दिवालियापन विधेयक संसद की संयुक्त समिति के हवाले

By: | Last Updated: Thursday, 24 December 2015 8:42 AM
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नई दिल्ली: आर्थिक सुधार की एक और कोशिश पर राजनीतिक विवादों की छाया पड़ी. कुछ इसी का नतीजा ये रहा कि दिवालियापन से जुड़े विधेयक को संसद की संयुक्त समिति के पास विचार के लिए भेज दिया गया. अब इसका मतलब ये है कि विधेयक अब अगले साल मार्च या उसके बाद ही पारित हो सकेगा.

एक और बात. सरकार ने ये भी साफ कर दिया कि अब ये धन विधेयक नहीं है. यानी बिल पर संसद की मुहर लगे, इसके लिए राज्यसभा की मंजूरी चाहिए ही चाहिए. ध्यान रहे कि धन विधेयक को लोकसभा में पारित कराने के बाद राज्यसभा के आसरे रहने की जरूरत ही नहीं होती. साथ ही अगर राज्यसभा 14 दिनों के भीतर विधेयक पर अपनी सहमति नहीं देती तो विधेयक पारित हुआ माना जाता है. फिर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद ये बन जाता है एक कानून.

कांग्रेस समेत कई दलों के सदस्य चाहते थे कि विधेयक को वित्त मंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थायी समिति के पास भेजा जाए. लेकिन सरकार के उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक, ये आशंका बनी कि कांग्रेस के एम वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता वाली स्थायी समिति विधेयक पर अपनी रिपोर्ट देने में जानबुझ कर देरी कर सकती है. दूसरी ओर लोकसभा से विधेयक पारित करा कर अगर राज्यसभा भेजा जाता है (जहां सरकार अल्पमत में है) तो वहां सेलेक्ट पैनल बनाने की मांग उठ सकती है. लेकिन इस बात के आसार कम ही है कि राज्यसभा के सेलेक्ट पैनल के सुझाव पर नया विवाद खड़ा हो जाए. इसी सब को ध्यान में रखते हुए बीच का रास्ता संयुक्त समिति के रूप में निकला.

अब सवाल उठता है कि जिस विधेयक को सरकार पहले धन विधेयक के तौर पर पेश करने का दावा कर रही थी, उसने यूं टर्न क्यूं लिया. सूत्रों की मानें तो बढ़ते राजनीतिक विवाद का असर बजट सत्र पर नही पड़े, उसी को ध्यान में रखकर ये कदम उठाया गया. सूत्रों ने ये भी बताता कि ये फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बातचीत के बाद ही लिया गया. फिर कांग्रेस के साथ तमाम विपक्षी दलों के नेताओं के साथ बातचीत कर आगे की रूपरेखा तय की गयी.

राजनीतिक सहमति जुटाने की कोशिश के तहत संयुक्त समिति में सरकार ने कांग्रेस की ओर से लोकसभा से अपने दो सदस्यों ( के सी वेणुगोपाल औऱ सुष्मिता देव) को समिति में शामिल करने की मांग मान ली, जबकि सदस्यों की कुल संख्या (कांग्रेस के लोकसभा में 45 सांसद हैं) के हिसाब से एक से ज्यादा सदस्य मनोनित नहीं हो सकता था.

30 सदस्यों वाली संयुक्त संसदीय समिति के मुखिया भाजपा के राज्यसभा सदस्य भूपेंद्र यादव होंगे. ये वही यादव है जिन्हे वस्तु व सेवा कर यानी जीएसटी पर राज्यसभा के सेलेक्ट कमेटी का अध्य़क्ष बनाया गया था. कमेटी ने अपनी रिपोर्ट बिल्कुल तय समय पर सौंप दी. दूसरी ओर यादव की आर्थिक मुद्दों पर अच्छी पकड़ है. साथ ही राजनीतिक मतभिन्नता के बीच भी वो बेहतर तरीके से कमेटी की कार्रवाई संचालित कर सकते हैं. इसी सब को ध्यान में सकते हुए मोदी सरकार ने एक बार फिर उनपर विश्वास जताया. समिति को अपनी रिपोर्ट बजट सत्र के पहले सत्र के पहले सप्ताह के आखिरी दिन देने को कहा गया है.

अब सवाल ये भी उठता है कि दिवालियापन पर नया विधेयक इतना अहम क्यों है और इसी जीएसटी के बाद दूसरा महत्वपूर्ण आर्थिक सुधार क्यों माना जा रहा है? वजह साफ है. देश में अब तक कम्पनी खोलना जितना कठिन माना जाता है, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल कारोबार समेटना है. अब कम्पनी खोलने की प्रक्रिया आसान की जा रही है मसलन, कम्पनी खोलने की अनुमति प्रक्रिया एक दिन में पूरी करने का प्रस्ताव.

दूसरी ओर नए विधेयक के कानून में तब्दील होने के बाद जहां दिवालियेपान को मामले को तय समय सीमा के भीतर निपटाने में मदद मिलेगी, वहीं बीमार कम्पनियों को अपना कारोबार समेटने या सुधारने में आसानी होगी. अभी कम्पनियों के बंद होने या बीमार होने की सूरत में कर्जदारों को अपना पैसा वापस पाने के लिए लम्बी चौड़ी अदालती प्रक्रिया का इंतजार करना पड़ता है जिसमें समय भी काफी लगता है. वहीं बीमार कम्पनियों के प्रवर्तक और कर्मचारियों को भी परेशानी उठानी पड़ती है. उम्मीद है कि प्रस्तावित कानून से सभी परेशानी दूर होगी.

दिवालियापन का मामला सुलझाने में जहां दुनिया के कई देशों में एक साल के करीब और दक्षिण एशिया के कई देशों में ढ़ाई साल के करीब का समय लगता है, वहीं भारत में चार साल से भी ज्यादा समय लग जाता है. फिलहाल, नये विधेयक में प्रावधान किया गया है कि एक कम्पनी के दिवालियेपन के मामले को 180 दिनों में निबटाना होगा. विशेष परिस्थितियों में इसके लिए तीन महीने और समय दिया जा सकता है. इस तरह की व्यवस्था से कारोबारी माहौल सुगम करने के मामले में भारत की रैंकिंग सुधारने में मदद मिलेगी.

विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, दिवालियापन से निबटने के मामले में भारत 189 देशों में 136 वें स्थान पर है (वैसे सभी मानकों पर कुल मिलाकर हमारी रैंकिंग 130वां है). निश्चित समय सीमा के बीतर दिवालियापन के मामले को निपटाने से देसी-विदेशी निवेशकों के बीच भरोसा बढ़ेगा. कर्जदारों के साथ-साथ कम्पनी के प्रवर्तकों को सहूलियत ये होगी को वो जल्द से जल्द विफल कारोबार से निकल कर नया कारोबार शुरु कर सकेंगे. दूसरी ओर दिवालियापन के क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्ति या संस्थाएं उचित तरीके से काम कर सके. इसके लिए विधेयक में दिवालियापन के मामले में काम करने वाले विशेषत्रों और एजेंसियों के कायदे-कानून के लिए सेबी की तर्ज पर विशेष रेग्युलेटर बनाने का प्रस्ताव है. प्रस्तावित कानून सभी तरह के फर्म और व्यक्तियो पर लागू होगा.

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