...तो इसलिए राहुल की नजर अब 2019 पर है

By: | Last Updated: Wednesday, 22 January 2014 9:43 AM
…तो इसलिए राहुल की नजर अब 2019 पर है

एक अखबार में खबर छपी है कि राहुल गांधी की नजरें अब 2019 के लोकसभा चुनावहं पर हैं. आलोचक और बीजेपी के नेता कह सकते हैं कि राहुल ने 2014 लोकसभा चुनावहं की प्रक्रिया शुरु होने से पहले ही हार मान ली है. लेकिन इसका दूसरा पहलु यह है कि इस बार के चुनावहं के लिए वह बहुत से नये प्रयोग करना चाहते हैं. वह जनता से पूछ कर घोषणा पत्र बनाना चाहते हैं , वह युवा चेहरों को और ज्यादा मौका देना चाहते हैं, वह गैर राजनीतिक लेकिन कांग्रेस की विचारधारा से जुड़े लोगों को टिकट देना चाहते हैं, वह पूरी की पूरी कांग्रेस को ही बदल देना चाहते हैं .

 

इसकी शुरुआत उन्होने कर भी दी है . राजस्थान और मध्यप्रदेश में युवा चेहरों को प्रदेश की जिम्मेदारी दी है. लेकिन सवाल उठता है कि क्या राहुल के इन प्रयोगों को लागू करवाने के लिए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कितना सहयोग मिलेगा . यह प्रयोग क्या सफल होंगे और सबसे बड़ी बात कि क्या इन प्रयोगों के ही सफल होने से कांग्रेस 2019 में सत्ता में आ जाएगी . यह सवाल इसलिए उठाए जा रहे हैं क्योंकि इससे पहले भी राहुल ने जितने प्रयोग किए वह या तो उतने सफल नहीं हुए या फिर वरिष्ठ नेताओं ने ही इसमें अंड़गे लगा दिए या फिर जमीनी स्तर पर खुद राहुल के लोगों ने ही इन्हे लागू नहीं होने दिया . यहां पिछले चार राज्यों के विधान सभा चुनाव को देखा जा सकता है जहां राहुल ने टिकट देने की जो शर्ते लगाई थी उसमें उन्हे खुद ही शिथिलता बरतनी पड़ी .

 

नया यह है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को पार्टी ने चुनाव अभियान की जिम्मेदारी दी हैं . राहुल ही कांग्रेस की रणनीति और नीति तय करेंगे , वह तय करेंगे कि कांग्रेस का नारा क्या होगा , घोषणा पत्र में किस तरह के वादे किये जाएंगे और वह जनता की मर्जी से कैसे तैयार किया जाएगा . राहुल ही कांग्रेस का अभियान और एजेंडा तय करेंगे . उम्मीदवारों के चयन का काम भी राहुल ही देखेंगे . यानि साफ है कि राहुल ही कांग्रेस का चेहरा होंगे. उनकी ही अगुवाई में 2014 का चुनाव कांग्रेस लड़ेगी. भले ही राहुल को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया गया हो लेकिन तय है कि यूपीए की तिगड़ी बनी तो राहुल ही पीएम होंगे . यह भी तय है कि अगर राहुल अगर चुनाव में जीत हासिल नहीं कर पाए तो हार का ठीकरा कांग्रेस पर फूटेगा. राहुल को तब हम विपक्ष के नेता के रुप में देख सकते हैं जो 2019 के आम चुनाव की तैयारी में लग जाएंगे .

 

लेकिन राहुल इतनी जल्दी हार मानने वाले नहीं दिखते . जिस तरह से उन्होंने दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में भाषण दिया उससे साफ है कि राहुल आर पार की लड़ाई के मूड में हैं . वह जानते हैं कि मनमोहन सिंह के तमाम अच्छे कामों पर महंगाई और भ्रष्टाचार भारी पड़ रहे हैं . लिहाजा उन्होंने अपनी तरफ से , कांग्रेस की तरफ से और देश की महिलाओं की तरफ से प्रधानमंत्री से 12 गैस सिलेंडरों का मांग कर डाली . कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के तीखे तेवर और दिल से निकली आवाज पर उनकी मां और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी मंत्रमुग्ध दिखीं . राहुल ने जीत का मंत्र कांग्रेस को बताया तो पूरा हाल गूंज उठा . जीत के मंत्र का एक हिस्सा यही है कि भ्रष्टाचार रोकने के लिए जो छह बिल संसद के अलग अलग सदनों में अटके हैं उन्हे पास करवाया जाए . यह बिल सिटीजन चार्टर से लेकर व्हीजल ब्लोअर एक्ट से लेकर विदेशियों को भी भ्रष्टाचार निरोधक एक्ट में लाने से जुड़े हुए हैं .राहुल ने करोड़ों देशवासियों की मांग को सामने रखा और सरकार भी तुरंत हरकत में आ गयी .बताया गया कि अगली कैबिनेट बैठक में सब्सिडाइजड गैस सिलेंडरों की संख्या 9 से बढ़ाकर 12 करने के  प्रस्ताव को मंजूरी दी जाएगी . वैसे यह पहला मौका नहीं था जब राहुल ने अपनी ही सरकार से अपनी बात मनवाई हो .  

 

पिछले साल 27 सितंबर को राहुल गांधी अचानक दिल्ली के प्रेस क्लब पहुंच गये थे जहां कांग्रेस मीडिया सेल के प्रमुख अजय माकन मीडिया से बातचीत कर रहे थे और दागियों को बचाने के लिए हड़बड़ी में लाए गये अध्यादेश की तारीफ कर रहे थे. लेकिन राहुल ने आते ही कमान अपने हाथ में ली और कहा कि इस अध्यादेश को कूड़ेदान में फेंक दिया जाना चाहिए . यह तीखा अंदाज , यह तल्ख तेवर , यह आक्रामक तरीका और माथे में सियासी बल . सबको पता चल गया था कि राहुल गांधी ही अब कांग्रेस पार्टी के सुप्रीमो हैं और मनमोहन सिंह सरकार के नये खैरख्वाह हैं . लेकिन कहा जा रहा है कि राहुल ने बहुत देर कर दी . राहुल पिछले नौ सालों से सत्तारुढ़ पार्टी के ऐसे सदस्य रहे हैं जो अपनी सरकार से जो चाहे वह पूरा करवाने का माद्दा रखते हैं . इस दौरान उन्होंने सरकार में शामिल होने से लगातार इनकार किया , शादी तक करने से इनकार किया और प्रधानमंत्री पद को लेकर अरुचि ही दिखाई . हर बार वह सिस्टम को बदलने का बात करते दिखे . लेकिन पिछले दस सालों में सिस्टम बदलने की कितनी कोशिशें उनकी तरफ से हुई इसका कोई ब्यौरा न तो उनकी तरफ से सामने आया और न ही उनकी युवा ब्रिगेड ने ही कुछ कहा . यहां तक कि लोकसभा में भी राहुल आमतौर पर खामोश ही दिखे हैं . 2004 से 2009 के बीच राहुल ने लोकसभा में सिर्फ सात बार संसदीय कार्यवाही में भाग लिया . इसमें तीन अतारांकित सवाल शामिल हैं जिनके जवाब सदन में संबंधित मंत्री नहीं देता है . जवाब घर भेज दिये जाते हैं . दो बार राहुल ने उच्च शिक्षा से जुड़े सवाल पूछे . राहुल ने 24 सिंतबर 2006 को तहलका पत्रिका को दिए इंटरव्यू में इस पर सफाई भी दी थी . उनका कहना था कि आप खुद जरा देखिये कि किस तरह के सवाल संसद में पूछे जाते हैं . आपको खुद अंदाजा लग जायेगा कि मैं सवाल क्यों नहीं पूछता .

 

कहा जाता है कि राहुल को सिंगापुर के यात्रा ने बदल डाला था . जून 2006 में सिंगापुर के दौरे पर गये राहुल वहां के प्रधानमंत्री ली कुआन यी के महेमान थे . वहां राहुल ने एयरपोर्ट , पोर्ट , कालेज और कारखाने देखे. ली कुयान ने विशेष भोज के मौके पर राहुल को राय दी कि जब तक वह देश की जटिलताओं को नहीं समझ लेते और अपनी एक मजबूत टीम नहीं बना लेते तब तक उन्हे सत्ता की कमान अपने हाथ में नहीं लेनी चाहिए . राहुल ने अब अपनी टीम बनानी शुरु की . आज भंवर जीतेन्द्र सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, अशोक तंवर, सचिन पायलट, मिलिंद देवड़ा, हरीश चौधरी, मीनाक्षी नटराजन, दीपेन्द्र सिंह , जितिन प्रसाद, नवीन जिंदल जैसे युवा नेताओं को राहुल ब्रिगेड का हिस्सा कहा जाता है . लेकिन यह ब्रिगेड भी चुनावी राजनीति में पार्टी का विस्तार नहीं कर सकी है. अब तो हालत यह है कि कुछ युवा मंत्री संगठन में लौटना चाहते हैं और अगला लोकसभा चुनाव लड़ने से भी कतरा रहे हैं. राहुल ने इस बीच देश का दौरा भी किया . कहीं दलित के यहां रात काटी , कहीं रोड शो किया , कहीं कॉलेज छात्रों के साथ बातचीत की , कहीं मनरेगा में मिटटी ढोई तो कहीं सड़क किनारे चाय पी . विपक्ष ने इसे राहुल का पोलिटिक्ल टयूरिज्म कह कर मजाक उड़ाया लेकिन राहुल के दौरे जारी रहे .

 

इस सबके बीच सियासी मोर्चे पर राहुल ने एक बहुत बड़ा फैसला लिया. अकेले चुनाव लड़ने का , यूपी और बिहार में आईसीयू में पड़ी कांग्रेस को फिर से जिंदा करने का . राहुल की पहली बड़ी अग्निपरीक्षा 2007 का यूपी विधानसभा चुनाव में हुई. यूपी की 425 सीटों में से कांग्रेस ने 1989 में 94 सीटें जीती थी और उसे 27.90 फीसद वोट मिले थे . 2002 में कांग्रेस को 402 सीटों में से सिर्फ 25 सीटें मिली और वोट प्रतिशत गिर कर 8.96 ही रहा गया . अब राहुल के सामने चुनौती थी . उन्हे संगठन खड़ा करना था , लगातार हार से निराश हताश कार्यकर्ता में जोश भरना था उसे घर से निकालना था . लेकिन राहुल विवादस्पद बयानों में उलझ गये . उन्होंने कहा कि अगर गांधी नेहरु परिवार का कोई सदस्य 1992 में सक्रिय राजनीति में होता तो बाबरी मस्जिद नहीं गिरती . राहुल ने बांग्लादेश पर कहा कि पाकिस्तान का विभाजन उनके परिवार की ही भारत को देन है . नतीजे आए तो राहुल फेल हो चुके थे . कांग्रेस की सीटे 25 से घटकर 22 ही रह गयीं . उसका वोट प्रतिशत भी गिर कर 8.61 फीसद ही रह गया . राहुल ने तब कहा था कि दरअसल हमारा यूपी में संगठन नहीं हैं . लंबा रास्ता हमें तय करना है . हमें संगठन फिर खड़ा करना है और हम यह करके रहेंगे . दिलचस्प बात है कि पांच साल बाद 2012 के यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस फिर पिटी, उसके हिस्से सिर्फ 28 सीटें ही आई तो राहुल ने पांच साल पुरानी बात ही दोहरा दी थी .

 

राहुल हारे लेकिन उन्हे प्रमोशन मिला . राहुल को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में महासचिव बनाया गया . साथ ही युवा संगठन एनएसयूआई और युवक कांग्रेस की जिम्मेदारी दी गयी . राहुल ने नई जिम्मेदारी लेते समय कहा था कि उन्हे एक मरा हुआ संगठन मिला है जिसमें जान फूंकनी हैं . राहुल का टेलेंट हंट यानि प्रतिभा की तलाश अभियान शुरु किया . नेता बनो , नेता चुनो का नारा लगा . राहुल ने कहा कि हर दूसरे साल यूथ कांग्रेस के नेताओं की सूची कांग्रेस को दी जाएगी . इन्हे फिर कांग्रेस आगे बढाएगी . राहुल ने के जी राव, जेम्स लिंगदोह, एन गोपालास्वामी और टी एस कृष्षामूर्ति जैसे पूर्व चुनाव आयुक्तों की सेवाएं ली गयी . जुलाई 2008 में यूथ कांग्रेस में चुनाव की प्रक्रिया शुरु हुई . नवंबर 2011 तक 23 राज्यों में यूथ कांग्रेस के चुनाव हुए . दावा किया गया कि यूथ कांग्रेस की सदस्यता चार गुना बढ़कर एक करोड़ पार कर गयी . राहुल की सारी कवायद का मिला जुला असर रहा . एनएसयूआई बंगाल में चालीस साल बाद यूनिवर्सिटी चुनाव जीती तो कुछ जगह हारी भी . केरल में 2010 के पंचायत चुनाव में पचास फीसद टिकट चालीस साल से कम के युवाओं को दिए गये . इनमें से 90 प्रतिशत जीते . 2011 के केरल विधान सभा चुनाव में कांग्रेस ने 11 युवाओं को टिकट दिये जिसमें से सात जीते . लेकिन तमिलनाडु यूथ कांग्रेस के सभी दस उम्मीदवार हार गये . यूपी में 2012 के विधान सभा चुनावहं में 35 यूथ उम्मीदवारों में से सिर्फ छह ही जीते .

 

 2009 के लोकसभा चुनाव में यूपी में कांग्रेस ने 21 सीटें जीती . इसके बाद उतराखण्ड , हिमाचल प्रदेश , असम और कर्नाटक के विधानसभा चुनाव भी जीते . लेकिन पंजाब और गुजरात में कांग्रेस पिटी . गुजरात चुनाव में तो राहुल पूरे दम खम से उतरने से हिचके . लेकिन सबसे करारी हार यूपी और बिहार के विधानसभा चुनाव में हुई . 2012 के यूपी विधानसभा चुनाव में तो राहुल ने 48 दिनों में 211 रैलियां की थी . पूरे चुनाव की कमान उनके हाथ में थी . अजीत सिंह के दल के साथ समझौता भी था लेकिन पार्टी 28 सीटों पर ही सिमट गयी .राहुल ने यूपी में हार की जिम्मेदारी ली और पार्टी ने जनवरी 2013 के जयपुर चिंतन शिविर में राहुल को और भी बड़ी जिम्मेदारी सौंप दी . राहुल को कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनाया गया . राहुल के उपाध्यक्ष बनने के बाद कर्नाटक में कांग्रेस जीती . पार्टी ने सारा श्रेय राहुल को दिया हालांकि जानकारों को मानना है कि भ्रष्टाचार के आरोपों में बीजेपी से निकाले गये येदुरप्पा ने ही बीजेपी को हराया . साल के अंत में दिल्ली , मध्यप्रदेश , छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस पूरी तरह से पिट गयी . राहुल को लगा कि मनरेगा की तरह भोजन का अधिकार कांग्रेस की झोली में वहट गिराएगा लेकिन ऐसा हो नहीं सका . राहुल हमेशा कहते रहे हैं कि अमीर इंडिया से पैसा लेना है और गरीब भारत की सेवा करनी है . यही वजह है कि सवा लाख करोड़ की सब्सिडी वाला भोजन का अधिकार दिया गया . देश की 81 करोड़ आबादी को इसके दायरे में लाया गया . राहुल ने इसे चुनाव में भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी नारा चला नहीं . कांग्रेस पिटी . यहां तक कि राजस्थान और दिल्ली के मुख्यमंत्रियों ने तो हार का ठीकरा अपनी ही केन्द्र सरकार पर फोड़ दिया .

 

 राहुल समझ गये कि मंहगाई और भ्रष्टाचार मनमोहन सिंह सरकार के अच्छे कामों पर भी भारी पड़ रहे हैं . यही वजह है कि राहुल ने जोर लगाया और संसद ने 46 साल के बाद लोकपाल बिल पास करवा दिया .  महंगाई की मार कम करने के लिए 12 सिलेंडर की मांग की गयी . दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने 28 सीटें जीत कर भी राहुल को चौंकाया . उन्होने कहा कि आप से सीखने की जरुरत है और वह जनता से कांग्रेस को जोड़ेंगे . इस बार राहुल गांधी कांग्रेस का चेहरा होंगे लेकिन चुनाव में मनमोहन सिंह सरकार के कामकाज की परख होगी . राहुल अक्सर कहते हैं कि यूपीए सरकार ने काम तो अच्छा किया है लेकिन उसका प्रचार प्रसार नहीं हुआ है . साथ ही सरकार की छवि भी धूमिल हुई है . राहुल इसके आलावा सिस्टम बदलने की बात करते हैं .जाहिर है कि राहुल को सरकार के कामकाज का प्रचार प्रसार करना है , छवि को चमकाना है और सिस्टम बदलने का रोडमैप सामने रखना है . समय बहुत कम है , काम बहुत ज्यादा है . शायद इसलिए राहुल अब 2019 की बात कर रहे हैं .

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