10 जनपथ में था लिट्टे का गुप्तचर : पूर्व गृह सचिव

By: | Last Updated: Friday, 8 August 2014 4:15 PM

नई दिल्ली: भारत के पूर्व गृह सचिव आर. डी. प्रधान ने कहा है कि लिट्टे का 10 जनपथ में जासूस था और राजीव गांधी की हत्या सत्ता के शिखर पर बैठे रसूखदारों की साजिश का हिस्सा थी.

प्रधान ने अपनी किताब ‘माई इयर्स विथ राजीव एंड सोनिया’ में जासूस की पहचान किए बगैर लिखा है, “10 जनपथ में ऐसा कोई था जो गुप्तचर को सूचना देता था.”

किताब में कहा गया है, “मैं पक्के तौर पर जानता हूं क्योंकि 1991 के पूरे लोकसभा चुनाव के दौरान अमेठी में बनी रहने वाली सोनिया भी ऐसा महसूस करती हैं.”

प्रधान बाद में अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल बने थे. उन्होंने कहा है, “कई संदिग्ध गिरफ्तार किए गए और कुछ को 1991 में हुई हत्या के लिए सजा भी मिली फिर भी मेरी यह धारणा है कि सच्चाई कभी सामने नहीं आएगी.”

चेन्नई में एक महिला आत्मघाती ने चुनावी सभा में 21 मई 1991 को एक धमाके में राजीव गांधी की हत्या कर दी थी. उस समय वे विपक्ष के नेता थे. इस हत्याकांड को अंजाम देने का आरोप लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल इलम (लिट्टे) पर लगा.

लिट्टे ने आरोपों से इनकार किया, लेकिन भारतीय जांचकर्ताओं ने दावा किया कि तमिल टाइगरों ने श्रीलंका के उत्तर में भारतीय शांति सेना भेजने का बदला लेने के लिए गांधी की हत्या की.

प्रधान राजीव गांधी की टीम में बाद में शामिल हुए थे. उन्होंने कहा है,”दिल्ली में पूरी सुरक्षा व्यवस्था पर पश्च दृष्टि रखकर हर कोई यह मान ले कि राजीव गांधी की जान पर लिट्टे के खतरे को नजरअंदाज किया गया.”

उन्होंने कहा है कि उन्होंने एक बार कुछ श्रीलंकाइयों को 10 जनपथ के बाहर गांधी परिवार के एक पुराने सहयोगी के साथ बैठे देखा था. ‘निश्चित रूप से उनका 10 जनपथ में किसी के साथ संपर्क था जिसने राजीव गांधी के साथ गुप्त मुलाकात की व्यवस्था की जिसके बारे में बहुतों को नहीं पता. मुझे तो निश्चित रूप से नहीं.’

प्रधान के मुताबिक राजीव गांधी की जान सिर्फ एक व्यक्ति बचा सकता था वह थे तमिलनाडु के तत्कालीन राज्यपाल भीष्मनारायण सिंह. तमिलनाडु में उस समय राष्ट्रपति शासन था.

प्रधान ने कहा है कि पूर्व गृह सचिव होने के नाते उन्हें राजीव गांधी की जान को खतरे का भान था.

उन्होंने लिखा है, “राजीव गांधी कई संगठनों के निशाने पर थे. इन संगठनों में सिख आतंकवादी, श्रीलंका के लिट्टे और यहां तक कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सेंट्रल इंटेलीजेंस एजेंसी (सीआईए) (कुछ सूत्रों के मुताबिक) शामिल थे.”

उन्होंने लिखा है, “राजीव गांधी की एशिया में बढ़ रही छवि अमेरिकियों को रास नहीं आ रही थी और वे राजीव गांधी के बहुमत से लौटते देख परेशान थे.”

 

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