आधा ही किया होगा. 

 

लोकसभा चुनावों में बाजी मारने के लिए मोदी ने कोई बहुत शानदार आइडिया या जादू की छड़ी लेकर नहीं आए थे. चुनाव प्रचार के दौरान विश्वसनीय और तटस्थ शिक्षाविदों द्वारा ‘गुजरात मॉडल’ की आलोचना की गई थी. यह मोदी के दृढ़ निश्चय, दृढ़ संकल्प और अथक परिश्रम का नतीजा था कि उन्हें जबरदस्त सफलता मिली.

 

चुनाव के इस खेल में मोदी ने ऐसे प्रतियोगी की तरह दिखे जैसे कि जैसे उनकी इसमें कुछ हिस्सेदारी है ना कि गांधी परिवार की तरह, जो कि अपनी हार में ही संतुष्ट लग रहे थे. कांग्रेसी जिस तरह बर्ताव कर रहे हैं उससे मुझे मुगलों के पतन का दौर याद आता है. वो अपने हाथियों को बेचकर खुश थे. परिवार का बचा खजाना जाता देख भी उन्हें उतनी ही खुशी होती थी. ऐसा बस तभी तक चलता रहा जबतक वो धीरे-धीरे वीरान हो रहे महलों में राजे-रजवाड़ों  का तमगा अपने ऊपर लगाए थे.

 

(आकार पटेल मशहूर लेखक और स्तंभकार हैं. आकार की किताब ‘Why I Write’पब्लिश हो चुकी है. भारत पर लिखी गई उनकी किताब ‘Low Trust Society’ रैंडम हाउस द्वारा पब्लिश की गई है.)

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