बिहार चुनाव : मतदान के अंतिम दिन का विश्लेषण

By: | Last Updated: Thursday, 5 November 2015 7:12 AM

बिहार विधान सभा का एक और चुनाव इसी हफ्ते दूध का दूध और पानी का पानी हो जायेगा. आज मतदान का अंतिम दिन है. शाम को एक्जिट पोल के नतीजे कुछ रास्ता दुनिया को दिखायेगें. यह अलग बात है कि दोनों ही पक्षों को मालूम है कि उनका क्या होने वाला है. आज तक की खबर है कि एनडीए को तो तिहाई बहुमत मिल रहा है. बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने यह बात बार बार कही है. चुनाव अभियान के दौरान एबीपी न्यूज़ के साथ ख़ास इंटरव्यू में यह बात उन्होंने बहुत जोर देकर कही. यही बात उन्होंने एक अंग्रेज़ी न्यूज़ चैनल से भी कही. बिहार बीजेपी के नेता लोग तो कहते ही रहते हैं.

 

वैसे दो तिहाई से ज़्यादा बहुमत लालू प्रसाद यादव के महागठबंधन का भी आ रहा है. यह बात लालू यादव जिस स्टाइल से कहते हैं, उससे उनको पूरी उम्मीद रहती है कि उनकी बात का विश्वास किया जा रहा है. इन नेताओं के दावों पर विश्वास किया जाए तो अमित शाह वाले गठबंधन की 162 सीटें या उससे ज़्यादा आयेगीं और लालू यादव के गठबंधन की भी 162 सीटें पक्की हैं. सवाल यह है कि एक ही चुनाव लड़ रही दोनों पार्टियां जो एक दूसरे को चुनौती दे रही हैं, उनमें दोनों का दो तिहाई बहुमत कैसे आ सकता है. सवाल यह भी है कि जिस विधान सभा में केवल 243 सीटें हैं वहां 324 विधायक कैसे जीत सकते हैं. अगर एक पक्ष की 162 सीटें आ रही हैं तो दूसरे के लिए तो 81 ही बचती हैं. एक गठबंधन के हिस्से तो एक तिहाई आना ही पड़ेगा.

 

सवाल कठिन है. ज़ाहिर है दोनों ही पक्षों के जवाब गलत हैं. या कम से कम एक पक्ष का जवाब तो हर हाल में गलत है. लेकिन इसका जवाब लालू प्रसाद यादव ने 2010 के बिहार विधान सभा के चुनावों के बाद दे दिया था. उस बार भी नीतीश-बीजेपी गठबंधन और लालू यादव का गठबंधन जीत के दावे कर रहे थे. चुनाव के बाद जब लालू यादव से पूछा गया कि आप तो कह रहे थे कि दो तिहाई बहुमत आ रहा है और बुरी तरह से हार गए. चुनाव अभियान के दौरान सब को लग रहा था कि आपकी पार्टी हार रही है लेकिन आप जीत के दावे किये जा रहे थे तो लालू यादव ने कहा कि जब आप युद्ध के मैदान में होते हैं तो अपने सैनिकों का मनोबल बनाए रखने के लिए जीत को सुनिश्चित बताते हैं, ऐसा तब भी करना होता है जब सामने पराजय मुंह बाए खड़ी हो यानी चुनाव अभियान के दौरान नेताओं की बातों का विश्वास सत्य के रूप में नहीं किया जाना चाहिए.

 

बिहार विधान सभा चुनाव 2015 के वास्तविक प्रचार के पहले यह सब को मालूम था कि बीजेपी इस चुनाव को जीतने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा देगी. खासकर दिल्ली विधान सभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुनाव जीतने की क्षमता की चमक को बनाये रखने के लिए ज़रूरी था. दिल्ली को 1967 से ही बीजेपी/जनसंघ का गढ़ माना जाता है, वहां की हार की तरह तरह की राजनीतिक व्याखाएं हो रही हैं अगर बिहार भी उसमें जुड़ जाता है तो ब्रैंड नरेंद्र मोदी के लिए बहुत मुश्किल हो सकती थी. इसलिए यह तय था कि जीतने के लिए हर जायज़ तरीका अपनाया जाएगा. बीजेपी ने 2014 का लोकसभा चुनाव विकास के मुद्दे पर जीता है और अच्छी तरह से जीता है. नरेंद्र मोदी उसके सबसे बड़े प्रचारक हैं, सबसे बड़े नायक हैं. ज़ाहिर है दोनों ही बातें बिहार में रहेगीं.  चुनाव के शुरू में विकास मुद्दा भी रहा लेकिन ज्यों-ज्यों अभियान आगे बढ़ा, हालात बदलते गए. नरेंद्र मोदी की जाति और द्वारका से आने की बातें की जाने लगीं. लालू यादव और नीतीश कुमार को प्रोवोक करने की कोशिश भी हुयी.

 

सच्चाई यह है कि इस चुनाव में अभियान का दर्ज़ा बहुत ही निचले स्तर पर पंहुंच गया. डर्टी ट्रिक भी अपनाई गयी. उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर जिले में 2013 में हुए दंगे ने 2014 के चुनाव के माहौल को पूरी तरह से बदल दिया था. उसी तर्ज़ पर गौतमबुद्ध नगर जिले के दादरी के पास भी कुछ उकसाऊ कार्य किया गया. मुज़फ्फरनगर में जो लोग कर्ता-धर्ता थे उनको भी दादरी में उतारा गया लेकिन बाद में पता चला कि गोमांस का मुद्दा बिहार में उल्टा असर डाल रहा है. बीजेपी के रणनीतिकारों को मालूम ही नहीं था कि हज़ारों वर्षों के सामंती शोषण के शिकार हुए पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में गरीबी के कौन कौन से तांडव होते रहे हैं . गंगा के इस सबसे उपजाऊ इलाके में कुछ जातियों के लोगों को मरे हुए जानवरों के मांस को भी भोजन के रूप में स्वीकार करने को अभिशप्त रहना पड़ा है इसलिए मरे हुए खेती के जानवरों का गोश्त इस इलाके की कुछ बहुत गरीब जातियों के भोजन का हिस्सा ऐतिहासिक रूप से बन चुका था. इन इलाकों में कुछ जातियों को लोग तो सदियों से चूहा आदि भी खाते रहे हैं. हालांकि अब ऐसी हालात नहीं हैं लेकिन बीफ को मुद्दा बनाकर इन जातियों में पैदा हुए लोगों को प्रोवोक नहीं किया जा सकता. वह सांस्कृतिक रूप से उन जातियों के लोगों को वैसा धक्का नहीं पंहुचाता जैसा कि गाय की पूजा करने वाले सवर्ण और गौपालक जातियों में. लिहाज़ा वह भी फेल हो गया.

 

बीजेपी की रणनीति का अहम हिस्सा था कि लालू यादव को ही मुद्दा बना दिया जाए. उनके 15 साल के राज में बिहार में जिस तरह का आतंक फैला था उसको ही चुनावी चर्चा का संचारी भाव बना दिया जाए. चारा घोटाले में उनके सज़ा याफ्ता होने को भी चुनावी मुद्दा बनाया गया लेकिन चला नहीं. क्योंकि लालू के तथाकथित जंगल राज के कई नेता तो बीजेपी के गठबंधन में थे या पप्पू यादव जैसे लोग लालू के खिलाफ अभियान चला रहे थे. चारा वाला मामला भी चला नहीं क्योंकि जगदीश शर्मा और जगन्नाथ मिश्र भी चारा घोटाले में सज़ा पा चुके हैं और वे इस चुनाव में लालू के खिलाफ थे और बीजेपी के पक्षधर बताये जा रहे थे.

 

इस चुनाव की बीजेपी की रणनीति में नरेंद्र मोदी की सभाओं की कारपेट बाम्बिंग करके नीतीशकुमार और लालू यादव को प्रोवोक करना भी एक ख़ास तरकीब सोची गयी थी. उम्मीद की गयी थी कि लालू यादव को भड़का दिया जाएगा और वे उल जलूल बोलने लगेगें लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. पूरे चुनाव में लालू यादव केवल एक बार भड़के जब एबीपी न्यूज़ के कार्यक्रम, घोषणापत्र में वे प्रश्नकर्ता को हड़काने लगे और उसको बीजेपी के पास जाकर राज्यसभा की सीट की मांग करने की सलाह देते पाए गए. शायद वे प्रश्नकर्ता की जाति से वाकिफ थे और बिहार में जब लालू यादव ने चुनाव अभियान को अगड़ा बनाम पिछड़ा रंग दिया तो वह हर आदमी शक के घेरे में आ गया जो किसी अगड़ी का सदस्य था लेकिन बीजेपी वाले लालू यादव को प्रोवोक नहीं कर पाए. पूरे चुनाव अभियान में उन्होंने या राबड़ी देवी ने सेकुलर ताक़तों की एकजुटता की बात नहीं की. जब कि जब एम वाई (मुस्लिम यादव) गणित का ज़माना होता था तो तत्कालीन मुख्यमंत्री राबड़ी देवी इस शब्द का भरपूर प्रयोग करती थीं.  सही बात यह है कि लालू यादव तो नहीं भड़के लेकिन बीजेपी के कई नेताओं ने अपने विवादास्पद बयानों से माहौल को गरमा दिया. भाषा की मुकामी रंगत को न समझ पाने की वजह से भी बीजेपी को परेशानी हुयी. मसलन जब प्रधानमंत्री ने लालू प्रसाद यादव की बेटी मीसा भारती को “सेट” करने की बात कही तो उनको मालूम नहीं रहा होगा कि भारत के इस इलाके में सेट करना शब्द क्या अर्थ रखता है. चुनावी अभियान की भाषा को अगर क्रिकेट की शब्दावली में समझने के प्रयास करें तो इसको लूज़ बाल कहा जाएगा. क्रिकेट में जब गेंदबाज़ लूज़ बाल फेंकता है तो उसपर छः रन बनते हैं, एक छक्का लगता है लेकिन राजनीति में ऐसा नहीं होता. उसमें एक लूज़ बाल पर पूरी टीम छक्का मारती है और मीडिया उसमें अम्पायर बन बैठता है. इसी सेट करने वाली बात के बाद ही तो मीसा भारती ने नरेंद्र मोदी को गली के गुंडे जैसी बात करने वाला कह दिया था.

 

ज़ाहिर है यह चुनाव विमर्श के लिहाज़ से बहुत नीचे जाकर लड़ा गया है. इस चुनाव की एक ख़ास बात और रही है कि नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री के रूप में सभी लोगों ने पसंद किया, उनके विरोधियों ने भी. चुनाव की रणनीति के अध्ययन में भी राजनीति शास्त्र के विद्यार्थी को बहुत सारे नए आयाम शोध के लिए इस चुनाव ने उपलब्ध करवाया है. उस पर भी विस्तार से चर्चा की जायेगी लेकिन इस चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण और अविश्वसनीय बात यह रही कि लालू और नीतीश को किसी तरह से प्रोवोक नहीं किया जा सका. आरक्षण के मुद्दे ने इस इस चुनाव में स्थाई भाव ग्रहण कर लिया था लेकिन वह एक अलग शोधपत्र का विषय है.      

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Web Title: Bihar polls: Analysis of the final day of voting
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