भारत में अभी भी अस्तित्व में हैं द्वितीय विश्वयुद्ध से पूर्व का कानून

By: | Last Updated: Monday, 3 November 2014 2:02 PM

नई दिल्ली: भारत की आजादी के 67 साल बाद भी देश की वैधानिक पुस्तिका में ब्रिटिश काल का एक कानून अस्तित्व में है. इस कानून में द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश साम्राज्य की ओर से हिस्सा लेने से लोगों को रोकने वाले व्यक्ति को दंडित करने का प्रावधान है.

 

द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने से ठीक पहले बनाया गया आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 1938 उन 73 पुराने और प्रचलन से हट चुके कानूनों में शामिल है, जिन्हें विधि आयोग ने समाप्त करने की सिफारिश की है . इन 73 कानूनों के साथ ही ऐसे कानूनों की कुल संख्या अब 258 हो गई है जिन्हें समाप्त किए जाने की सिफारिश की गई है .

 

द्वितीय विश्व युद्ध से ठीक पहले बनाये गए आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 1938 में संघ के सशस्त्र बलों में नियुक्ति पाने से आम लोगों को रोकने या उन्हें इससे विरक्त करने का काम करने और इसके लिए उन्हें सार्वजनिक तौर पर संबोधित करने वालों को दंडित करने का प्रावधान है. खासतौर से तब जब ये नियुक्तियां ऐसे युद्ध में हिस्सा लेने के लिए हो रही हों ,जिनमें ब्रिटिश साम्राज्य शामिल था.

 

आयोग की रिपोर्ट संख्या 250 के अनुसार, ‘‘यह कानून ब्रिटिश साम्राज्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए था और अब यह बेकार हो गया है. इस कानून के हाल में उपयोग का कोई साक्ष्य नहीं है. इसलिए केंद्र सरकार को इस कानून को समाप्त कर देना चाहिए.’’विधि आयोग ने आज ऐसे 73 और कानूनों को समाप्त करने की सिफारिश की जो पुराने पड़ चुके हैं ओैर प्रचलन से हट चुके हैं. आयोग ने सरकार को सौंपी तीन रिपोटार्ंे में ऐसे कुल 258 कानूनों को समाप्त करने की सिफारिश की है जो विधान की पुस्तिका में तो हैं लेकिन अपनी प्रसांगिकता खो चुके हैं.

 

इसमें हिन्दू उत्तराधिकार (अशक्तता के कारण वंचित करने से संबंधित) कानून 1928 एक अन्य कानून है जिसे समाप्त किये जाने की सिफारिश की गई है . इसमें कहा गया है कि हिन्दू उत्तराधिकार कानून के तहत आने वाले किसी भी व्यक्ति को बीमारी, शारीरिक या मानसिक अशक्तता के कारण संयुक्त परिवार की सम्पत्ति में हिस्सा देने या अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता. कानून में हालांकि ऐसे व्यक्ति को अलग रखा गया है जो जन्म से पागल हो.

 

रिपोर्ट के अनुसार, ‘‘ इस कानून का उद्देश्य अब हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 28 में समाहित कर दिया गया है जिसमें कहा गया है कि किसी भी व्यक्ति को बीमारी या अशक्तता के आधार पर सम्पत्ति के उत्तराधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है.’’

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