एबीपी न्यूज विशेष : दो चेहरों की एक कहानी!

By: | Last Updated: Monday, 26 January 2015 11:54 AM
एबीपी न्यूज विशेष : दो चेहरों की एक कहानी!

एयरफोर्स वन अमेरिकी सेना का अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस ये वो हवाई जहाज है जो पूरी दुनिया में लंबी और ऊंची उड़ानें भरता है. इस हवाई जहाज ने एक बार फिर भारत का रुख किया है क्योंकि अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा एक बार फिर भारत आ रहे हैं. दुनिया के सबसे शक्तिशाली शख्स माने जाने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति गणतंत्र दिवस के मौके पर सबसे खास मेहमान हैं तो वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनके सबसे खास मेजबान. राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा और नरेंद्र दामोदर दास मोदी. दुनिया के नक्शे पर ये वो दो बडे चेहरे है जो हजारों किलोमीटर के फासले पर मौजूद दो देशों के मुखिया हैं लेकिन इन दो चेहरों के पीछे कामयाबी की एक ऐसी असाधारण कहानी छुपी हुई है जिसमें काफी संयोग और समानताएं मौजूद हैं. दो अलग–अलग देशों और संस्कृतियों में पलने और बढ़ने के बावजूद इन दोनों चेहरों ने अपने-अपने देशों में कामयाबी की एक जैसी कहानियां लिखी है. अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का राजनीतिक संघर्ष और प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक कामयाबी की कहानी करीब – करीब एक सी नजर आती है क्योंकि इन दोनों ने ही दुनिया से कहा यस वी कैन.

 

अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा और प्रधानमंत्री मोदी निराशा और आर्थिक मंदी के दौर में उम्मीद और बदलाव के नारे के साथ अपने – अपने देश में सत्ता के शिखर तक पहुंचे हैं. लेकिन ओबामा और मोदी की इस कहानी में समानताएं सिर्फ राजनीतिक ही नहीं बल्कि इन्हें अपनी निजी जिंदगी में भी एक जैसा ही संघर्ष करना पड़ा है. जहां ओबामा के पूर्वज अफीक्रा में बकरी पालकर अपने परिवार का गुजरा करते थे वहीं नरेंद्र मोदी के पिता चाय बेच कर अपना घर चलाते थे.

 

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ये दोनों दुनिया के दो बड़े देशों के प्रमुख ही नहीं है बल्कि एक दूसरे के दोस्त भी हैं हांलाकि ये दोस्ती महज चार महीने पुरानी है लेकिन मोदी और ओबामा के बीच दोस्ती की ये राह इतनी आसान नहीं थी. नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब अमेरिका ने उन्हें वीजा देने तक से इंकार कर दिया था लेकिन 2014 के आम चुनाव में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो अमेरिका के साथ उनके नए रिश्ते की शुरुवात हो गई.

 

प्रधानमंत्री मोदी के साथ अमेरिका के सर्द रिश्तों में गर्माहट लाने की शुरुवात राष्ट्रपति बराक ओबामा ने की थी. बराक ओबामा ने मोदी को ना सिर्फ चुनाव जीतने की शुभकामनाएं दी थी बल्कि अमेरिका आने का न्यौता भी दिया था और एक के बाद एक अपने दूत भी भारत भेजे थे.

 

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के दो महीने के अंदर ही अमेरिका की सहायक विदेश मंत्री निशा देसाई बिस्वाल, पूर्व रक्षा मंत्री चक हेगल और विदेश मंत्री जॉन कैरी ने भारत की यात्रा की थी और इसके बाद सितंबर 2014 में जब प्रधानमंत्री मोदी पहली बार अमेरिका के दौरे पर गए तो वो भी अमेरिका के साथ नए रिश्ते की शुरुवात का संदेश देते नजर आए थे.

 

बराक ओबामा अमेरिकी के पहले राष्ट्रपति है जो गणतंत्र दिवस के मौके पर भारत के मेहमान बने हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनके मेजबान हैं. मेहमान और मेजबान बने इन दो राष्ट्र प्रमुखों की जिंदगी पर अगर नजर डाले तो इनके संघर्ष और कामयाबी की कहानी में बहुत सारी समानताएं साफ नजर आती हैं. राजनीति की दुनिया में दोनों कम उम्र हैं नरेंद्र मोदी 64 साल के तो ओबामा 53 साल के हैं बराक ओबामा और नरेंद्र मोदी दोनों ने अपने राजनीतिक करियर में यस वी कैन का नारा दिया है. जहां ओबामा ने अमेरिका को आर्थिक मंदी से उबारा तो वहीं मोदी अच्छे दिन लाने के वादे के साथ सत्ता में आए हैं.

 

अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच एक समानता ये भी है कि ये दोनों गरीब परिवारों से हैं और लंबे संघर्ष के बाद सत्ता के शीर्ष तक पहुंचे हैं. जहां बराक ओबामा के पिता का परिवार अफीक्री देश केन्या में बकरी पालन का व्यवसाय करता था वहीं नरेंद्र मोदी के पिता दामोदरदास मोदी रेलवे स्टेशन पर चाय बेचते थे.

 

अमेरिकी के सबसे ऊंचे ओहदे तक पहुंचने वाले बराक ओबामा को जिंदगी में कड़े संघर्ष से गुजरना पड़ा हैं. माता – पिता की मौत के बाद निजी जिंदगी में अकेले रह जाने वाले बराक ओबामा के राजनीतिक करियर की शुरुवात साल 1996 में तब हुई थी जब वो पहली बार अमेरिका के इलिनाउस प्रांत के सिनेटर चुने गए थे और फिर इसके सिर्फ 13 साल बाद ही ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति बन गए.

 

हांलाकि बराक ओबामा के उलट प्रधानमंत्री मोदी ने जिंदगी का लंबा वक्त अपनी पार्टी बीजेपी के संगठन में काम करते हुए गुजारा है लेकिन साल 2001 में जब वो गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे तो इसके ठीक 13 साल बाद वो भी देश के प्रधानमंत्री चुने गए.

 

देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचने से पहले ओबामा और नरेंद्र मोदी दोनों का ही कोई बड़ा राजनैतिक रिकॉर्ड नहीं था. ओबामा ने साल 2009 में अमेरिका के राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी और नरेंद्र मोदी 2014 में देश के प्रधानमंत्री बने है लेकिन दुनिया के दो बड़े लोकतांत्रिक देशों के ये दो बड़े नेता राजनीतिक जोखिम उठा कर और अपनी हिम्मत और हौसले के दम पर ही देश के शीर्ष पद तक पहुंचने में कामयाब रहे हैं. 

 

डेमोक्रेटिक पार्टी के सदस्य बताते हैं कि जब ओबामा ने डिक्लेयर किया हिलरी क्लिटंन के सामने तो मैं भी हिलेरी क्लिटंन का सपोर्टर था और न्यूजर्सी से हिलेरी क्लिटंन के डेलिगेट्स में भी था. लेकिन जो ओबामा की अपील थी वह काफी प्रभावी थी. यंग वोटर्स को अपील थी. एस ए स्पीकर वो कान्प्रेंस में जाना चाहते थे पर उनको इंविटेशन नहीं था. पहली दफा यूनाइटेड स्टेट सेंटर था और फर्स्ट टाइम इस सेंटर के लिए प्रेसिडेंट के लिए आए और सारे दोस्तों ने इनको बोला कि आप चांस न लो 7 साल और वेट करो अनुभव नहीं है मगर किस्मत की बात होती है. अगर आप देखो हिलेरी के भी 25 प्वाइंट आगे थे मगर जो किस्मत है बुलंद होनी चाहिए जो कि इनकी किस्मत बड़ी अच्छी थी.

 

राजनीतिक विश्लेषक अऱविंद मोहन ने कहा कि मोदी का सक्सेज पर्सनल लेवल पर बहुत जबरदस्त है कोई आदमी आज की तारीख में बहुत इतने छोटे नीचे से उभर कर यहां आ जाए और सारा मीडिया. सारा कॉरपोरेट. पूरी पार्टी. पैसे वाला, संगठन एनडीए ये हर आदमी आपको सपोर्ट करने लगे और बाकि लोग सब धराशाई हो जाए. कांग्रेस पिट जाए बाकि क्षेत्रिय पार्टियां पिट जाएं. और फिर बीजेपी एब्सलूट जीत पाले. मोदी जो चाहे वो हो जाए. ये अपने आप में बहुत बड़ी चीज है छोटी चीज नहीं है. और ये उन्होंने कैसे हासिल किया है ये अभी भी ठीक से पढ़ने की चीज है.

 

जोशीला लहजा, इमोशन में लिपटी हुए जुबान और सधा हुआ बॉलीवुड का अंदाज. नरेंद्र मोदी की ये डॉयलॉग डिलीवरी हिंदी सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन की याद दिलाती है. बड़ी-बडी बातों और मुद्दों को बेहद आसान शब्दों में जनता तक पहुंचाने की मोदी की महारत ही उन्हें दूसरे नेताओं से आगे ले जाती है. नरेंद्र मोदी के हाथों के इशारे. चेहरे पर तेजी से बदलते भाव और उनकी भाषा का ठेठ देसी अंदाज सुनने वालों के जहन पर सीधी चोट करता है और उनकी यही चोट सीधे वोट में तब्दील होती रही है.

 

नरेंद्र मोदी की तरह ही बराक ओबामा भी अपने भाषणों से दुनिया भर के लोगों को मंत्रमुग्ध करते रहे हैं. साल 2004 में पहली बार ओबामा अपनी डेमोक्रेटिक पार्टी में एक शानदार वक्ता के तौर पर उभरे थे और इसके बाद वो पूरे अमेरिका पर छा गए थे. तब ओबामा की जुबान से निकला एक-एक शब्द पूरा अमेरिका दिल थाम कर सुनने लगा था और ओबामा की जुबान ही उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गई थी.  

 

2004 में चुनाव प्रचार के दौरान बराक ओबामा ने कहा था कि अमेरिका के लोगों अगर आप आज मेरी तरह ऊर्जा महसूस करते हैं. मेरी तरह ही शिद्दत महसूस करते हैं अगर आपमें मेरी ही तरह उम्मीद की किरण है तो मुझे कोई शक नहीं है. तो मुझे किसी तरह का कोई शक नहीं हैं कि समुचे देश में फ्लोरिडा से ऑरेगन तक और वॉशिंगटन से मेनटक लोग नवंबर में हमारे पक्ष में उठ खड़े होगें और जान कैरी हमारे देश के अगले राष्ट्रपति होगें.

 

अमेरिकी भारतीय संत सिंह चटवाल बताते हैं कि उनकी जो स्पीच है उसमें बहुत शक्ति है वो स्पीच के जरिए पूरा कनविंस कर देते है. जोश से लबरेज और उम्मीदों से भरा उफान अपने अंदर समेते ओबामा एक आम इंसान की तरह बर्ताव करते नजर आए सच यही है कि जानेफ केनैडी के बाद अमेरिका को कोई ऐसा राष्ट्रपति नहीं मिला जिसनें अमेरिका जनता के दिल को इस कदर छुआ हो. और उनके दिमाग को झकझोर दिया हो.

 

नरेंद्र मोदी और बराक ओबामा सोशल मीडिया पर भी बेहद लोकप्रिय हैं. राष्ट्रपति ओबामा की तर्ज पर ही नरेंद्र मोदी ने भी लोकसभा चुनाव के दौरान अपने प्रचार अभियान के तौर तरीकों में बड़े और अहम बदलाव किए थे. अमेरिकी राष्ट्रपति की तरह ही मोदी ने भी चुनावों में ट्विटर औऱ फेसबुक का बखूबी इस्तेमाल किया. उन्होंने सोशल मीडिया की ताकत को पहचाना और उसे अपने प्रचार अभियान का एक अहम हिस्सा भी बनाया था. साल 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी ने थ्री डी तकनीक के सहारे लाखों लोगों तक पहुंचने की कोशिश भी की और ये भी एक बड़ी वजह है कि वो विरोधी दलों को पीछे छोड़ कर चुनावी रेस में सबसे आगे निकल सके.

 

वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामशेषन ने बताया कि सोशल मीडिया का उपयोग बड़ी चतुराई से मोदी जी ने किया और ये ना समझिए की ये एक साल या दो साल में हुआ, मोदी जी ने बिलकुल तीन चार साल से सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया. और जो वाइब्रेंट गुजरात के सम्मेलन हैं जो उनका इंटरनेशन प्रोजेक्शन किया . और उन्होंने बताने की कोशिश की कि अमेरिका उनको वीजा देने में राजी नहीं है लेकिन अमेरिका को छोड़कर बाकी जितने भी विकसित देश हैं उनके साथ संबंध बनाना चाहते हैं. सब कुछ एक बहुत सोची समझी रणनीति करके, उन्होंने अपना पूरा प्लान किया.

 

बराक ओबामा और नरेंद्र मोदी दोनों ही नेता निराशा और मंदी के माहौल में घिरे अपने – अपने देशों में उम्मीद और बदलाव के नारे के साथ सत्ता के शीर्ष तक पहुंचे हैं. जिस तरह ओबामा ने चुनाव प्रचार के दौरान अमेरिका में बुनियादी ढांचे के विस्तार पर जोर दिया उसी तरह से मोदी ने भी अपने चुनाव अभियान में सड़क, पुल, बंदरगाह और हवाई अड्डों का भारी नेटवर्क खड़ा करने का लोगों से वादा किया. अमेरिकी राष्ट्रपति के नक्शे-कदम पर चलते हुए मोदी ने भी पारदर्शिता के नए युग की शुरुवात करने की बात भी कही है.  

 

 

राजनीतिक विश्लेषक कंचन गुप्ता ने बताया कि आप दिसंबर 2013 का जो आखिरी दिन था उसके बारे में सोचिए. चारो ओर देश में एक निराशा का माहौल था. तब की जो सरकार थी उसमें लोगों का विश्वास उठ चुका था. जो आर्थिक स्थिति थी ऐसा लग रहा था कि किसी भी समय आर्थिक स्थिति बिगड़ सकती है और बिगड़ सकती है. लीडरशिप क्राइसिस जैसा कि कहा जाता है कि हर एक देश को एक लीडर चाहिए होता है. तो उस समय भारत में एक लीडरशिप क्राइसिस थी. और आज अगर देखे तो ये जो एक स्थिति है उसमें एक ड्रमेटिक परिवर्तन आया है.

 

सोशल मीडिया और आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल हो या फिर चुनाव मैनेंजमेंट और नेटवर्किंग का काम नरेंद्र मोदी ने जहां अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के सारे फॉर्मूलों को अपने चुनाव अभियान में इस्तेमाल किया है वहीं चुनाव में उन्होंने ओबामा की तर्ज पर ही युवा वोटरों को सबसे ज्यादा टारगेट किया है. चुनावों के दौरान जिस तरह कॉलेज और यूनिवर्सिटी में जाकर बराक ओबामा युवा वोटरों को प्रभावित करते रहे हैं ठीक उसी तरह मोदी ने भी दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज में युवाओं के बीच जाकर अपने मिशन प्रधानमंत्री का आगाज किया था. 

 

6 फरवरी 2013 श्रीराम कॉलेज में मोदी ने कहा था कि मैं जब गुडगवर्नेंस की चर्चा करता हूं तो मैं अपने मॉडल की बात करता हूं तो मैं कहता हूं कि पीटू जीटू. प्रो पीपुल गुड गवर्नेंस. आम तौर पर हमारे यहा शासन फायर फाइटर का काम करता है. समस्याएं हुई शासन उसको फॉलो करता है दौड़ता है रास्ता खोजता है. मित्रों शासन का काम है स्थितियों को विजुलाइज करे. ऩए आयामों की खोज करे. स्थितियां बदलने का संकल्प करे. और उसके अनुकूल नई व्यवस्थाओं को विकसित करे. लेकिन हम पिछले छह दशक से ज्यादा समय से देख रहे हैं कि हम उन कामों को करने में विफल हुए हैं. और उसका नतीजा ये हुआ है कि आज देश के अंदर एक निराशा का माहौल है.

 

2014 के लोकसभा चुनाव में प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी लगातार बदलाव की बात करते नजर आए थे. विकास के मुद्दे के साथ उन्होंने भ्रष्टाचार का मुद्दा भी जोर- शोर से उठाया था मोदी ने बराक ओबामा की तरह ही लोगों से सरकार के अंदर और बाहर जवाबदेही के युग की शुरुवात की बात भी कही थी साफ है कि मोदी का चुनाव अभियान पूरी तरह अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव से प्रभावित रहा है.  

 

अमेरिकी भारतीय संत सिंह चटवाल ने बताया कि उन्होंने सबको ये बोला अमेरिका में चेंज लाए, चलो चेंज लाएं. मगर ये सिर्फ अमेरिका में हो सकता है.

 

बराक ओबामा के राष्ट्रपति बनने और मोदी के प्रधानमंत्री बनने का ये सफर एक लंबे संघर्ष से होकर गुजरा है लेकिन नरेंद्र मोदी और ओबामा की राजनीतिक जिंदगी में टर्निंग प्वाइंट भी एक साथ ही आया था. खास बात ये है कि 21 वीं सदी के शुरुवाती चार सालों में इन दोनों नेताओं की किस्मत का दरवाजा भी साथ – साथ ही खुला था.

 

सन 2004 ओबामा के लिए टर्निंग प्वाइंट बनकर आया. इसी साल ओबामा इनेनौ राज्य से अमेरिका सीनेट मे चुने गए लेकिन ये सफलता तो बहुत छोटी थी सन 2004 ओबामा के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि इसी साल अमेरिका में राष्ट्रपति पद का चुनाव हो रहा था और ओबामा को डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार जॉन कैरी की सभाओं में भाषण देने का गोल्डन चांस मिला था.

 

बराक ओबामा ने 2004 में कहा कि अमेरिका के लोगों अगर आप आज मेरी तरह ऊर्जा महसूस करते है. मेरी तरह ही शिद्दत महसूस करते हैं अगर आपमें  मेरी ही तरह उम्मीद की किरण है तो मुझे कोई शक नहीं है. तो मुझे किसी तरह का कोई शक नही हैं. कि समुचे देश में  फ्लोरिडा से ऑरेगन तक और वॉशिंगटन से मेनटक लोग नवंबर में हमारे पक्ष में उठ खड़े होगें और जान कैरी हमारे देश के अगले राष्ट्रपति होगें.

 

सदस्य डेमोक्रेटिक पार्टी किरण देसाई बताती हैं कि जब इलिनाउसिस में से सेनिटेट बनें उसके बाद जो इलेक्शन आया और जो वाइस प्रेसिंडेट बुश के सामने लड़ रहे थे और जो डेमेक्रेटिक पार्टी का कन्वेंशन हुआ उसमें कीनोट स्पीकर ओबामा ने किया और ओबामा ने जो कीनोट स्पीच दिया वो इतना पावरफुल था कि सारे डेमोक्रेट पार्टी थ्रू आउट अमेरिका में सबको लगा कि ये उभरता हुआ नया स्टार है.

 

अमेरिका में साल 2004 में हुए राष्ट्रपति पद के चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार जॉन कैरी, रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार जॉर्ज डब्ल्यू बुश से मात खा गए थे और जॉन कैरी की इसी हार के साथ ही बराक ओबामा की किस्मत के दरवाजे भी खुल गए थे क्योंकि इस चुनाव के बाद से ही बराक ओबामा अपनी पार्टी ही नहीं बल्कि पूरे अमेरिका में एक ऐसे वक्ता के तौर पर उभरते चले गए जिनकी जुबान से निकला हर शब्द लोगों के दिमाग पर सीधी चोट कर रहा था और इसी वजह से ओबामा की अमेरिका में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान भी बनी थी. 

 

डेमोक्रेटिक पार्टी के सदस्य बताते हैं कि वो जब बने राष्ट्रपति उसके 4 ही साल पहले सैनिटन बने थे और उसके पहले इलिनाउसिस स्टेट के लेजिस्लेटर भी थे. तो उनका रिकॉर्ड इतना बड़ा नहीं है लेकिन उनकी एक बात फिर से दोहराऊंगा कि उनकी जो डॉयरेक्ट अपील है लोगों से लोगों को लगता है कि ये सच कहते हैं.

 

अमेरिका के सियासी आसमान पर ओबामा उम्मीदों का सूरज बन कर उभरें. उनकी जोशीली बातें आम अमेरिकी के मन में उम्मीदें जगाने लगी. ओबामा की लोकप्रियता तेजी से बढ़ते चली गई और इस तरह राष्ट्रपति चुनाव में हार का जख्म सहला रही डेमोक्रेटिक पार्टी को तुरुप का इक्का मिल गया. 10 फरवरी 2007 को बराक ओबामा ने राष्ट्रपति के पद की उम्मीदवारी के लिए अपना एलान कर दिया.

 

ओबामा ने कहा कि आज मैं आप सबके सामनें यहां अपनी उम्मीदवारी घोषित करता हूं फॉर द प्रेसिडेंट ऑफ यूनाइटेड स्टेट ऑफ अमेरिका.

 

साल 2004 राष्ट्रपति बराक ओबामा के करियर में टर्निंग प्वाइंट था. तो वहीं साल 2001 नरेंद्र मोदी की जिंदगी में टर्निंग प्वाइंट बन कर आया था. अक्टूबर 2001 में केशुभाई पटेल को हटा कर मोदी को पहली बार गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया था. उस वक्त राज्य में बीजेपी की हालत खराब थी. पार्टी जिला पंचायतों और नगर निगम के चुनाव हार चुकी थी. गुजरात में साल 2003 में विधानसभा चुनाव होने थे जिसमें बीजेपी को जिताने की जिम्मेदारी मोदी को सौंपी गई थी लेकिन 2003 ही नहीं 2007 और 2012 के विधानसभा चुनावों में भी नरेंद्र मोदी बीजेपी को जिताने में कामयाब रहे.

 

साल 2007 में बराक ओबामा ने पहली बार अमेरिका के राष्ट्रपति पद के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से अपनी उम्मीदवारी का ऐलान किया था लेकिन उनकी ये राह इतनी आसान भी नहीं थी क्योकि डेमोक्रेटिक पार्टी से ही राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए हिलेरी क्लिंटन ने भी अपना दावा ठोंक दिया था.

 

साल 2007 में डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने के लिए हिलेरी क्लिटंन और बराक ओबामा के बीच जबरदस्त होड लगी हुई थी. पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की पत्नी हिलेरी अमेरिका की फर्स्ट लेडी रह चुकी हैं इसीलिए ये मुकाबला बहुत सख्त था लेकिन बराक ओबामा ने अपने बुलंद इरादों और तीखे भाषणों के दम पर हिलेरी क्लिंटन जैसी दमदार प्रतियोगी को भी पछाड़ दिया था.

 

अमेरिका में बराक ओबामा के सामने जहां हिलेरी क्लिंटन जैसी बड़ी शख्सियत खड़ी थी ठीक इसी तरह नरेंद्र मोदी के सामने बीजेपी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी दीवार बन कर खड़े हो गए थे लेकिन मोदी ने भी बीजेपी की धुरी रहे आडवाणी को पछाड़ कर प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी का ये किला जीत लिया था.

 

24 जून 2013 में नरेंद्र मोदी को बीजेपी ने सेंट्रल इलेक्शन कैंपेन कमेटी का चेयरमैन नियुक्त किया था. बीजेपी के सीनियर नेता लालकृष्ण आडवाणी और बीजेपी के दूसरे कई सीनियर नेता इसके विरोध में थे. लेकिन आडवाणी के विरोध को दरकिनार करते हुए 13 सिंतबर 2013 को बीजेपी ने मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए अपना उम्मीदवार भी घोषित कर दिया था.

 

साल 2008 में जब बराक ओबामा ने अमेरिका के राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ा था तब दुनिया आर्थिक मंदी की चपेट में थी. अमेरिका में एक निराशा का माहौल था और ऐसे हालात के बीच बराक ओबामा ने अमेरिका में सत्ता परिवर्तन के नारे के साथ अपने देश को आर्थिक मंदी से निकालने का लोगों से वादा किया था.

 

बराक ओबामा के अमेरिका का राष्ट्रपति बनने के पांच साल बाद जब नरेंद्र मोदी भी प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी के साथ साल 2014 के लोकसभा चुनाव में उतरे तो उनके सामने भी चुनौतियां ठीक वैसी ही थी. मंदी, मंहगाई, भ्रष्टाचार और कुशासन से परेशान जनता से नरेंद्र मोदी ने अच्छे दिन लाने का वायदा किया और वो चुनाव जीत भी गए. अपनी चुनावी रैलियों में तीन सौ कमल मांगने वाले मोदी को 336 सीटों के बहुमत के साथ प्रधानमंत्री की कुर्सी मिली है.  

 

वरिष्ठ पत्रकार दिबांग बताते हैं कि उनके जो सबसे ज्यादा घोर आलोचक हैं वो इस बात को मानते हैं कि उन्होंने ये उम्मीद भरी है चुनाव प्रचार के दौरान आप देखिए जिस तरह का माहौल था यानि देश में कुछ काम हो नहीं रहा था. भ्रष्टाचार था प्रधानमंत्री कहीं दिखाई नहीं देते थे, सुनाई नहीं देते थे. पता नहीं चलता था कौन नेता है. देश का क्या हाल होगा. वहां उन्होंने कहा कि मैं एक डिसाइसिव नेता हूं. मैं काम करता हूं आपके लिए काम करूंगा. और ये उन्होंने मैसेज दिया और ये उसमें खास तौर से युवाओं को यानि 65 फीसदी युवा हमारे 35 साल से कम के हैं उनमें एक नई ऊर्जा का संचार हुआ और वो चीज अभी तक लगातार चलती आ रही है मेरे खयाल से एक देश के लिए  एक नेता का ऐसा कर पाना एक बहुत बड़ी बात है.

 

पिछले आठ महीनों में अपनी बात और अपने काम करने के तरीके से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सीधे जनता से जुड़ते नजर आए हैं. राष्ट्रपति बराक ओबामा की तरह ही मोदी भी रेडियों पर लोगों से अपने मन की बात भी करते रहे हैं. राष्ट्रपति बराक ओबामा जहां अमेरिका को मंदी से उबारने में कामयाब रहे हैं वहीं मोदी की महत्वकांक्षी जनधन योजना गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हो चुकी है. साफ है कि प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति बराक ओबामा की राजनीतिक कामयाबी का ये सफर यूं तो कई दिलचस्प संयोग और समानताओं से भरा पड़ा है लेकिन इनमें सबसे खास है इन दोनों की जुबान से निकली वो बात जो सीधे लोगों के दिलों पर चोट करती है और शायद इसीलिए बराक ओबामा और नरेंद्र मोदी बन गए है आज एक दूसरे की नजरों में बेहद खास.

 

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