बिहार में सूखा, फसल बचाना मुख्य चुनौती

By: | Last Updated: Saturday, 21 September 2013 1:06 AM

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पटना: सावन-भादो
का महीना गुजर गया, लेकिन
बिहार की धरती इस बार उतनी
नहीं भीगी, जितनी जरूरत फसलों
के लिए रहती है.
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कई जिलों में किसानों ने
रोपनी तो कर ली, लेकिन अब उनके
सामने फसलों को बचाने की
चुनाती है.
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मानसून की दगाबाजी के बाद
बिहार सरकार ने राज्य के 38
जिलों में से 33 को सूखाग्रस्त
घोषित कर दिया है और सूखे से
निपटने के लिए केंद्र सरकार
से 12,000 करोड़ रुपये की मांग की
है.
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राज्य के रोहतास, बांका, अरवल,
किशनगंज और अररिया जिले को
हालांकि अभी सूखाग्रस्त
घोषित नहीं किया गया है.
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इस वर्ष मानसून जब आया तो
शुरुआती बारिश से किसानों की
खुशी का ठिकाना न रहा.
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आस बंध गई कि इस बार मानसून
दगा नहीं देगा, मगर महीना
बीतते-बीतते खेतों में नहीं,
बल्कि उम्मीद पर पानी फिर
गया.
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यहां के किसान अब अपनी नियति
को कोसने के लिए विवश हैं.
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राज्य के आपदा प्रबंधन विभाग
के प्रधान सचिव व्यास जी कहते
हैं कि बारिश की कमी के कारण
राज्य में खरीफ की रोपनी कम
हुई, अब तक 88 प्रतिशत ही बुआई
हुई है.
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राज्य में एक जून से लेकर 11
सितंबर तक 668.6 मिलीमीटर बारिश
हुई जो औसत से 223.6 मिलीमीटर कम
है.
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इस वजह से भूजल स्तर में भी
गिरावट आई है.
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वैसे बिहार में मानसून की
बेरुखी कोई नई बात नहीं है.
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वर्ष 2009 में 26 और 2010 में 28 जिलों
को सूखाग्रस्त घोषित किया
गया था.
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आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2010
में 25 लाख 60 हजार 389 टन धान और दो
लाख 32 हजार 764 टन मक्का के
उत्पादन की क्षति हुई थी.
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वैसे बिहार में एक ओर जहां
सूखे से फसलों को क्षति होती
है, वहीं पटना, बेगूसराय,
मुजफ्फरपुर, सुपौल, सहरसा,
गोपालगंज जैसे बिहार के करीब
20 ऐसे जिले भी हैं, जहां बाढ़
से भी फसलों को काफी नुकसान
पहुंचता है.
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कृषि विभाग के आंकड़ों के
अनुसार पिछले चार वर्षो के
दौरान राज्य में करीब 130 करोड़
रुपये की फसलें बाढ़ से तबाह
हो चुकी हैं.
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वर्ष 2009 में 47 लाख हेक्टेयर
में लगी फसल को बाढ़ के कारण
नुकसान हुआ था, जबकि वर्ष 2010
में 10 लाख हेक्टेयर में लगी
फसल को नुकसान हुआ था.
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वर्ष 2011 में 43 लाख हेक्टेयर
में लगी फसल बाढ़ के कारण
बर्बाद हो गई थी, जबकि 2012 में 1.07
लाख हेक्टेयर में लगी फसल
बाढ़ की भेंट चढ़ गई थी.
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राज्य के औरंगाबाद के किसान
रामचंद्र दूबे कहते हैं कि
किसानों को मौसम ने ऐसा दगा
दिया है कि रोपनी के बाद भी घर
में अनाज आने की उम्मीद कम है.
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खेतों में दरारें पड़ी हुई
हैं और किसान परेशान हैं,
क्योंकि पूरी मेहनत पर पानी
फिर गया है.
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कृषि विभाग का अनुमान है कि
इस वर्ष राज्यभर के किसानों
को 45 अरब रुपये का नुकसान
होगा.
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वैसे, कृषि वैज्ञानिकों का
कहना है कि बारिश नहीं होने
के कारण इस बार धान के
उत्पादन में 36 लाख टन की कमी
हो सकती है.
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अगर लागत बढ़ती है तो जाहिर
है, घाटा और बढ़ेगा.
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राज्य के कृषि मंत्री
नरेंद्र सिंह भी मानते हैं कि
राज्य में खेतों में लगी फसल
को बचाना मुख्य चुनौती है.
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इस वर्ष 34 लाख हेक्टेयर भूमि
पर धान की रोपनी का लक्ष्य
रखा गया है.
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वह कहते हैं कि सरकार किसानों
को पटवन के लिए डीजल में
सब्सिडी दे रही है. इसके
अलावा और कई राहत की योजनाएं
चलाई जाएंगी.<br /><br />
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Web Title: बिहार में सूखा, फसल बचाना मुख्य चुनौती
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