रेलवे में बदलाव चाहते हैं लेकिन निजीकरण नहीं: प्रभु

By: | Last Updated: Sunday, 3 May 2015 11:37 AM

नई दिल्ली: सरकारी समिति की सिफारिश के बावजूद रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने रेलवे के निजीकरण को सिरे से खारिज कर दिया है. उन्होंने कहा कि यह हौआ वे लोग खड़ा कर रहे हैं जो किसी प्रकार का बदलाव नहीं चाहते.

 

उन्होंने कहा कि निजीकरण की धारणा भ्रामक संकेत देती है और इसमें किसी का मालिकाना हक किसी दूसरी इकाई या प्रबंधन को हस्तांतरित करने का विचार होता है जो रेलवे में संभव नहीं है.

 

प्रभु ने कहा, ‘‘रेलवे लगातार भारत सरकार के नियंत्रण में बनी रहेगी और सरकार ही इसका प्रबंधन करेगी. हम बदलाव चाहते हैं पर मालिकाना हक में नहीं. हम ऐसा बदलाव नहीं चाहते कि कोई रेलवे की मूल्यवान संपत्ति को चलाये. हम रेलवे के कामकाज में सुधार के लिये निजी निवेश या प्रौद्योगिकी चाहते हैं ताकि रेलवे और मूल्यवान बने.’’ सरकार द्वारा गठित बिबेक देवराय की अध्यक्षता वाली समति ने घाटे में चल रही रेलवे के निगमीकरण की सिफारिश की है और सुझाव दिया है कि रेल मंत्रालय को केवल नीति निर्माण के लिये जिम्मेदार होना चाहिए और निजी कंपनियों को यात्री, माल ढुलाई का जिम्मा दिया जाना चाहिए. इन सुझावों पर जारी चर्चा के बीच प्रभु ने यह बात कही है.

 

रेलवे पर कैग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारतीय रेलवे अपनी यात्री परिचालन लागत तथा अन्य कोच सेवाओं की लागत को पूरा करने में विफल रही है और 2011-12 में इस मद में 23,643 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.

 

निजीकरण का विरोध किये जाने के कारणों के बारे में पूछे जाने पर सुरेश प्रभु ने कहा, ‘‘दुर्भाग्य से इस प्रकार की शब्दावली एक वैचारिक बहस हैं. यह अनावश्यक और बेमतलब का टकराव है. हमारा मतलब यह है कि हम रेलवे की सेवा गुणवत्ता में सुधार चाहते हैं.’’ उन्होंने कहा, ‘‘इसीलिए सेवा में जो भी गुणवत्ता, प्रौद्योगिकी, बेहतर लाभ लाना चाहते हैं, उसे हमारे पास जो भी संसाधन है, उसके जरिये लाया जाना है. अगर हम अपने स्तर पर इसे कर सकते हैं, हमें करना चाहिए. अगर हम समझते हैं कि हम इसे अपने स्तर पर नहीं कर सकते तब हमें निश्चित रूप से बाहर से पूंजी, प्रौद्योगिकी और एजेंसी लानी चाहिए. लेकिन यह सब मालिकाना हक में हस्तांतरण के लिये जरिये नहीं होना चाहिए.’’

 

प्रभु ने कहा, ‘‘निजीकरण का हौआ वे लोग खड़ा कर रहे हैं जो बदलाव नहीं चाहते.’’ हालांकि, यह प्रदर्शन और सुविधाओं में सुधार के लिये है.’’ जापान द्वारा 650 किलोमीटर प्रति घंटा की स्पीड वाली रेल शुरू किये जाने का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा, ‘‘हम कहां हैं? अगर हमारे पास प्रौद्योगिकी नहीं है तो क्या हमें पीछे रहना चाहिए? हमें आंखें बंद करके नहीं रहना चाहिए. यह संभव नहीं है. इसीलिए हमें उस ओर ध्यान देना चाहिए कि कौन प्रौद्योगिकी दे सकता है, वह हमारा सहयोगी होगा.

 

रेल मंत्री ने कहा, ‘‘हमारे पास धन नहीं है, ऐसे में कोई धन उपलब्ध करा सकता है और वह सहयोगी हो सकता है. इसीलिए रेलवे में प्रौद्योगिकी या धन के लिये निजी क्षेत्र की भागीदारी निजीकरण नहीं है.’’ रेलवे के समक्ष चुनौतियों के बारे में पूछे जाने पर कि प्रभु ने कहा, ‘‘कई चुनौतियां हैं. हमारी मानसिकता भी एक चुनौती है. एक हमारी अपनी आंतरिक सोच है और दूसरे वे लोग हैं जो रेल सेवाएं का उपयोग करते हैं.’’ उन्होंने कहा कि रेलवे एक संयुक्त जिम्मेदारी है और इसका प्रबंधन सरकार और लोग दोनों करेंगे.

 

प्रभु ने कहा, ‘‘अगर आपकी यह सोच बनी रहती है कि आपने टिकट खरीदा और आप गंदगी फैलाते रहेंगे, तब यह नहीं हो सकता. लोगों की अपनी मानसिकता निश्चित रूप से बदलनी चाहिए. यह एक संयुक्त प्रयास है. आप खुद कुछ किये बिना हर समय लगातार यही मांग नहीं करते रह सकते कि मुझे बेहतर सेवायें चाहिये.’’ रेल मंत्री ने कहा, ‘‘इसीलिए सोच बदलना जरूरी है. हम इस मालिकाना हक की सोच को लाना चाहते हैं कि रेलवे सभी का है …’’ यह पूछे जाने पर कि रेलवे अब तक 160 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तो ट्रेन चला नहीं सकी और बुलेट ट्रेन चलाने की योजना बनाई जा रही है, प्रभु ने कहा कि रेलवे को हर क्षेत्र के लोगों की जरूरतों को पूरा करना है लेकिन यह काम दूसरों की लागत पर नहीं होगा.’’ उन्होंने कहा, ‘‘भारत में आपके पास बड़ी संख्या में ग्राहक हैं. कुछ ऐसे हैं जो साधारण क्लास में यात्रा करते हैं और कुछ एसी फर्स्ट क्लास में. कुछ ऐसे भी हैं जो महाराजा एक्सप्रेस जैसी महंगी ट्रेनों में यात्रा करते हैं.’’

 

प्रभु ने कहा, ‘‘कुछ ऐसे भी हैं जो बुलेट ट्रेन चाहते हैं. कुछ लोगों के पास ज्यादा भुगतान की क्षमता है और कुछ के पास ऐसा नहीं है लेकिन वे यात्रा करना चाहते हैं. इसीलिए रेलवे किसी एक खंड का ध्यान रखकर आगे नहीं बढ़ सकता.’’ प्रभु से जब हल्के फुल्के अंदाज में पूछा गया कि कौन सा मंत्रालय उनकी पसंद है, प्रभु ने कहा, ‘‘इसमें पसंद-नापसंद की बात नहीं है, यह प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार है. यह मेरी आठंवीं कैबिनेट जिम्मेदारी है .. किसी ने मुझ से कहा कि रेलवे सिरदर्दी वाला काम है. मैंने कहा हर काम में परेशानी है. यहां तक कि आप को यदि बैंक में काम मिलता है वह भी परेशानी होगी.’’ प्रभु ने कहा, ‘‘जीवन सेवा के लिये है. यदि आप अपनी जीवन यात्रा में लोगों के जीवन में सुधार ला सकते हैं तो यह सबसे बड़ी सेवा है.’

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