उपहार कांड: 30-30 करोड़ जुर्माना देकर छुटेंगे अंसल ब्रदर्स

By: | Last Updated: Wednesday, 19 August 2015 1:17 PM
Uphaar fire:Ansals fined Rs 60 crore, escape further jail term

नई दिल्ली: उद्योगपति अंसल बंधुओं को आज उस समय बडी राहत मिली जब उच्चतम न्यायालय ने 1997 के उपहार सिनेमा अग्निकांड मामले में उन्हें तीन महीने के भीतर 30-30 करोड रूपए का जुर्माना अदा करने का निर्देश दिया.

 

हिन्दी फिल्म ‘बार्डर’ के प्रदर्शन के दौरान हुये इस अग्निकांड में 59 दर्शकों की मृत्यु हो गयी थी. न्यायमूर्ति ए आर दवे, न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ और न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल की खंडपीइ ने सुशील और गोपाल अंसल द्वारा जेल में बितायी गयी अवधि तक ही उनकी सजा सीमित करते हुये उन्हें निर्देश दिया कि वे तीन महीने के भीतर दिल्ली सरकार के पास 60 करोड रूपए जमा करायें.

 

दिल्ली सरकार इस धनराशि का इस्तेमाल कल्याणकारी योजना के लिये करेगी. इस अग्निकांड में दोषी ठहराये गये सुशील अंसल अब तक पांच महीने से अधिक समय जेल में बिता चुके थे जबकि उनके भाई गोपाल अंसल चार महीने से अधिक समय जेल में रह चुके थे. पीठ ने सीबीआई की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे का यह अनुरोध ठुकरा दिया कि दोषियों को सजा की शेष अवधि के लिये जेल भेजा जाये.

 

न्यायालय ने जब साल्वे से उनकी राय पूछी तो उन्होंने कहा, ‘‘सीबीआई से उन्हें निर्देश है कि वह उनकी हिरासत के लिये जोर दें.’’ उपहार अग्निकांड के पीड़ितों के संगठन का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता केटीएस तुलसी ने भी कहा कि दोषियों को सिर्फ जेल ही नहीं भेजा जाये बल्कि उनकी सजा भी बढ़ाई जाये.

 

दक्षिण दिल्ली के ग्रीन पार्क क्षेत्र में स्थित उपहार सिनेमा में बार्डर फिल्म के प्रदर्शन के दौरान 13 जून, 1997 को हुये अग्निकांड में बालकनी में बड़ी संख्या में दर्शक फंस गये थे. इस अग्निकांड में 59 व्यक्ति मारे गये थे और इस दौरान हुयी भगदड़ में एक सौ से अधिक जख्मी हो गये थे.

 

इससे पहले, न्यायमूर्ति तीरथ सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्र :अब सेवानिवृत्त: की पीठ ने पांच मार्च, 2014 को अंसल बंधुओं को दोषी ठहराया था लेकिन उन्हें दी जाने वाली सजा को लेकर दोनों न्यायाधीश मतैक्य नहीं थे.

 

न्यायमूर्ति ठाकुर ने 2008 के दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय से सहमति व्यक्त की थी जिसने अंसल बंधुओं को एक एक साल की कैद की सजा सुनायी थी. लेकिन न्यायमूर्ति मिश्रा ने सुशील अंसल की उम्र को ध्यान में रखते हुये उनकी सजा जेल में बिताई गयी अवधि तक सीमित कर दी थी मगर उन्होंने दूसरे भाई गोपाल की सजा बढाकर दो साल कर दी थी.

 

इसके बाद, इस प्रकरण को तीन सदस्यीय खंडपीठ के पास फैसले के लिये भेजा गया था. इस मामले में आज सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी ने अग्निकांड के लिये दिल्ली विद्युत बोर्ड के कर्मचारियों पर आरोप लगाया और कहा कि सरकारी कर्मचारी होने की वजह से वे बच गये. उन्होंने कहा कि इस हादसे वाले दिन ट्रांसफार्मर में मामूली आग लगी थी और दिल्ली विद्युत बोर्ड ने किसी ‘मिस्त्री’ को इसे ठीक करने के लिये भेजा था.

 

इस पर पीठ ने कहा, ‘‘जेठमलानी जी आप दोषसिद्धि के खिलाफ बहस नहीं कर सकते. हम सिर्फ सजा की मात्रा पर आपको सुन सकते हैं. पूर्ववर्ती पीठ ने पहले ही दोषसिद्धि को बरकरार रखा है.’’ न्यायालय ने कहा, ‘‘यदि आप इसे चुनौती देना चाहते हैं तो पुनर्विचार याचिका दायर कीजिये.’’

 

इस मुद्दे पर जेठमलानी और उपहार अग्निकांड के पीड़ितों के संगठन का प्रतिनिधित्व कर रहे तुलसी के बीच कुछ तकरार भी हुयी. इससे पहले, अंसल बंधुओं ने अपनी दोषसिद्धि को चुनौती देते हुये दावा किया था कि इस अग्निकांड के लिये वे किसी भी तरह से जिम्मेदार नहीं हैं क्योंकि यह आग तो दिल्ली विद्युत बोर्ड के ट्रांसफार्मर से लगी थी. सीबीआई ने अंसल बंधुओं की सजा कम करने के दिल्ली उच्च न्यायालय के 19 दिसंबर, 2008 के निर्णय को चुनौती दी थी.

 

पैसा देकर बच सकते हैं पैसेवाले: पीड़ित

उपहार अग्निकांड में उच्चतम न्यायालय के फैसले से स्तब्ध और निराश दो किशोर बच्चों की मां का कहना है कि पैसे वाले लोग पैसा देकर बच सकते हैं लेकिन आम नागरिक के लिए एक अलग कहानी है .

 

एसोसिएशन आफ विकटिम्स आफ उपहार ट्रेजेडी (एवीयूटी) की अगुवाई करने वाली नीलम कृष्णमूर्ति उच्चतम न्यायालय के अंसल बंधुओं को 60 करोड़ रूपये का जुर्माना अदा कर बच निकलने की अनुमति देने वाले फैसले पर प्रतिक्रिया जता रही थीं . आम नागरिक के जीवन की किसी को परवाह नहीं होने पर दुख जाहिर करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘ मुझे बहुत निराशा हुई है . 18 साल पहले मेरा भगवान से विश्वास उठ गया था और 18 साल बाद मेरा न्यायपालिका से भरोसा उठ गया.’’

 

उन्होंने कहा, ‘‘ एक चीज जो मैंने महसूस की है कि कानून की अदालत अमीर और गरीब के लिए एक समान नहीं होती. पैसे वाले लोग पैसा देकर बच सकते हैं लेकिन नाम नागरिकों के लिए न्यायपालिका अलग है.’’ कृष्णमूर्ति ने फैसले के तुरंत बाद कहा, ‘‘ यदि यह नेताओं और जजों के बच्चों की जिंदगी का मामला होता तो एक साल के भीतर न्याय हो जाता . ’’

 

उन्होंने साथ ही कहा कि न्यायपालिका ‘‘एक मां की पीड़ा नहीं समझ सकती जो 18 साल तक अदालत के दरवाजे पर खड़ी रही और उसे निराशा मिली . किसी को आम नागरिक की चिंता नहीं है जबकि पैसे वाले और ताकतवर लोग बच निकलते हैं .’’

 

उन्होंने कहा कि 13 जून 1997 को जिस हादसे में 59 लोगों की जान चली गयी थी वह थियेटर के मालिकों की ‘‘जानबूझकर की गयी लापरवाही’’ का नतीजा था जिन्होंने पैसे के लालच में सिनेमा देखने वालों की जिंदगी को खतरे में डाला.

 

कृष्णमूर्ति ने कहा, ‘‘ यह जानबूझकर की गयी हत्या थी. यह जनसंहार था. जब एक व्यक्ति मारा जाता है तो आरोपी को आजीवन कारावास या 10 से 14 साल की सजा होती है लेकिन यहां वे पैसा देकर बच निकले . मेरे बच्चे मारे गए क्योंकि अंसल बंधुओं ने पैसा बनाने के लिए थियेटर में अतिरिक्त सीटें लगायी हुई थीं .’’

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