ब्लॉग: लाशों के बीच माधुरी का ठुमका

By: | Last Updated: Wednesday, 8 January 2014 3:28 PM

सैफई एक छोटा सा गांव, आबादी 7 हजार से कुछ ज्यादा. इस गांव की पहचान है उत्तर प्रदेश के मुखिया अखिलेश यादव और उनका राजनीतिक परिवार. इन दिनों आजकल यहां बॉलीवुड के सितारों का जमघट है. इसलिए वहां की शाम कभी सलमान खान, माधुरी दीक्षित तो कभी आल्लिया भट्ठ जैसे बॉलीवुड के सितारों से सजी होती है.

 

बुधवार की शाम के रंगीन समां के सारथी राज्य के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी बने. महफिल में अखिलेश कैबिनेट के अनेक मंत्री और विधायक भी थे. सैफई और आसपास के गावों के लोग तो थे ही. लेकिन सैफई की इस रंगीन शाम को लेकर बवाल मचा हुआ है.

 

हलांकि समाजवादी पार्टी के नेता और मुलायम सिंह के भाई पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि यह कार्यक्रम कला और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए है.

 

सवाल यह नहीं है कि ऐसा कार्यक्रम आयोजित करना गलत है या सही, देश में हर वक़्त ऐसे कार्यक्रम होते रहते हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या माधुरी के ठुमके के माध्यम से कला और संस्कृति को बढ़ावा देने का उत्तर प्रदेश का सरकार का यह निर्णय सही समय पर लिया गया है ? प्रदेश में सब कुछ ठीक – ठाक है ? प्रदेश में शांति और सुकून है ? जनता की मूलभूत जरूरतें पूरी हो गईं हैं ?  जो अब बेसिक जरूरतों से ध्यान हटाकर कला और संस्कृति पर बल देने की जरूरत है ?

 

दंगों का जख्म

 

मुज्जफरनगर के दंगों का जख्म अभी भरा भी नहीं था कि राहत कैंपों में रह रहे बच्चों की ठंड से मौत का मामला सामने आने लगा. दंगों को बीते मुश्किल से अभी 4 महीने भी नहीं हुए होंगे. इन दंगों में 60 से ज्यादा लोग मारे गए हैं. अल्पसंख्यकों की राजनीति करने वाली समाजवादी पार्टी की सरकार में हुए इन दंगों में अल्पसंख्यक ही ज्यादा मारे गए. हजारों लोग राहत शिविरों में रहने को मजबूर हो गए. अगर आप उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं तो आपको यूपी की सर्दी का अंदाजा जरूर होगा और उत्तर प्रदेश सरकार के बनाए हुए राहत शिविरों की हालत का अंदाजा भी होगा.

 

खुले मैदान में बने इन राहत शिविरों में मासूम बच्चों की मौत होने लगी. हाड़ कंपाती इस सर्दी में इन राहत शिविरों में 30 से ज्यादा बच्चों की मौत हो गई. वो बच्चे जिन्हें मालूम नहीं कि उन्हें किस गुनाह की सजा, सजा ए मौत मिली है. उत्तर प्रदेश सरकार ने उनके लिए कुछ किया तो बस इतना की कुछ को 5 – 5 लाख रुपये देकर राहत शिविरों से बाहर कर दिया. साथ में वर्तमान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पिता और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह ने यह कह कर दंगा पीड़ितों के जख्मों पर ‘मरहम’ लगाया कि इन राहत कैंपों में दंगा पीड़ित नहीं कांग्रेस और बीजीपी के कार्यकर्ता रहते हैं, षड़यंत्रकारी रहते हैं. मुलायम सिंह का यह बयान उन तमाम अल्पसंख्यकों और दंगा पीड़ितों के मुंह पर करारा तमाचा था जो मुलायम सिंह को अपना रहनुमा समझते थे.

 

ये हालात सिर्फ मुज्जफरनगर, शामली या पश्चिमी उत्तर प्रदेश का नहीं है. अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद से अबतक 150 से ज्यादा संप्रदायिक सौहार्द बिगड़ने की घटनाएं हो चुकी हैं. जिनमें 30 के करीब बड़े दंगे शामिल हैं.

 

वर्तमान समय में प्रदेश में ना तो सड़कों की स्थिति ठीक है और ना बिजली की. खैर भ्रष्टाचार तो यहां कोई विषय ही नहीं है. उत्तर प्रदेश की जनता मान चुकी है यहां भ्रष्टाचार कभी खत्म ही नहीं हो सकता. मायावती के समय जो सड़कें जितनी बनी थी वो उतने पर ही रूकी हुई हैं. क्योंकि सरकार बदल गई और सरकार की प्राथमिकताएं बदल गईं.

 

युवाओं को रोजगार के नाम पर बेरोजगारी भत्ता दिया जा रहा है. प्रदेश में बिजली नहीं है लेकिन विश्व बैंक से कर्ज लेकर लैपटॉप बांटा जा रहा है. प्रदेश में लड़कियां सुरक्षित नहीं है लेकिन कन्या विद्याधन बांटा जा रहा है.

 

प्रदेश में शिक्षा का स्तर गिर रहा है लेकिन प्रदेश के नेता और मंत्री स्टडी टूर के लिए विदेश जाते हैं.

 

प्रदेश में जब ऐसे हालात हो तो क्या अखिलेश यादव को प्रदेश के मुखिया होने के नाते यह शोभा देता है कि वो अपने गांव सैफई में जनता की गाढ़ी कमाई को नाच गाने में लगाएं.

 

अगर मान भी लें कि प्रदेश सरकार की मंशा कला और संस्कृति को बढ़ावा देने की है तो इतना बड़ा आयोजन सैफई जैसे छोटे से गांव में क्यों ? सिर्फ इसलिए कि वो मुलायम सिंह के परिवार का गांव हैं ? लखनऊ, इलाहाबाद, कानपूर, गोरखपुर, वाराणसी में भी तो ऐसे सांस्कृतिक आयोजन हो सकते थे? जिनकी आबादी 40 से 50 लाख के आसपास है और वहां कला और संस्कृति को बढ़ावा देने की प्रदेश सरकार की मंशा ज्यादा अच्छे से पूरा होती.

 

आखिर ऐसा क्यों है कि उत्तर प्रदेश की हर राजनीतिक पार्टी जब सत्ता में आती है तो वो पूरे उत्तर प्रदेश का नेतृत्व ना करके सिर्फ अपने क्षेत्र का नेतृत्व करती है. उसकी प्राथमिकताओं में सिर्फ अपना जिला ही होता है. अपने क्षेत्र का विकास करना गलत नहीं है लेकिन अगर आप प्रदेश के मुखिया है जो आपकी जिम्मेदारी प्रदेश के दूसरे हिस्सों के लिए भी उतनी है जितनी की अपने क्षेत्र के लिए.

 

मुलायम सिंह जब सत्ता में थे तो अपने गांव सैफई में एयरपोर्ट बनवा दिया. आप बताइये की 7 हजार की ग्रामीण आबादी वाले इस गांव में कितने लोग हैं जो हवाई यात्रा करेंगे ? मायावती सत्ता में थीं तो हाथी की मूर्तियां और पार्क बनवाने के सिवा उन्होंने कुछ नहीं किया. यूपीए की मुखिया सोनिया और कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने अमेठी और रायबरेली को छोड़कर प्रदेश के लिए कुछ नहीं किया. अब अखिलेश यादव के हाथ में प्रदेश की कमान है तो आस्ट्रेलिया में पढ़े इस युवा मुख्यमंत्री ने 334 करोड़ रुपये 7 हजार की आबादी वाले सैफई गांव के विकास के लिए दे दिए.

 

अब उन्हीं पैसों से सैफई में विश्वस्तरीय स्वीमिंग पूल बन रहा है, कला और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए बॉलीवुड की हर नामचीन हस्ती का सैफई में प्रोग्राम हुआ. माधुरी के ठुमके, तो सलमान के जलवे. समाजवादियों के चेहरे पर मुस्कान. तो अखिलेश – मुलायम, पिता – पुत्र का एक साथ डेढ़ इश्कियां का लुफ्त उठाना. और प्रदेश के किसी कोने में कुछ दंगा पीड़ित परिवार होंगे जो रात गुजारने के लिए किसी आशियाने की तलाश कर रहे होंगे. कुछ ऐसे भी परिवार होंगे जिन्होंने दंगों में अपनों को खोने के बाद हाल ही में राहत कैंपों में सर्दी की वजह से फिर कुछ उन अपनों को खोया हो जो दंगों में बच गए थे.

 

खैर लाशों के बीच आप माधुरी के ठुमके का आनंद लीजिए.

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