ओ मारिया  !!!

By: | Last Updated: Friday, 21 February 2014 5:23 PM

बीते डेढ दशक में मैने 3 बार मुंबई पुलिस कमिश्नर पद को लेकर बडा विवाद होते देखा है. 2003 में फर्जी स्टांप पेपर घोटाले की पृष्ठभूमि पर आर.एस.शर्मा को पुलिस कमिश्नर बनाये जाने पर खींचतान हुई थी. उसके बाद विवाद तब हुआ जब पी.एस.पसरीचा को चंद महीने में ही प्रमोशन देकर कमिश्नर हटा दिया गया. कमिश्नर की कुर्सी पर बैठकर मुझे इंटरव्यू देते वक्त वो रो पडे थे- “बेटे जब हटाना ही था तो बनाया क्यों था?” ताजा विवाद राकेश मारिया की नियुक्ति को लेकर हुआ. एक तो सरकार ने करीब 11 महीने देरी से और 2 हफ्तों तक मुंबई को बिना पुलिस कमिश्नर रखने के बाद अपना फैसला लिया, उसपर मारिया की नियुकित के बाद अहमद जावेद और विजय कांबले  नाम के 2 आई.पी.एस. अफसर नाराज हो गये कि महाराष्ट्र सरकार ने पुलिस कमिश्नर चुनते वक्त उनकी वरिष्ठता को नजरअंदाज किया. वैसे अगर सत्यपाल सिंह ने सियासत से जुडने के लिये अपने पद से इस्तीफा न दिया होता तो शायद सरकार और भी कुछ वक्त के लिये कमिश्नर की नियुकित लटकाये रखती.

 

बहरहाल, तमाम तूफानों के बीच राकेश मारिया हॉट सीट हासिल करने में कामियाब हो गये. इसमें कोई दो राय नहीं कि मारिया इस कुर्सी के लिये सबसे उपयुक्त शख्स हैं. एक तो वो मुंबई में पले बढे, शहर को अच्छे से जानते हैं, 1993 के मुंबई बमकांड और 26-11 के आतंकी हमले की जांच में उन्होने अहम भूमिका निभाई और मुंबई क्राईम ब्रांच और आतंकवाद विरोधी दस्ते के प्रमुख के तौर पर भी मारिया का कार्यकाल अच्छा रहा.बतौर रेलवे पुलिस कमिश्नर भी मारिया ने अपनी छाप छोडी. इतना भारी प्रोफाईल होने के बाद लाजिमी है कि देश की आर्थिक राजधानी के पुलिस प्रमुख बनने के बाद उनसे उम्मीदें भी कई हैं.

 

हर नया कमिश्नर अपनी कुर्सी संभालने के बाद अपनी योजनाओं का ऐलान करता है…लेकिन बदनसीबी से उस कमिश्नर का कार्यकाल खत्म होते ही या उसके कार्यकाल के दौरान ही ये तमाम योजनाएं पानी के बुलबुले की तरह फूट जातीं हैं. जरूरत है कि मारिया नई घोषणाओं के पहले पिछले कमिश्नरों की योजनाओं की समीक्षा करें और जो अच्छी हैं उन्हें जारी रखें, बेहतर बनाएं. महिला सुरक्षा, वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा, थाने में नागरिकों से अच्छा बर्ताव, सडक पर पुलिस की गश्त वगैरह को लेकर हर नया कमिश्नर तरह तरह के ऐलान करता है, मारिया ने भी वही किया. ये सभी बातें सिर्फ मुंबई ही नहीं भारत के तमाम पुलिस महकमों के लिये अहमियत रखतीं हैं…लेकिन मुंबई पुलिस के लिये इन सबसे आगे भी एक चुनौती है.

 

 

राकेश मारिया ने जिस दौर में अपना पुलिसिया करियर शुरू किया, उस वक्त अंडरवर्लड शहर पर हावी था. अंडरवर्लड कमोजर हुआ और उसकी जगह आंतकवाद मुंबई पुलिस के लिये नई चुनौती बन गया. आतंकवाद का खतरा अब भी बरकरार है, लेकिन एक तीसरा खतरा भी मुंबई शहर को धीरे धीरे अपनी चपेट में ले रहा है. ये खतरा है शहर में बढते ड्रग्स के कारोबार का. मुंबई में फिर एक बार सत्तर-अस्सी के दशक की तरह ही ड्रग्स संस्कृति हावी हो रही है. ड्रग्स हासिल करना उतना ही आसान होता जा रहा है जितना बनिए की दुकान से नमक, शक्कर खरीदना. ड्रग्स की लत युवाओं को गिरफ्त में ले रही है. नशीले पाउडर को खरीदने की खातिर युवा गुनाहों को अंजाम दे रहे है. मुंबई में झपटमारी बढने के पीछे ये एक बहुत बडा कारण है. युवा घर में भी चोरी करने लगे हैं और लत पूरी करने के लिये पैसे न मिलने हिंसा का सहारा लेते हैं. ड्रग्स का ये गैरकानूनी कारोबार सीधे सीधे सामाजिक ताने बाने पर हमला कर रहा है, समाज को असुरक्षित बना रहा है और समाज के भविष्य को नष्ट कर रहा है.

 

सवाल ये है कि ड्रग्स का कारोबार फिर से मुंबई पर हावी हुआ कैसे? जाहिर है अरबों का ये कारोबार बिना पुलिस महकमें और दूसरी सरकारी एजेंसियों की मदद से नहीं चल सकता. मारिया को सबसे पहले इन आस्तीन के सांपो का गला दबाना होगा.

 

मारिया के पास कोई जादुई छडी नहीं है, लेकिन जैसी की उनकी इमेज रही है, इस चुनौती से निपटना उनके लिये कठिन नहीं होना चाहिये. मारिया के पास 2 साल से ज्यादा का कार्यकाल है, जिसके दौरान वो मुंबई को ड्रग्स मुक्त शहर बना सकते हैं, शहर को बचा सकते हैं.

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