ब्लॉग: अबतक के सबसे बुरे दौर से गुजर सकती है कांग्रेस...

By: | Last Updated: Saturday, 18 January 2014 9:07 AM

नई दिल्ली: विपक्ष कहता है कि कांग्रेस मुक्त भारत बनाना है, कांग्रेस क्या है? कांग्रेस एक सोच है. भाईचारे की सोच, प्रेम की सोच, इज्जत की सोच. वो सोच जो 3 हज़ार सालों से चली आ रही है. वो सोच जो गीता और महाभारत में थी. वो सोच जो अशोक और गुरूनानक में थी. ये सोच कांग्रेस की है. जिसने भी इस सोच को मिटाने की कोशिश की है वो खुद ही मिट गया है. दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में राहुल गांधी एक नए रूप में नज़र आए. मोदी की तरह आक्रामक अंदाज़ तो मझे हुए कांग्रेसी कार्यकर्ता की तरह राहुल गांधी ने अपने 45 मिनट के भाषण में उन तमाम पहलूओं को छुआ जिसे एक कांग्रेसी सुनना चाहता था. लेकिन राहुल गांधी शायद यह नहीं समझ पा रहे हैं कि अधिकांश भारतीयों के मन में फिलहाल कांग्रेस के प्रति नकारात्मक सोच घर कर गई है.

 

राजनीति के कच्चे खिलाड़ी और मोदी की तुलना में हमेशा कम आंके जाने वाले राहुल गांधी बीजेपी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र अमेठी से ताल ठोकने की तैयारी में लगे कुमार विश्वास का मिश्रण लगे. नरेंद्र मोदी के भाषण जहां गुजरात के विकास मॉडल के बिना पूरे नहीं होते वहीं कुमार विश्वास के कवि सम्मेलन बिना जबर्दस्ती तालियां बजवाए पूरी नहीं होंती वैसे ही कुछ अंदाज में राहुल गांधी नज़र आए.

 

राहुल गांधी ने आरटीआई, फूड सिक्योरिटी बिल, पंचायती राज, लोकपाल और आधार से लेकर सभी योजनाओं का श्रेय कांग्रेस को दिया. साथ ही राहुल गांधी  ने भविष्य की योजनाओं को भी रेखांकित किया जो कांग्रेस करना चाहती है. लेकिन सबसे अहम सवाल यह है कि चुनाव से ठीक 4 महीने पहले राहुल गांधी को यह दिव्य ज्ञान कहां से प्राप्त हो गया? क्या चुनावों से केवल 4 महीने पहले राहुल गांधी की यह अति सक्रियता पार्टी को सत्ता में फिर ला पाएगी? राहुल गांधी का यह ओजदार भाषण क्या कांग्रेस को सत्ता से बेदखल होने से बचा पाएगा?

 

कांग्रेस के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि उत्तर भारत में उनके पास कोई मजबूत नेतृत्व नहीं है. राहुल गांधी और सोनिया गांधी के उत्तर प्रदेश से होने के बावजूद ना तो उत्तर प्रदेश में और ना ही उत्तर भारत के अन्य दस राज्यों में कांग्रेस के पास कोई बड़ा चेहरा है. उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छ्त्तीसगढ़ बिहार, में तो पार्टी का क्षेत्रिय संगठन भी बेहद ही कमजोर है. ना ही इन राज्यों से कांग्रेस में कोई ऐसा नेता है जो राष्ट्रीय स्तर पर पहचान हो.

 

हालांकि राहुल गांधी की पहल पर कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई अब सक्रिय हो गई है. युवाओं को कांग्रेस से जोड़ने की कोशिश की जा रही है. राहुल गांधी ने उत्तर भारत के कुछ राज्यों में युवाओं को कमान सौंप भी दी है. अरविंदर सिंह लवली को दिल्ली, अरूण यादव को मध्यप्रदेश, सचिन पायलट को राजस्थान तो भूपेश बघेला को राहुल गांधी ने छत्तीसगढ़ में आगे किया है. लेकिन इनमें से कोई भी ऐसा नहीं है जिसकी राष्ट्रीय पहचान हो और राष्ट्रीय स्वीकृति हो.

 

उत्तर भारत में बिना किसी मजबूत नेतृत्व के कांग्रेस कैसे बीजेपी और मजबूती से उभरती आम आदमी पार्टी का सामना करेगी यह एक बड़ा सवाल है.

 

पिछले 14 आम चुनावों में कांग्रेस को 5 बार हार का सामना करना पड़ा जिसमें से चार बार उसे करारी हार मिली है. 1977 में आपातकाल के बाद तो पार्टी केवल 154 सीटों पर ही सिमट कर रह गई. उसके बाद साल 1996 में कांग्रेस को एक बार फिर करारी हार का सामना करना पड़ा और पार्टी 140 पर ही सिमट गई. इसके बाद साल 1998 के मध्यावधि चुनाव में पार्टी फिर 141 सीटों पर ही सिमट गई. उसके बाद 1999 के आम चुनावों में तो पार्टी की और भी शर्मनाक हालत हुई. कांग्रेस को केवल 114 सीटे ही मिली. अगर इन चुनावों का विश्लेषण किया जाए तो पता चलता है कि वो चाहे 1977 का चुनाव हो या 1999 का पार्टी जब भी सत्ता से बेदखल हुई है उस समय पार्टी की हालत उत्तर भारत में बेहद ही खराब रही है.

 

वर्तमान समय में भी कांग्रेस की हालत उत्तर भारत के किसी भी राज्य में ठीक नहीं है. जिसका परिणाम पिछले विधानसभा चुनावों में भी दिख चुका है. चार राज्यों मे पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा था. इस साल होने वाले हरियाणा में भी पार्टी की हालत बेहद ही खराब है. ऐसे में यह संभावना बेहद ही प्रबल है कि इस साल होने वाले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस अपने सबसे दौर से गुजरे और 100 के अंदर ही सिमट जाए ?

 

कांग्रेस को पता है कि कांग्रेस के प्रति मीडिया के नकारात्मक छवि के बावजूद दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर भारत में अब भी लोगों का विश्वास कांग्रेस के प्रति बना हुआ है. शायद यही कारण है कि राहुल गांधी ने अपने संबोधन की शुरुआत यह कहते हुए अंग्रेजी में की कि मैं दक्षिण के लोगों के लिए कुछ देर अंग्रेजी में बोलूंगा.

 

चार राज्यों में शिकस्त के बाद राहुल गांधी ने आम आदमी पार्टी से सीखने की बात की थी. राहुल गांधी के भाषण में उसकी बानगी भी दिखी. राहुल गांधी ने सरकार में और पार्टी में जनभागीदारी की बात की. राहुल गांधी ने कहा कि 15 सीटों पर कार्यकर्ताओं से पूछकर प्रतिनिधि का चुनाव करेंगे और जनता से पूछकर फैसले लेंगे. सवाल ये है कि बाकी के 528 लोकसभा सीटों पर पार्टी किससे पूछकर उम्मीदवारों का चुनाव करेगी?

 

राहुल गांधी ने विपक्ष पर जुमला कसते हुए कहा कि विपक्ष मार्केटिंग अच्छी कर लेता है. विपक्ष गंजे को कंघी बेच रहा हैं. यानी की राहुल गांधी  गांधी मान चुके हैं कि देश की हालत गंजे की तरह हो चुकी है. विपक्ष भले ही गंजों को कंघी बेच रहा हो लेकिन विपक्ष ने की एक बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने कांग्रेस राज के घोटालों की खबर को जनता तक पहुंचा दिया है. राहुल गांधी की योजनाएं जितने लोगों को नहीं पता उससे ज्यादा सरकार के घोटालों के बारे में लोगों को पता है. अब राहुल गांधी  तीन महीने में जनता की नज़र में सरकार की छवि कैसे बदलेंगे यह एक अहम सवाल है.

 

आज तक राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस को बीजेपी से ही चुनौती मिलती रही है लेकिन इस बार पहली बार होगा कि कांग्रेस को बीजेपी के साथ ही एक नई पार्टी आम आदमी पार्टी से भी बराबर की चुनौती मिलेगी. तमाम सर्वे भी बता रहे हैं कि योग्य पीएम के चुनाव में राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी से तो पहले ही पिछड़ रहे हैं अब आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल से भी पिछड़ रहे हैं. ऐसे हालात में राहुल गांधी अचानक कोई चमत्कार कर पाएंगें इसकी संभावना कम ही है. वर्तमान हालात को देखते हुए तो यही लगता है कि दूसरे स्थान के लिए आम आदमी पार्टी कांग्रेस को जबर्दस्त टक्कर देगी.

 

यानी की राहुल गांधी के सामने चुनौतियां बहुत हैं. अब ये देखना दिलचस्प होगा कि राहुल गांधी का यह नया आक्रामक अंदाज़ पार्टी को हार से बचा पाता भी है या नहीं ?

 

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