सोशल साइट्स पर टिप्पणी लिखने के कारण गिरफ्तारी बहुत ही गंभीर बात है: कोर्ट

By: | Last Updated: Tuesday, 9 December 2014 2:37 PM

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने आज केन्द्र सरकार के इस तर्क से असहमति व्यक्त की कि सोशल साइट्स पर कथित रूप से आपत्तिजनक टिप्पणियां लिखने के कारण कुछ व्यक्तियों की गिरफ्तारी ‘इक्का दुक्का घटनायें’ हैं. कोर्ट ने कहा कि यदि ये अपवाद थे तो भी बहुत गंभीर था.

 

जस्टिस जे चेलामेश्वर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ से केन्द्र सरकार के वकील ने कहा कि वह सूचना प्रौद्योगिकी कानून की धारा 66-ए के तहत की गयी गिरफ्तारियों को न्यायोचित नहीं ठहरा रहे है लेकिन ये प्राधिकारियों द्वारा अपने विधायी अधिकारों के दुरूपयोग की ‘इक्का दुक्का घटना’ थीं.

 

न्यायाधीशों ने कहा कि भले ही ये अपवाद और इक्का दुक्का घटनायें हों, अधिकारों का उल्लंघन बहुत ही निर्लज्ज और गंभीर है. कोर्ट इस कानून के कुछ प्रावधानों को निरस्त करने सहित विभिन्न राहत के लिये दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था.

 

सूचना प्रौद्योगिकी कानून की धारा 66-ए में गिरफ्तारी करने और इस संचार माध्यम के जरिये आपत्तिजनक संदेश भेजने के आरोपी को तीन साल की कैद के प्रावधान विवादों में हैं.

 

एक याचिकाकर्ता की ओर से बहस शुरू करते हुये वरिष्ठ अधिवक्ता सोली सोराबजी ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) में प्रदत्त बोलने और अभिव्यक्ति के अधिकार की रक्षा की जानी चाहिए और शासन इस अधिकार को कम नहीं कर सकता है. उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 19 (2) के तहत इस पर उचित नियंत्रण लगाया जा सकता है.

 

सोराबजी ने कानून की धारा 66-ए को निरस्त करने का अनुरोध करते हुये कहा कि इसमें ‘अस्पष्टता’ है और यह बहुत ही आपत्तिजनक है. उन्होंने कहा कि पहले भी ऐसे प्रावधान को निरस्त किया गया है जो अस्पष्ट हों. कोई भी सार्वजनिक वक्तव्य किसी न किसी को परेशान कर सकता है.इस पर कोर्ट ने एक मंत्री की कथित टिप्पणियों को लेकर संसद में हाल ही में उठे विवाद का जिक्र किया और कहा कि यह कई पहलुओं पर निर्भर करता है. कोर्ट ने कहा कि ‘आक्रामक’ शब्द का इस्तेमाल अलग अलग संदर्भ में अलग तरीके से किया जा सकता है. आक्रामक शब्दों के मायने का मतलब अलग अलग व्यक्तियों पर निर्भर करता है. सोराबजी ने कहा कि आलोचना को रोकने का कोई भी प्रयास सेन्सरशिप के समान होता है. उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति परेशान हो सकता है लेकिन यह सेन्सरशिप लागू करने का आधार नहीं हो सकता.

 

कोर्ट यह भी जानना चाहता था कि भारतीय दंड संहिता क्या इस नये तरह के आक्रामक रवैये से निबटने में अपर्याप्त थी और इसीलिए सूचना प्रौद्योगिकी में यह दंडनीय प्रावधान शामिल किया गया.

 

न्यायाधीशों ने कहा, ‘‘हम आपसे यह बताने की अपेक्षा करते हैं कि क्या इस तरह की जरूरतों को पूरा करने में आईपीसी अपर्याप्त थी.’’ कोर्ट ने कहा कि वह सूचना प्रौद्योगिकी कानून की धारा 66-ए की संवैधनिकता पर विचार करेगा.

 

गैर सरकारी संगठन कामन काज के वकील प्रशांत भूषण ने भी धारा 66-ए सहित इस कानून के तीन प्रावधानों को निरस्त करने का अनुरोध किया. उनका कहना था कि ये अनुचित प्रावधान लोकतंत्र की हत्या कर देंगे.

 

इस मामले में अधूरी रही बहस कल भी जारी रहेगी.

 

इससे पहले, शीर्ष अदालत ने कहा था कि सोशल साइट्स पर आपत्तिजनक टिप्पणियां लिखने वाले व्यक्ति को पुलिस अपने वरिष्ठ अधिकारियों की अनुमति के बगैर गिरफ्तार नहीं कर सकती है.

 

कोर्ट ने इस तरह की टिप्पणियां लिखने के कारण गिरफ्तारियों को लेकर उपजे जनाक्रोश के मद्देनजर यह निर्देश दिया था. लेकिन कोर्ट ने देश भर में ऐसे व्यक्तियों की गिरफ्तारी पर रोक लगाने के लिये अंतरिम आदेश देने से इंकार कर दिया था.

 

धारा 66-ए निरस्त करने के लिये कानून की छात्रा श्रेया सिंघल ने भी जनहित याचिका दायर कर रखी है.

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Web Title: supreme court
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