थोक बाजार की महंगाई दर के कम रहने के क्या हैं मायने

By: | Last Updated: Monday, 14 September 2015 12:00 PM

नई दिल्लीः अगस्त महीने में थोक बाजार की महंगाई दर शून्य से करीब पांच फीसदी नीचे रही. यह लगातार दसवां महीना है जब दर नकारात्मक दर्ज की गयी. वैसे तो अब थोक बाजार की महंगाई दर से ब्याज दरों की दशा-दिशा तय नहीं होती. फिर भी इस दर के मौजूदा हाल पर सरकार के साथ-सात उद्योग जगत की चिंता बढ़ गयी है.

 

सबसे पहले यह समझना होगा कि महंगाई दर के शून्य के नीचे यानी नकारात्मक बने रहने का मतलब ये है कि कीमतों में कमी आने का सिलसिला कायम है. ऐसी लगातार स्थिति को तकनीकी भाषा में डिफ्लेशन कहते हैं. यह बिल्कुल मुद्रास्फीति यानी इनफ्लेशन के उलटा होता है.

 

यूं समझ लीजिए अगर मुद्रास्फीति में ज्यादा पैसे खर्च कर थोड़ा सा सामान खरीद सकते हैं तो इसके उलट स्थिति में कम दाम पर ज्यादा सामान उपलब्ध होता है. यह सुनने में तो अच्छा लगता है, लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि बाजार में खऱीदार कम हो रहे हैं. ऐसे में कईयों को अपनी दुकान बढ़ाने के सिवा कोई चारा नहीं बचता.

 

अब इस स्थिति का पूरी अर्थव्यवस्था के लिए मतलब क्या होता है? सीधे शब्दों में कहे तो लगातार यदि यह दर शून्य से नीचे रहे तो समझना चाहिए कि अर्थव्यवस्था में मांग घट रही है. अब ऐसे में यदि कम्पनियां ज्यादा सामान तैयार भी करें तो बाजार में खरीदार नहीं होंगे. इससे कम्पनियां अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित नहीं होंगी. नतीजा धीरे-धीरे उद्योग की रफ्तार धीमी पड़ने का खतरा होगा. यह अर्थव्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं. मुख्य आर्थिक सलाहकार अऱविंद सुब्रमणियन इस खतरे को लेकर आगाह कर चुके हैं. अब उद्योग जगत भी चिंतित दिख रहा है और रिजर्व बैंक से आस लगाए हुए है.

 

उद्योग संगठन कऩफेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्रीज यानी सीआईआई के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी के मुताबिक, ताजा आंकड़े इस बात के सबूत हैं कि उद्योग पर अपस्फीति की पकड़ मजबूत होती जा रही है, और यह स्थिति सभी औद्योगिक क्षेत्र में है. बनर्जी का मत है कि चूंकि खुदरा महंगाई दर भी लगातार घट रही है, ऐसे में रिजर्व बैंक को चाहिए कि वह ब्याज दर घटा कर मांग बढ़ाने का काम करे. सीआईआई को उम्मीद है कि रिजर्व बैंक 29 सितम्बर को अपनी कर्ज नीति की समीक्षा करते वक्त नीतिगत ब्याज दर (रेपो रेट यानि वह दर जिस पर रिजर्व बैंक बैंकों को कर्ज देता है) में आधे फीसदी की कमी तो कर ही सकता है. साथ ही इस आशय का संकेत भी दे सकता है कि भविष्य में वो और ज्यादा कमी कर सकता है.

 

ध्यान रहे कि पहले रिजर्व बैंक नीतिगत ब्याज दरों की समीक्षा में थोक बाजार की महंगाई दर को आधार बनाता था, लेकिन अब यह इसके लिए खुदरा महंगाई दर यानी सीपीआई के आधार बनाया जाता है. राहत की बात यह है कि रिजर्व बैंक के लक्ष्य के मुकाबले खुदरा महंगाई दर कम है. सरकार और रिजर्व बैंक के बीच हुए समझौते के मुताबिक, अगले वर्ष जनवरी तक खुदरा महंगाई दर को छह प्रतिशत को नीचे लाना है और अभी यह वैसे भी चार प्रतिशत के नीचे चल रहा है. दूसरे शब्दों में कहें तो ब्याज दर में कमी के लिए आधार तैयार है. लेकिन परेशानी यह है कि मानसून की बिगड़ी चाल से महंगाई दर बढ़ने की आशंका ज्यादा है.

 

बहरहाल, फिक्की की अध्यक्षा ज्योत्सना सूरी की राय यह है कि दुनिया भर में प्रमुख जिंसों के दाम नीचे रहे हैं. ऐसे में आय़ातित महंगाई की आशंका नहीं के बराबर है. वह कहती हैं कि मौजूदा परिस्थिति में रिजर्व बैंक के लिए नीतिगत ब्याज दर में बड़ी कटौती करना उचित होगा. उन्हे विश्वास है कि रिजर्व बैंक और विभिन्न बैंक मिलकर ब्याज दर को नीचे लाने में मिलकर काम करेंगे.

उद्योग संगठन एसोचैम को लगता है कि जब कीमत काबू में हो तो सरकार और रिजर्व बैंक को आर्थिक विकास और मांग को बढ़ावा देने पर ध्यान देना चाहिए. संगठन के अध्यक्ष राणा कपूर चाहते हैं कि रिजर्व बैंक कर्ज सस्ता करना सुनिश्चित करे जिसका एक फायदा यह भी होगा कि ग्राहकों की खरीद की क्षमता बढ़ेगी और इसका सीधे-सीधे असर मांग पर दिखेगा.

 

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