विशेष: एक दौरा ऐसा भी था जब दादा साहेब ने 'रसोइया' को ही बना दिया हिरोइन

विशेष: एक दौरा ऐसा भी था जब दादा साहेब ने 'रसोइया' को ही बना दिया हिरोइन

By: | Updated: 01 Jan 1970 12:00 AM

नई दिल्ली: बात सन् 1891 के 25 दिसंबर की है. मुंबई के अमेरिका-इंडिया थिएटर में एक विदेशी मूक फिल्म 'लाइफ ऑफ क्राइस्ट' दिखाई जा रही थी. धुंडीराज गोविंद फाल्के नामक एक व्यक्ति भी यह फिल्म देख रहा था. उस वक्त फाल्के ने सोचा, क्यों न सिनेमा के माध्यम से भारत की महान विभूतियों के चरित्र को पर्दे पर उतारा जाए और उन्होंने भारत में फिल्म निर्माण की नींव रख दी.


उस विदेशी मूक फिल्म को फाल्के ने कई बार देखा और उनके मन में फिल्म निर्माण का अंकुर फूट पड़ा. आज दुनिया उन्हें दादा साहेब फाल्के के नाम से जानती है. उन्हीं के नाम पर फिल्म कलाकारों को बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रतिष्ठित पुरस्कार दिए जाते हैं.


भारतीय सिनेमा के जनक दादा साहेब का जन्म महाराष्ट्र के नासिक शहर से लगभग 20-25 किलोमीटर दूर यंबकेश्वर में 30 अप्रैल, 1870 को हुआ था. उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा बंबई (मुंबई) में हुई थी. वह सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट के विद्यार्थी रहे.


उन्होंने रंगमंच में भी काम किया था. रंगमंच के अनुभवी कलाकार होने के साथ-साथ वह एक शौकिया जादूगर भी थे. उन्होंने बड़ौदा में कला भवन से फोटोग्राफी का एक पाठ्यक्रम भी किया था.


समय के साथ उनमें फिल्म-निर्माण की ललक इतनी बढ़ गई कि उन्होंने फिल्म निर्माण वाली कितनी ही पत्र-पत्रिकाएं पढ़ डालीं और कैमरा लेकर फोटो खींचने का काम भी शुरू कर दिया. लेकिन फिल्म निर्माण की राह भारतीय सिनेमा के पितामह के लिए इतनी आसान नहीं थी. दादा साहेब जैसे-तैसे कुछ रुपयों का जुगाड़ कर फिल्म बनाने के लिए जरूरी उपकरण खरीदने लंदन पहुंचे.


लंदन में बाइस्कोप सिने साप्ताहिक के संपादक की मदद से उन्होंने कुछ जरूरी सामान खरीदे और 1912 में वापस मुंबई आए. उन्होंने दादर में अपना छोटा-सा स्टूडियो बनाया और 'फाल्के फिल्म्स' के नाम से देश की पहली फिल्म निर्माण कंपनी स्थापित की. आठ महीने की कठोर साधना के बाद दादा साहेब की पहली मूक फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' बनी. इस फिल्म के निर्माण की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है.

दादा साहेब जब भारत की पहली फीचर फिल्म बनाने निकले, तो उनकी पहली समस्या फिल्म की नायिका तलाशने की थी. 1913 में प्रदर्शित 'राजा हरीशचंद्र' में नायिका 'तारामती' की विशेष भूमिका थी. दादा साहेब की इच्छा थी कि नायिका की भूमिका कोई युवती ही करे. इसके लिए पहले उन्होंने नाटक मंडली से जुड़ी अभिनेत्रियों से बात की, लेकिन उस वक्त हमारा समाज ऐसा था कि कोई भी युवती कैमरे के सामने आने को तैयार नहीं हुई. उन्हें डर था कि समाज क्या कहेगा.


यहां तक कि दादा साहेब ने नायिका की खोज के लिए इश्तहार भी बंटवाए, लेकिन नतीजा सिफर रहा. फिर उन्होंने कोठे के युवतियों के पास जाकर फिल्म की नायिका का किरदार निभाने का आग्रह किया, लेकिन वहां भी उन्हें निराशा हाथ लगी.


जब तारामती की भूमिका के लिए कोई युवती नहीं मिली, तो हारकर दादा साहेब ने फैसला किया कि किसी पुरुष से ही तारामती की भूमिका कराई जाए और इसी क्रम में उन्हें एक रेस्तरां का रसोइया पसंद आ गया. उन्होंने रसोइये से बात की. लाख मान-मनौव्वल के बाद वह काम करने को तैयार हो गया.


जब शूटिंग का समय आया, तो निर्माता-निर्देशक फाल्के ने रसोइये से कहा कि शूटिंग के लिए मूछें मुड़वाकर आना. दादा साहब की इतनी बात सुननी थी कि रसोइया चौंक गया. उसका कहना था कि मूंछें तो मर्द-मराठा की शान हैं, इन्हें कैसे हटाया जा सकता है! आखिरकार दादा साहब के लाख समझाने और मनाने के बाद कि 'भला मूंछ वाली तारामती कैसे हो सकती है? वह तो नारी है और नारी की मूंछ नहीं होती. फिर मूंछ का क्या है, शूटिंग पूरी होते ही दोबारा रख लेना!' नायिका बना रसोइया मूंछ साफ कराने के लिए तैयार हुआ. वह रसोइया, जो भारत की पहली 'फीचर फिल्म' की पहली हीरोइन बना, उसका नाम सालुंके था.


इस तरह देश में सिनेमा की शुरुआत हुई. इस फिल्म में अभिनेता, निर्माता, निर्देशक, लेखक, कैमरामैन इत्यादि सबकुछ दादा साहब खुद ही थे. फिल्म में राजा हरीशचंद्र की भूमिका उन्होंने स्वयं निभाई थी. दादा साहब के सबसे बड़े सपने और लगन के पूरा होने का आधा श्रेय उनकी पत्नी को जाता है, जिन्होंने उन्हें हिम्मत बंधाई, यहां तक कि आड़े समय में अपने सारे जेवर गिरवी रख दिए.


इसके बाद दादा साहेब ने मोहिनी भस्मासुर (1913), सावित्री सत्यवान (1914), लंका दहन (1917), श्रीकृष्ण जन्म (1918), कालिया मर्दन (1919), कंस वध (1920), शकुंतला (1920), संत तुकाराम (1921), भक्त गोरा (1923), सेतु बंधन (1932) और गंगावतरण (1937) जैसी कई और पौराणिक फिल्में बनाईं.

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