राहत की खबर, राजन ने इस बार नहीं चौकाया

By: | Last Updated: Tuesday, 1 December 2015 1:13 PM
monetary policy review

नई दिल्ली: जैसी उम्मीद थी, वैसा ही हुआ. रिजर्व बैंक ने नीतिगत ब्याज दर यानी रेपो रेट (Repo or Repurchase Rate) में कोई बदलाव नहीं किया. पहले की तरह ये दर ये पौने सात फीसदी रहेगी. ध्यान रहे कि रेपो रेट वह दर है जिसपर रिजर्व बैंक बहुत ही थोड़े समय के लिए बैंकों को कर्ज देता है.

 

जनवरी से लेकर अब तक रिजर्व बैंक ने रेपो रेट में सवा फीसदी की कटौती की है. अब आगे क्या और कमी की जाएगी? खुद रिजर्व बैंक कह रहा है कि यह पांच तथ्यों पर निर्भर करेगा:

  • खाद्यान्न और कच्चे तेल समेत तमाम जिंसों की कीमत मे होने वाला फेरबदल

  • सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों पर अमल और उसका मजदूरी और किराये पर असर

  • सरकारी खजाने के घाटे पर लगाम की सरकार की कोशिश

  • छोटी बचत योजनाओं को बाजार दर से जोड़ने का सरकार का प्रस्ताव और

  • डूबे कर्ज को वापस हासिल करने की बैंकों की कोशिश

 

रिजर्व बैंक यह भी कह रहा है कि नीतिगत ब्याज दर में हुई सवा फीसदी की कटौती का आधा यानी 60 बेसिस प्वाइंट्स (बीपीएस) ही बैंकों ने ग्राहकों को दिया है. फिलहाल, रिजर्व बैंक ने साफ किया है कि बैंकों के बेस रेट (ब्याज दर तय करने का आधार, कर्ज इस दर से नीचे पर नहीं दिया जा सकता) के आकलन के नए तरीके को जल्द ही अंतिम रूप दिया जाएगा और सभी बैंकों को इसे अपनाना होगा. इससे नीतिगत दरों में की गयी कटौती का ज्यादा से ज्यादा असर कर्ज के ब्याज दर पर देखने को मिलेगा.

 

वैसे राहत की बात ये भी है कि आर्थिक विकास दर (Growth Rate of Gross Domestic Product) और खुदरा महंगाई (Consumer Price Index) दर को लेकर रिजर्व बैंक ने कोई आशंका नहीं जतायी. यह जरूर कहा कि अगले दो महीने कीमतों पर पैनी नजर रखने की जरूरत है, खास कर ये देखते हुए कि मानसून की बिगड़ी चाल और जलाशयों में घटते स्तर से रबी फसलों पर असर पड़ सकता है. दूसरी ओर कच्चे तेल में उबाल की आशंका नही है. अब ऐसे मे केंद्र और राज्य मिलकर रबी फसलों में कमी पर काबू पाने के लिए काम करे तो खुदरा महंगाई दर में स्थिरता की उम्मीद की जा सकती है.

 

दूसरी ओर पूरे आर्थिक विकास दर की बात की जाए तो खेती बाड़ी में संभावनाएं बहुत अच्छी नहीं है. हालांकि मैन्युफैक्चरिग, खास तौर पर भारी मशीनरी और गाड़ियां, में जोरदार तेजी आयी है. लेकिन ग्रामीण इलाको में मांग कमजोर है. निर्यात भी नहीं बढ़ रहा. नतीजा विकास की रफ्तार पर कुछ असर पड़ा. दूसरी ओर सेवा क्षेत्र में स्थिति बेहतर तो हुई है, लेकिन कंस्ट्रक्शन की खासी कमजोर स्थिति ने पूरे सेवा क्षेत्र को प्रभावित किया.

 

बहरहाल, अच्छी बात ये है कि सरकार विकास कार्यों पर ज्यादा खर्च कर रही है. कंट्रोलर जनरल ऑफ अकाउंट्स के ताजा आंकड़े बताते हैं कि कारोबारी साल के पहले सात महीने यानी अप्रैल से अक्टूबर के बीच विकास के काम पर खर्च (Plan Expenditure) बजटीय लक्ष्य के 58 फीसदी से भी ज्यादा रहा. जब सरकार खुद विकास के काम पर ज्यादा खर्च करती है तो उससे निजी क्षेत्र ज्यादा निवेश करने के लिए प्रोत्साहित होता है. अब इन सब के बीच कच्चे माल के दाम कम हो और कारोबारी माहौल सुगम बनाने के लिए प्रयास किए जा रहे हों तो देसी विदेशी निवेशक नई परियोजना (Greenfield Projects) लगाने के साथ पुराने परियोजनाओं के विस्तार (Brownfield Projects) के लिए आगे आएंगे. इन सब को ध्यान मे रखते हुए इस कारोबारी साल यानी 2015-16 के दौरान रिजर्व बैंक ने विकास बढ़ने की रफ्तार 7.4 फीसदी को बनाए रखा है.

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Web Title: monetary policy review
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