अब फेसबुक की नज़रों से बचना आसान नहीं, टेढ़ों को भी कर देगा सीधा!

By: | Last Updated: Thursday, 20 March 2014 8:10 AM
अब फेसबुक की नज़रों से बचना आसान नहीं, टेढ़ों को भी कर देगा सीधा!

फ़ेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग

दिल्ली: सोशल नेटवर्किंग साइट फ़ेसबुक एक नया फ़ीचर लांच करने वाला है जिसका नाम है ‘एफ़बीमार्क’. ये फ़ीचर एक नए सफ़्टवेयर ‘डीपफ़ेस’ पर आधारित है. फ़ेसबुक के बारे में सबसे खूबसूरत बात ये है की ये इनोवेटिव मतबल प्रगतिशील है और आए दिन इसमें कोई न कोई नई बात देखने को मिलती है पर इस फ़ीचर से यही लगता है कि फ़ेसबुक अपने आप को इंसानों के बराबर में लाकर खड़ा करना चाहता है.

 

जी, इस फ़ीचर की ख़ास बात ये है कि जिस तरह इंसानी आखें दो अगल-अलग चेहरों को पहचान लेती हैं वैसे ही अब फ़ेसबुक भी अब एक जैसे दिखने वाले दो चेहरों को ख़ुद-ब-ख़ुद पहचान लेगा. यानि की जो महीन अंतर इंसानी आंखों को ही मिला था, तकनीक के बढ़ते कदम ने अब फ़ेसबुक को वहां ला खड़ा किया है. इस नए फ़ीचर से जुड़ी जानकारी फ़ेसबुक के नए ब्लागपोस्ट और एमआईटी टेक्नॉलजी की एक रिपोर्ट में सामने आई है.

 

जब कहा गया कि वैसे तो ये तकनीक फ़ेसबुक के पास पहले से थी पर आप फ़ेस रीडिंग को इसके साथ ना मिलाएं, ऐसा कंपनी का कहना है. अगर इंसानी आंखों को दो एक जैसे चेहरों का अंतर करने को कहा जाए तो इंसानी आंखें 97.53% तक सही नतीजे देंगी. लेकिन फ़ेसबुक की पुरानी तकनीक में सही नतीजों की संभावना महज़ 25% ही थी लेकिन नई तकनीक के आने से अब दो चेहरों का अंतर बताने में फ़ेसबुक के गलत होने की संभावना 3% से भी कम है क्योंकि इस तकनीक के आने के बाद दो एक जैसे चेहरों में अंतर करने की क्षमता के मामले में फेसबुक के सही होने की संभावना 97.25% होगी.

 

इस नए सॉफ़्टवेयर की दो नई बातें-

इस नए सॉफ़्टवेयर में पहला और सबसे क्रांतिकारी फ़ीचर ये है कि एक ग्रुप फ़ोटो में मौजूद सभी लोगों के चेहरे को ये सीधा कर देगा जिससे वो व्यक्ति सामने देखता नज़र आऐगा. हर किसी के चेहरे को सामने की तरफ़ करने के लिए फ़ेसबुक ने 3D तकनीक का इस्तेमाल किया है.

 

उसके बाद ये फ़ीचर एक जैसे दो चेहरों का अंतर पता करेगा. इसके लिए जो तकनीक इस्तेमाल की जा रही है उसका नाम ‘डीप लर्निंग’ दिया गया है. लेकिन इस तकनीक के बाद भी अगर दो अगल-अगल चेहरों में इसे कई समानताएं नज़र आती हैं तो ये उन दो चेहरों को एक मानेगा.

 

चेहरे को पहचानने की तकनीक को फ़ेसबुक ने 2010 में ही लांच कर दिया था. और उसपर आधारित टैगिंग से फ़ेसबुक अपने सूज़र्स को ये बताया करता था कि ये वो लोग हैं जिन्हें आप शायद जानते हैं और फ़्रेड़ रिक्वेस्ट भेज सकते हैं.

 

अब इस नए फ़ीचर से फ़ायदा ये होगा की एक जैसी दिखने वाली तस्वीरों में टैग होने से कोई और नहीं फ़ेसबुक ही आपको बचाएगा. डीपफ़ेस जिस रिसर्च प्रोजेक्ट का हिस्सा है उसे 2014 के जून में होने वाले आई ट्रिपल ई के सम्मेलन में प्रस्तुत किया जाएगा!

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