विजय विद्रोही की त्वरित टिप्पणी...भ्रष्टाचार पर किसने की राजनीति ?

By: | Last Updated: Friday, 21 February 2014 12:34 PM

पिछले तीन सालों से देश में संसद से सड़क तक भ्रष्टाचार की ही चर्चा है . अन्ना के आंदोलन में जनलोकपाल लाओ , घोटालेबाजों को जेल भिजवाओं का नारा लगता था . इसी आंदोलन से सत्ता तक पहुंचे  अरविंद केजरीवाल ने तो अपनी 49 दिन पुरानी दिल्ली की सरकार ही जनलोकपाल के मुद्दे पर कुर्बान कर दी . बीजेपी ने मनमोहनसिंह सरकार के दौरान हुए सीडब्लूजी , टू जी और कोलगेट के घोटालों पर जमकर कांग्रेस को घेरा . बीच बीच में राज्यों के भ्रष्टाचार की खबरें भी सामने आती रही . चाहे मामला कर्नाटक में बीजेपी के येदुरप्पा का हो या महाराष्ट्र में आदर्श सोसाइटी का ( जिसमें कांग्रेस के चार चार मुख्यमंत्रियों पर आरोप लगे ) ….भ्रष्टाचार का मुद्दा चुनावी मुद्दा भी बना . हमने कर्नाटक में बीजेपी की सरकार को जाते देखा , हिमाचल में भी धूमल सरकार की विदाई हुई , दिल्ली में शीला दीक्षित सरकार को जाना ही पड़ा और राजस्थान में अशोक गहलोत सरकार भी रुखसत हुई .

 

कांग्रेस हमेशा नकारती रही कि भ्रष्टाचार का मुद्दा कोई चुनावी मुद्दा नहीं रहता है लेकिन दिल्ली में उनकी हार और उससे ज्यादा केजरीवाल की जीत से राहुल गांधी को तो कम से कम साफ हो गया कि भ्रष्टाचार भी महंगाई के साथ मुद्दा है . राहुल अब चेते . लोकपाल बिल भी आखिरकार 46 साल बाद कांग्रेस की ही सरकार ने पास करवाया लेकिन उसका श्रेय नहीं मिला . भ्रष्टाचार रोकने के छह बिल संसद के अलग अलग सत्र में अटके हुए थे . इस पर न तो कांग्रेस ने ही गंभीरता से ध्यान दिया था और न ही राहुल की ही नजर थी . लेकिन केजरीवाल से पिटने के बाद राहुल गंभीर हुए , तो सरकार भी गंभीर हुई और संगठन भी . जनता के काम समय पर पूरे हों इसके लिए सिटीजन चार्टर बिल , न्यायिक जवाबदेही बिल , भ्रष्टाचार की पोल खोलने वालों की सुरक्षा के लिए व्हीजल ब्लोअर एक्ट , विदेशियों को भी रिश्वत लेने देने पर कानून के दायरे में लाने वाला बिल , सरकारी खरीद में गड़बड़ियां रोकने और पारदर्शिता लाने वाला बिल और भ्रष्टाचार निरोधक एक्ट में संशोधन वाला बिल ….यह छह बिल हैं जिन्हे राहुल ने पास करवाने पर पूरा जोर दिया लेकिन विपक्ष ने इस पर हामी नहीं भरी और संसद का सत्रावसान हो गया . इनमें से कुछ बिल तो लोकसभा में पहले रखे गये थे यानि यह बिल अब खत्म हो गये . कुछ बिल पहले राज्यसभा में रखे गये थे जिनका अस्तित्व बना रहेगा और मई में बनने वाली नई सरकार इन पर फैसला करेगी . लेकिन अब बड़ा सवाल उठ रहा है कि आखिर भ्रष्टाचार पर राजनीति कौन कर रहा है .

 

सबसे पहले बात कांग्रेस की . कांग्रेस लोकपाल के चयन का काम शुरु कर चुकी है . लेकिन उसे समझना चाहिए था कि सिटीजन चार्टर और व्हीजल ब्लोअर एक्ट के बिना लोकपाल अधूरा है . कांग्रेस सरकार अगर यह बात कहती तो अलग ही माहौल बनता और विपक्ष खासतौर से बीजेपी को कम से कम यह दो बिल पास कराने में सहयोग देना ही पड़ता . कांग्रेस को कहना चाहिए था कि विपक्ष आधा अधूरा लोकपाल चाहता है इसलिए वो दो बिलों को अटका रहा है . लेकिन कांग्रेस के रणनीतिकारों ने ऐसा नहीं किया . दूसरी गलती कांग्रेस ने छह बिलों को राहुल गांधी ऐसा चाहते हैं का नारा लगा कर की .

 

अभी बिल पास भी नहीं हुए थे कि राहुल के नौ हथियार का नारा उछाला गया . इसमें वो छह बिल भी शामिल थे . विपक्ष खासतौर से बीजेपी को मौका मिल गया . चुनाव से महज तीन महीने पहले वो किस तरह राहुल के सिर पर सेहरा बंधवाने को तैयार हो सकते थे . अगर कांग्रेस वास्तव में इन बिलों को लेकर गंभीर रही होती तो बिना राहुल का नाम लिए वो विपक्ष के पास सहयोग मांगने जाती . गनीमत है कि राज्यसभा में आखिरी दिन व्हीजल ब्लोअर एक्ट को पास कर दिया गया . इससे मंजूनाथ से लेकर अमित जेठवा जैसे करीब चालीस सूचना के सिपाहियों की आत्मा को शांति मिलेगी जो भ्रष्टाचार के खिलाफ सूचना के अधिकार के तहत सूचनाएं एकत्र कर मुहिम चला रहे थे और मार दिये गये थे . 

 

 

अगर बीजेपी की बात करें तो उसने इन छह बिलों को अटका कर राजनीति की है . अगर भ्रष्टाचार मिटाना ही उसका ध्येय था तो उसे इस बात का क्या फर्क पड़ता था कि बिल राहुल के नाम से लिए जाएं या किसी और नाम से . बीजेपी ने कहा कि भ्रष्टाचार में डूबी सरकार को भ्रष्टाचार के खिलाफ बिल लाने का नैतिक अधिकार ही नहीं है . यह तर्क समझ से परे हैं. यही तर्क फिर लोकपाल बिल पास करवाने के समय बीजेपी ने क्यों लागू नहीं किया . जब राजनाथसिंह यह बयान दे रहे थे उस समय कर्नाटक में मोदी उस येदुरप्पा की गलबहियां कर रहे थे जिन्हे बीजेपी ने ही पार्टी से बाहर निकाला था और जिस मुख्यमंत्री को जेल की हवा खानी पड़ी थी . अगर बीजेपी लोकपाल को लेकर इतनी ही चिंतित है तो उसे आगे आकर सरकार से कहना चाहिए था कि लाइए सिटीजन चार्टर और व्हीजल ब्लोअर एक्ट , हम उसे पास करवाएंगे . लेकिन सा कुछ नहीं हुआ . ऐसा लगा कि बीजेपी को डर सता रहा था कि अगर कांग्रेस राहुल के नाम पर छह बिल पास करवाने में कामयाब हो गयी तो उसे चुनावों में लाभ मिल सकता है . अगर अब यही सोच रही तो कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचार दूर करने से ज्यादा चिंता बीजेपी को अपने सियासी नफे नुकसान का आकलन करने की रही .

 

 

अब बात की जाए केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की . यह वही दल है जो जनलोकपाल दिल्ली विधानसभा में विवादित तरीके से पेश करता है और वोटिंग में हारने पर सरकार छोड़ देता है . इसे महान शहादत की संज्ञा दी जाती है . कहा जाता है कि जनलोकपाल को लेकर 100 क्या हजार बार अपनी सरकार कुर्बान करने को तैयार हैं केजरीवाल . लेकिन जिस समय केजरीवाल अपनी सरकार कुर्बान कर रहे थे उस समय दिल्ली के जंतर मंतर पर , कांग्रेस और बीजेपी के दफ्तरों के आगे कुछ स्वयंसेवी संगठन धरना दे रहे थे . इसमें उन अरुणा राय का संगठन भी शामिल था जिनके पास केजरीवाल ने सूचना के अधिकार के मायने सीखे थे . यह संगठन यही मांग कर रहे थे कि संसद को कम से कम तीन बिल तो पास करने ही होंगे . एक , रेहड़ी पटरी वालों को परमिट देने वाला एक्ट. दो , सिटीजन चार्टर एक्ट और तीन , व्हीजल ब्लोअर एक्ट . हैरानी की बात है कि रेहड़ी पटरी वालों का दिल्ली में केजरीवाल को जमकर वोट मिला है . केजरीवाल खुद ही कहते रहे हैं कि उनकी सरकार ने पुलिस में घूसखोरी के खिलाफ इतना डर बिठा दिया कि रेहड़ी पटरी वालों से रिश्वत नहीं ली जा रही है . लेकिन बिल पास कराने का दबाव डालने के लिए केजरीवाल सड़क पर नहीं उतरे . न ही उनकी आम आदमी पार्टी ही सामने आई . यही हाल बाकी के दो बिलों को लेकर भी रहा . अब केजरीवाल से सवाल पूछा जाना चाहिए कि जनलोकपाल के लिए जान देने का दावा करने वाले क्यों ऐसे समय खामोश हो गये थे .

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