ब्लॉग: नीतीश के नाम पर क्यों मानेंगे लालू ?

By: | Last Updated: Thursday, 7 August 2014 9:12 AM

नई दिल्ली: नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू के नेता और कार्यकर्ता तो यही चाहते हैं कि बिहार के अगले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही हों. वैसे भी नीतीश अपनी पार्टी के सबसे बड़े नेता भी हैं और पार्टी में उनके नाम के आगे कोई दूसरा दावेदार भी नहीं है. लेकिन लालू से गठबंधन के बाद अब सब आसान नहीं रह गया है.

 

लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद लालू और नीतीश अस्तित्व बचाने के लिए साथ आए हैं. 21 अगस्त को 10 विधानसभा सीटों के लिए जो उपचुनाव होने हैं उसमें दोनों पार्टियों में बराबरी का तालमेल हुआ है. दोनों पार्टियां 4-4 सीटों पर चुनाव लड़ रही है दो सीटें कांग्रेस के लिए छोड़ी गई है. दोनों दलों के नेता लगातार ये कह रहे हैं कि 2015 के विधानसभा चुनाव में भी गठबंधन बना रहेगा. लेकिन नेता को लेकर न तो नीतीश कुछ बोले हैं और ना ही लालू ने पत्ते खोले हैं. मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने जो कहा है कि गठबंधन को बहुमत मिला तो नीतीश ही मुख्यमंत्री होंगे. मांझी के इस बयान को इसलिए अहम माना जा सकता है क्योंकि वो बिहार के मुख्यमंत्री हैं.

 

ऐसा माना जा सकता है कि नीतीश ने मांझी के जरिये अभी से अपने नाम के लिए माहौल बनाना शुरू कर दिया. खुद नीतीश ने जब बिहार के सीएम पद से इस्तीफा दिया था तब भी ये कहा था कि 2015 में जब बहुमत मिला तो वो मुख्यमंत्री बनेंगे. लेकिन तब आरजेडी से तालमेल की बात नहीं थी. अब जब आरजेडी से तालमेल हो चुका है तो परिस्थितियां पहले जैसी नहीं रह गई है. वैसे भी बिहार में छवि को छोड़ दें तो हर लिहाज से लालू नीतीश पर बीस ही पड़ते हैं. इस साल के लोकसभा चुनाव में लालू की पार्टी को 20.1 फीसदी वोट मिले और 4 सीटों पर जीत मिली. 27 में से सिर्फ एक उम्मीदवार की जमानत जब्त हुई.

 

 ज्यादातर उम्मीदवार दूसरे नंबर पर रहे. जबकि नीतीश की पार्टी 38 सीटों पर लड़ी और सिर्फ दो सीट ही जीत सकी. ज्यादातर सीटों पर नीतीश के उम्मीदवार तीसरे नंबर पर रहे और जमानत तक नहीं बचा सके. राज्य में नीतीश की पार्टी को 15.8 फीसदी वोट मिले. विधानसभा में नीतीश की पार्टी के अभी 117 विधायक हैं जबकि लालू की पार्टी के मात्र 21 विधायक हैं. नीतीश को इतनी सीटें जब मिली तब उनका बीजेपी के साथ गठबंधन था.  बिहार में यादव और मुस्लिम लालू का आधार वोट रहा है.

 

 

14 फीसदी यादव और 18 फीसदी मुस्लिम वोट बैंक पर लालू की अच्छी पकड़ है. जबकि नीतीश का वोट बैंक अब खिसक चुका है. जिस कुर्मी कोइरी वोटबैंक को आधार माना जाता था उसमें से 6 फीसदी कोइरी वोटर खिसक चुके हैं . 5 फीसदी कुर्मी और करीब 20 फीसदी अति पिछड़े वोट (अति पिछड़ों का एक हिस्सा बीजेपी के साथ )के साथ नीतीश बिहार की राजनीति में तीन नंबर पर जा चुके हैं. अति पिछड़ी जाति के जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाकर नीतीश ने इस वोट बैंक को जोड़े रखने की कोशिश की है.

 

लोकसभा चुनाव से पहले नीतीश मुस्लिम वोट की भी उम्मीद लगाए बैठे थे लेकिन हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण के बाद मुस्लिमों वोटों का ध्रुवीकऱण लालू के पक्ष में हो गया और नीतीश की झोली खाली रह गई. विधानसभा चुनाव में नीतीश को इसका बेहतर अंदाजा होगा कि सवर्ण, वैश्य और दलित वोट के साथ कोइरी और अति पिछड़ों का एक बड़ा हिस्सा उनके साथ नहीं रहने वाला. अकेले कुर्मी और अति पिछड़ों के आधार पर नीतीश कुछ कर नहीं पाएंगे. इगो के चलते बीजेपी के पास जा नहीं सकते इसलिए ही लालू से दोस्ती उनकी मजबूरी भी थी. हालांकि नीतीश को ये पता है कि लालू से दोस्ती का खामियाजा उनको भुगतना पडेगा.

 

 

पुराने और संघर्ष के दिनों के साथी तो दूर जा ही रहे हैं. जंगल राज के ताने भी सुनने और सहने होंगे. नेतृत्व के स्तर पर इगो दिखेगा सो अलग. लालू और नीतीश एक मंच से प्रचार कैसे करेंगे. लालू तो मुख्यमंत्री की रेस में नहीं हैं लेकिन नीतीश के अंडर में राबड़ी कैसे काम करेंगी. सबसे ज्यादा परेशानी कार्यकर्ताओं को होगी. लंबे समय से दोनों दलों के कार्यकर्ताओं के बीच अदावत रही है. दोनों के कार्यकर्ता दबंग माने जाते हैं लिहाजा एडजस्टमेंट की परेशानी बनी रहेगी. सीट बंटवारे को लेकर जो दिक्कत आएगी सो अलग.

 

लालू-राबड़ी राज में जेडीयू के कई ताकतवर नेता मारे गए थे मंत्री लेसी सिंह के पति बूटन सिंह, पूर्व सांसद अश्वमेघ देवी के पति प्रदीप महतो जैसे कई उदाहरण हैं. पूर्व मंत्री राम विचार राय और विधायक राजू सिंह की अदावत भी छिपी नहीं है. ऐसे में आरजेडी कार्यकर्ताओं के साथ इनकी कितनी और कैसे बनेगी कहा नहीं जा सकता. एक मंच पर आने का फायदा भले ही उपचुनाव में मिल जाए लेकिन अगले साल चुनाव तक का सफऱ आसान नहीं रहने वाला. जंगल राज के चोट की बात तो छोड़ ही दीजिए. लालू से गठबंधन के बाद जेडीयू विधायकों का बड़ा ग्रुप उपेंद्र कुशवाहा और पासवान की पार्टी के संपर्क में है. अगले चुनाव से पहले करीब पचास विधायक सुरक्षित भविष्य की तलाश में पाला बदल लें तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए. कुल मिलाकर नीतीश का लालू से समझौता न तो पूर्ण रूप से पार्टी के कार्यकर्ताओं के हित में है और ना ही बिहार के हित में. हां बीजेपी का साथ छोड़ने के बाद लालू की संजीवनी से नीतीश अपनी मौजदूगी जरूर बरकरार रख सकते हैं.

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Web Title: why Laloo Yadav agreed on Nitish kumar for next CM?
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