‘क्यों चुनिए’ ऐसे लोगों को जिनकी फ़ितरत छुपी रहे, असली चेहरा सामने आये, नकली सूरत छिपी रहे!

By: | Last Updated: Thursday, 29 October 2015 10:46 AM
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चुनाव में फ़िल्मी पैरोडियों और गीतों ने अक्सर ही अपना रंग दिखाया है. इमरजेंसी के बाद 1977 के चुनाव में इन्दिरा गाँधी और काँग्रेस की ऐतिहासिक हार हुई. उस वक़्त फ़िल्म ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ के कई गानों ने ख़ूब धूम मचायी थी. पूरे प्रचार की रंगत बदल दी. उसी तर्ज़ पर अब नीतीश कुमार ने फ़िल्म ‘थ्री इडियट्स’ पर पैरोडी बनाकर सनसनी फैला दी.

 

पूछा कि ‘बहती हवा सा था वो, गुजरात से आया था वो, कालाधन लाने वाला था वो, कहाँ गया उसे ढूँढ़ो.’ नीतीश को मुँहतोड़ जबाव देने के चक्कर में मोदी ख़ेमे से भी खिसियाहट भरा जबाव उभरा. मोदी बोले, महागठबन्धन, ‘थ्री इडियट्स’ का ‘स्वार्थबंधन’ है. नीतीश, लालू और सोनिया इसके ‘थ्री इडियट्स’ हैं. पलटवार करते वक़्त मोदी ये भूल गये कि ‘थ्री इडियट्स’ में जिन्हें मूर्ख समझा जा रहा था, वही फ़िल्म के नायक थे.

 

‘थ्री इडियट्स’ ख़ास ढर्रे की जीवन शैली और पारम्परिक सोच के ख़िलाफ़ खड़े होकर भी क़ामयाब हुए. अपनी शर्तों पर जीने में सफल हुए. फ़िल्म का सन्देश बहुत सकारात्मक था. उसमें नकारात्मक क़िरदार थे. रोड़े अटकाने वाला प्रिंसिपल सहस्रबुद्धे और लकीर का फ़क़ीर तथा रटन्त विद्या में माहिर छात्र चतुर रामालिंगम.

 

 सहस्त्रबुद्धे ऐसा क़िरदार है जो अनुशासन का ढोल पीटता है, ख़ुद को सर्वज्ञ, सर्वगुण सम्पन्न और सर्वशक्तिमान समझता है. लेकिन संकट की घड़ी में उसका पेंच (स्क्रू) ढीला हो जाता है. चतुर रामालिंगम वाकई में चतुर है. साम-दाम-भेद-दंड की नीति के तहत चोरी करता है, जासूसी करता है, येन-केन-प्रकारेण अपना उल्लू सीधा करके  अन्ततोगत्वा ‘सफलता’ के शिखर पर पहुँचता है. अब आप करें कि किस नेता में ‘थ्री इडियट्स’ के कौन सा क़िरदार है!

 

विरोधी नेताओं को ‘थ्री इडियट्स’ और बिहार के पत्रकारों को दरबारी बताना, क्या ये साबित नहीं करता कि धार्मिक ध्रुवीकरण के ब्रह्मास्त के बावजूद प्रदेश की सियासत ने प्रधानमंत्री जैसी हस्ती की भाषा को अराजक बना दिया है! ये कैसी खिसियाहट है? ये ठीक है कि बीजेपी ने कभी आरक्षण की समीक्षा की बात नहीं की. लेकिन उसने अपने ‘वैचारिक गुरु’ मोहन भागवत के उस बयान का कभी खंडन भी नहीं किया कि ‘कोई कुछ भी कहे, आरक्षण के आधार की समीक्षा तो होनी ही चाहिए.’

 

अब जिस बात के लिए लालू, फाँसी पर चढ़ना चाहते हैं, उसी के लिए अति-पिछड़े मोदी जी भी जान की बाज़ी लगाने को आतुर हैं! उधर सुप्रीम कोर्ट, सरकार से ‘प्रतिभा के सम्मान’ की गुहार लगा रहा है. उसे कौन कहेगा कि आप काम गुहार लगाना नहीं फ़ैसले सुनाना है! अगर लालू हवा में तीर चला रहे हैं तो आप ‘पाँच फ़ीसदी आरक्षण देने की साज़िश’ का भंडाफोड़ किस आधार पर कर रहे हैं? कहीं ये धार्मिक ध्रुवीकरण का खेल को नहीं?

 

लोकसभा चुनाव में मोदी जी ने ‘माँ-बेटे की सरकार’ वाले ज़ुमले से क्या समाँ बाँधी थी! कौन भूला होगा उसे? ऐसे ही अन्य नारों मसलन, ‘सबका साथ, सबका विकास’, ‘अबकी बार, मोदी सरकार’, ‘अच्छे दिन आएँगे’ जैसे नारों ने चुनाव को कितना रोचक और  जीवन्त बना दिया था. इन ‘महान’ नारों के आगे विरोधियों के बेजान और फुस्स नारों का ज़िक्र क्यों हो? अभी तक के बिहार के चुनाव में एक ही नारे में कटाक्ष की ताक़त दिखी, ‘हर-हर मोदी, अरहर मोदी’. ऐसा ही चमत्कारी नारा कभी बहन मायावती ने दिया था, ‘चढ़ गुंडन की छाती पर, मोहर लगेगी हाथी पर’. नीतीश और बीजेपी जब साथ थे तब जंगलराज वाला नारा भी ‘हिट’ था. नारों में भी जनता की नब्ज़ भाँपकर ईवीएम में सही जगह पर अँगुली ‘प्रेस’ करवानी की क्षमता होती है.

 

 

लेकिन अब हिन्दी के वाक्यों में अँग्रेज़ी के प्रचलित शब्दों का इस्तेमाल करने से भी डर लगता है. न जाने किसकी धार्मिक भावना आहत हो जाए! कौन दलाल, एजेंट, प्रेस्टीच्यूट, पेड-न्यूज़, काँग्रेसी, पाकिस्तानी, पैसा खाकर लिखने वाला पत्रकार जैसी उपमाओं से सम्मानित होने लगे! वैसे मौजूदा दौर क़लमकारों के लिए कठिन घड़ी है.

 

 

 कुछ कहते हैं, ये घड़ी क़लम की धार के लिए बेहद माकूल है. रहीम ने कहा था, ‘रहिमन चुप हो बैठिये देखि दिनन के फेर, जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं देर’ यानी जब कठिन-घड़ी हो तो चुप ही बैठना चाहिए, क्योंकि अच्छे-दिन आते ही बात बनते देर नहीं लगती. और, ‘रहिमन निज मन की व्यथा मन में राखो गोय, सुनि इठलैहैं लोग सब बाटि न लैहै कोय’ यानी अपना दुःख अपने मन में ही रखना चाहिए क्योंकि लोग तमाशा देखेंगे, मज़ाक उड़ाएँगे, लेकिन मदद के लिए आगे नहीं आएँगे. कबीर ने कहा, ‘साधू ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय, सार सार को गहि रहे थोथा देय उड़ाय’ यानी सज्जन व्यक्ति का स्वभाव सूप की तरह होना चाहिए जो फ़ालतू चीज़ों को छाँट देता है और काम की वस्तु को संवार देता है.

 

दिक़्क़त ये भी है कि अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ाना और कबीर को नाम को ‘छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी’ बताया जाएगा. इनकी बातों का तो राष्ट्रद्रोही होना तय है! इसीलिए तुलसी बाबा भी ढरों मारक बात सिखा गये. पहला, ‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरती देखी तिन तैसी’ यानी, जिसकी जैसी भावना होती है वो ईश्वर की वैसी ही तस्वीर देखता है, बाकी प्रभु तो निर्गुण-निराकार हैं, उसका तो कण-कण में वास है. और दूसरा, और ‘जाको प्रभु दारुन दुख देहीं, वाकी मति पहिले हर लेहीं’ यानी जिसे प्रभु असीम दुःख देने वाले होते हैं, उसका बुद्धि-विवेक पहले ही छीन लेते हैं, ताकि वो कर्म ही ऐसे करे जो घोर अनिष्टकारी हों. यदि ऐसा नहीं होता तो लालू और उनकी ‘विफल नेता’ साबित हुई बिटिया मीसा को ‘सेट’ शब्द अपमानजनक नहीं लगता. पूरी हिन्दी पट्टी में इस ‘सेट’ शब्द का व्यापक इस्तेमाल होता रहा है. लेकिन शायद बाप-बेटी इससे अन्जान थे. तभी तो उन्होंने ‘सेट’ शब्द को ‘डाउन-मार्केट’ माना और ख़ुद को ‘अप-मार्केट’.

 

 

राजनीति में भी ‘सेट’ शब्द की महिमा निराली रही है. बीजेपी में भी वंशवाद के पोषक तमाम राजनेता हैं. लेकिन उन्हें तकलीफ़ हमेशा गाँधी, यादव, अब्दुल्ला, चौटाला, बादल, सिंधिया, पायलट, जतिन प्रसाद, बरक़त उल्ला, गोगोई, पासवान, पटनायक, रेड्डी, नायडू, ओवैसी जैसे उन ख़ानदानों से ही रही है, जो उनकी गोदी में न बैठा हो. गोदी में बैठे व्यक्ति के ख़ानदान को वो गंगा-जल छिड़क शुद्ध कर देते हैं. अब लालू तो ऐसे ख़ानदानी यादव कभी रहे नहीं लिहाज़ा ‘सेट’ शब्द से भड़क गये. वैसे भी लालू क़ुदरती तौर पर भड़कने में सिद्धहस्त रहे हैं. इसी चुनाव में वो किस दिन नहीं भड़के! बाक़ी, कौन नहीं जानता कि इस चुनाव में वो अपने दोनों राजकुमारों को मनसबदार बनाने के अलावा किस बात के लिए बिहार की ख़ाक छान रहे हैं! कौन भूला है कि बेटी मीसा की नेतागिरी को जमाने के लिए उन्होंने अपने ‘हनुमान’ रामकृपाल यादव की बलि दे दी थी.

 

 

बिहार की गँवई बोलियों में मैथिली, भोजपुरी, मगही और अंगिका की स्वर-लय के मुताबिक़, घर-घर में जो भाषा बोली जाती है, उसमें ‘सेट’ शब्द न जाने कब से पूरी तरह से सहज और भाषायी बन चुका है. मसलन, ‘तोहर छोटका बेटवा त खुदे सेट हो गइल. लेकिन बड़का के अब तू तनी जोर लगा द कि उहो सेट हो जाव. कुछ पैसा-कौरी देके ओके एगो छोट-मोट धंधवे शुरू करा द, तब उहो सेट हो जाई.’ साफ़ है कि ‘सेट’ शब्द का मतलब है अपने कामकाज़ या घर-गृहस्थी में रम-जम जाना. सब नेता बेटा-बेटी को ‘सेट’ करते हैं. पत्नी को भी ‘सेट’ करवाया जाता है. कोई पार्टी इसका अपवाद नहीं है. कोई भी नेतागिरी में ‘सेट’ तभी हो पाता है, जब चुनाव जीतता है. बाप-दादा का नाम सिर्फ़ पहचान के लिए है. हार गये तो गये काम से. नेताओं के सैकड़ों परिजन पहले भी फुस्स साबित होते रहे हैं. ‘ख़ानदान के नाम’ से बस कुछ आसानी हो सकती है. ये राम-बाण नहीं है. जनता एक-दो फ़ीसदी से ज़्यादा ‘ख़ानदानियों’ को हज़म नहीं करती. इसीलिए लालू का तेवर ‘देसी मुर्गी बिलायती बोल’ जैसा है.

 

बहरहाल, चुनाव के प्रचार गीतों में पैरोडियों की ताक़त को पहले भी ख़ूब आज़माया गया है. पैरोडियाँ दुधारी तलवार की तरह होती हैं. कभी ये विरोधियों पर कटाक्ष करती हैं तो कभी नारों और ज़ुमलों की तरह अपना गुणगान करती हैं. मुहावरे, लोकोक्तियाँ और पैरोडियाँ अगर तीख़े वार नहीं करेंगी, अगर कम शब्दों में गहरे घाव नहीं करेंगी तो जीवन में साहित्यिक और सांस्कृतिक नीरसता कितनी विकट हो जाएगी! फ़िल्म ‘इज़्ज़त’ का वो गाना किसी भी पार्टी के लिए सर्वश्रेष्ठ पैरोडी बन सकता है कि जिसके बोल हैं, ‘क्या मिलिए ऐसे लोगों को जिनकी फ़ितरत छुपी रहे, असली चेहरा सामने आये नकली सूरत छिपी रहे…’. इसमें सिर्फ़ ‘क्या मिलिए’ की जगह ‘क्यों चुनिए’ लगाइए और पूरा गाना ज्यों का त्यों रहने दीजिए. ग़ज़ब है साहिर लुधियानवी का ये गीत जो हरेक पार्टी पर ख़रा उतरता है. ‘हाथी के पैर में सबका पैर’ की तरह. सचमुच. ख़ुद सुनकर देखिए.

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