व्यक्ति विशेष: लालू की लंगड़ी!

By: | Last Updated: Saturday, 24 October 2015 4:37 PM
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ठेठ देसी अंदाज में जनता के साथ सीधा संवाद करने वाले लालू प्रसाद यादव देश के शायद इकलौते ऐसे राजनेता है जो अपनी सभाओं में मजाकिया बातें करते हैं, चुटकुले सुना कर लोगों को हंसाते हैं और अपनी बातों की पोटली से निकालकर ऐसे – ऐसे जुमलों के तीर बरसाते हैं जिन्हें सुनकर लोग तालियां बजाने और वोट देने पर मजूबर हो जाते हैं.

 

बिहार के मौजूदा चुनाव में यूं तो प्रधानमंत्री मोदी से लेकर नीतीश कुमार और हेमामालिनी से लेकर अजय देवगन तक राजनीति और बॉलीवुड के तमाम धुरंधर मौजूद हैं लेकिन लालू प्रसाद यादव के अनूठे चुनाव प्रचार और उनकी जुमलेबाजी ने एक बार बिहार के चुनाव को मसालेदार बना दिया है. बिहार की राजनीति में कभी करिश्मा बन कर उभरे लालू यादव का चार्म, उनका अंदाजे बंया और आम लोगों के साथ जुड़ने की उनकी योग्यता का अपना एक इतिहास रहा है. लालू के वाकचातुर्य, उनकी भाषा शैली और उनकी संवाद कला को लेकर देश – विदेश में भी खूब चर्चाए होती रही है लेकिन मौजूदा बिहार चुनाव में लालू ने ऐसा बल्ला घुमाया है कि बीजेपी और उसके सहयोगी दलों को अपने आक्रामण का रुख नीतीश कुमार से हटाकर लालू की ओर ही मोड़ना पड़ा है. विकास के मुद्दे और प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे के सहारे बिहार के चुनावी मैदान में उतरे एनडीए को बीच चुनाव में अपने प्रचार की रणनीति भी बदलनी पड़ी है तो उसके पीछे बड़ी वजह लालू प्रसाद यादव है.

 

बिहार विधानसभा चुनाव में दो दौर की वोटिंग हो चुकी है लेकिन मतदान के तीन दौर अभी बाकी है इसीलिए राज्य में चुनाव प्रचार अभियान पूरे उफान पर है. और राजनीतिक दलों के बीच आरोप – प्रत्यारोप का दौर भी अब और ज्यादा तेज हो चुका है. बिहार की इस चुनावी जंग में जहां राजनीतिक दल अपने मुद्दे बदल रहे हैं वहीं कुछ पार्टियों के बैनर और पोस्टरों पर नेताओं के चेहरे भी बदले जा रहे हैं. सवाल ये है कि जिस तेजी से नेताओं के चेहरे बदल रहे हैं. क्या उतनी ही तेजी से बिहार में हार- जीत के समीकरण भी बदल रहे हैं.

 

बिहार चुनाव लालू – नीतीश के महागठबंधन और एनडीए के लिए नाक का सवाल बन चुका है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भी ये चुनाव बेहद अहम माना जा रहा है और यही वजह है कि प्रतिष्ठा का सवाल बने बिहार चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक चुकी बीजेपी के निशाने पर अब खास तौर पर लालू प्रसाद प्रसाद यादव आ गए है. दरअसल बिहार में दस साल के शासन के बावजूद नीतीश कुमार लोकप्रियता के मामले में काफी आगे नजर आ रहे हैं. नीतीश के मुकाबले में बीजेपी ने अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार भी घोषित नहीं किया है. यही वजह भी है कि चुनावी रणनीति के तहत अब बीजेपी नीतीश पर सीधे हमले करने से बच रही है और बीच चुनाव में अब उसके निशाने पर महागठबंधन के सबसे बड़े नेता लालू प्रसाद यादव है क्योंकि लालू औऱ उनकी पत्नी राबड़ी देवी के 15 साल के कुशासन से मुक्ति की अपील बीजेपी की हर बड़ी चुनावी सभा में गूंज रही है.

 

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक शंकर्षण सिंह ठाकुर बताते हैं कि लालू यादव पर अटैक इसलिए ज्यादा हो रहा है कि बेस पर उनका वोट ज्यादा है और वो एक महागठबंधन के लिए बहुत बड़ा एसेट बन कर आए हैं. बीजेपी की तरफ से बहुत कोशिश हुई थी कि नीतिश कुमार को लालू के पुराने रिकार्ड पर छिड़ा छिड़ाकर ये गठबंधन तोड़ दिया जाए पर वो टूटा नहीं जितना अटैक हुआ वो गठबंधन और मजबूत होते चला गया. यहां तक कि अब आप देंखेगें कि ग्राउंड लेबल पर एक बैकवर्ड का एक बहुत कांसुलिडेशन हो चुका है और इसमें आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत के बयानों का भी बहुत बड़ा हाथ है. उन्होंने जो आरक्षण पर टिप्पणी कर दी एत बार दो बार नहीं 3 बार टिप्पणी कर दी कैंपेन के दौरान उसका फायदा महागठबंधन ने भरपूर उठाया.

 

बिहार चुनाव के शुरुआती दौर में विकास का मुद्दा सबसे ज्यादा और ज़ोर शोर से उछाला गया था लेकिन जैसे – जैसे चुनाव आगे बढ़ता गया विकास के मुद्दे के अलावा दूसरे कई मुददों भी चुनाव प्रचार में हावी होते गए. बीजेपी और एनडीए जहां अपने प्रचार अभियान में गोमांस, जंगराज और चारा घोटाले जैसे मुद्दों पर लालू यादव को घेरने की कोशिश करते नजर आए हैं वहीं लालू यादव भी आरक्षण, कालाधन और पिछड़ों के मुद्दों पर प्रधानमंत्री मोदी और एनडीए पर जमकर पलटवार कर रहे हैं.

 

राजनीतिक दलों के अंदर बदलती निष्ठाओं और मुद्दों के बीच बिहार का चुनाव बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच चुका है. कास्ट पॉलिटिक्स में उलझी बिहार की चुनावी राजनीति में राजनीतिक दलों की दोस्ती-दुश्मनी का पेंच भी बुरी तरह से फंसा हुआ है.

 

सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय करके जैसे ही लालू प्रसाद यादव का हेलीकॉप्टर सभास्थल पर उतरता है इसी के साथ लालू यादव भी एकदम हरकत में आ जाते हैं, और जमीन पर कदम रखने के साथ ही उनका एक्शन भी शुरु हो जाता हैं. लालू बिहार के मतदाताओं के सामने कौन – कौन से मुद्दे उठा रहे हैं. वो महागठबंधन के पक्ष में वोट देने के लिए क्या- क्या दलीलें दे रहें हैं.

 

लालू यादव अपनी सभाओं में लोगों से सीधे बात करते हैं. वो आकंडे नहीं गिनाते वो योजनाओं की बात नहीं करते हैं. विकास की बात करने का भी उनका अपना तरीका है. लोगों तक वो बातें पहुंचाना चाहते हैं जो महागठबंधन के हित में जरुरी है. जैसे  सभा में वो बोल रहे हैं कि कौन मंत्री बनेगा ये महत्वपूर्ण नहीं है. महत्वपूर्ण ये है कि ये देश की लड़ाई है औऱ इसमें सबको महागंठबन का साथ देना है. लालू यादव अपनी सभा में वो मुद्दे उठाते हैं जो कि जनता को जाकर सीधे समझ में आए. चाहें वो बातचीत के स्तर की बात हो अगड़े पिछड़ों की बात हो रिजर्वेशन की बात हो गरीबी की बात हो, महंगाई की बात हो. और ये कहकर वो सीधा संपर्क साधते हैं लोकसभा चुनाव की बात करते हैं कि जो वादे किए गए थे वो पूरे नहीं किए गए.

 

बिहार की राजनीति के सबसे माहिर खिलाड़ी माने जाने वाले लालू यादव जब अपनी चुनावी सभाओं में तय वक्त से पहले पहुंच जाते हैं तो वहां भी उनकी एक अलग राजनीतिक कलाबाजी देखने को मिलती है. सभा में वक्त से पहले पहुंचे लालू भाषण देने की बजाए लोगों के इक्ट्ठा होने का इतंजार करते हैं और इस बीच उनका एक और रुप ऊभरकर जनता के सामने आता है. दरअसल मौका भांप कर लालू फौरन ही मंच का मैनेजमेंट अपने ही हाथों में ले लेते हैं. मंच पर माइक सही लगा कि नहीं लगा, लाउडस्पीकर का मुंह किस तरफ है. लोग किधर बैठे, और किधर जाएं. हर वो तरीका, हर वो बात लालू अपने ठेठ गंवई अंदाज में आजमाते हैं जो वोटरों के दिल पर सीधे चोट कर सके. दरअसल लालू प्रसाद यादव पहले भी ऐसा करके खुद को जनता के साथ निजी तौर पर जोड़ने की कोशिश करते रहे हैं और मौजूदा चुनाव में भी वो अपना यही पुराना फॉर्मूला आजमाते नजर आ रहे हैं.   

 

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक शंकर्षण सिंह ठाकुर बताते हैं कि नीतिश कुमार को जो व्यक्तित्व है और उनका जो भाषण देने का स्वभाव है वो लालू यादव के कंपेरिजन में बड़ा बोरिंग है. लालू जहां जहां जाते है मजाकिया बात करते हैं उनका एक करिश्मा है . उनका एक चार्म है उनका एक बात करने का ढ़ग है उनका लोगों के साथ जो कनैक्ट करने की जो एबिलिटी है हमेशा से रही है. मेरी समझ से तो मैंने आजतक पूरे इस देश में जिस तरह से लालू यादव क्राउड से कनैक्ट कर पाते हैं. काम्युनिकेशन वो किसी भी भाषा में करते हैं या जो भी भाषा में करते हैं उनका जो वाक्य चातुर है वो एकदम अनूठा है और उसकी कोई और मिशाल नहीं है तो मीडिया भी वहीं जाती है और लोग भी वहीं जाते है और लगता है कि लालू ही स्टार कैंपेनर है.

 

बिहार की राजनीति पर लालू यादव की बरसों पुरानी मजबूत पकड़ और उनके ऊंचे कद को उनके विरोधी भी स्वीकार करते रहे हैं. लालू ने करीब 15 सालों तक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से बिहार पर शासन किया है. वो केंद्र की यूपीए सरकार में रेल मंत्री भी रह चुके हैं. खास बात तो ये है कि जिन नीतीश कुमार ने लालू यादव को बिहार की सत्ता से बेदखल किया था आज उन्हीं के साथ मिलकर वो बिहार में चुनाव भी लड़ रहे हैं.

 

लालू प्रसाद यादव ने बोला लालू के राज में आलू कभी मंहगा हुआ? लालू के राज में आलू 2 रुपया किलो. आलू 2 रुपया किलो..आलू 2 रुपया किलो..आलू 2 रुपया किलो..हटाओ..सरकार तो हरगलव है. हमरा पॉवर दो…लालू का जब कांग्रेस नहीं हुआ. हम बैठाया इन लोगों को, बचाया तो लालू का नहीं हुआ तो जो सोचते होंगे कांग्रेस के लिए आपको कौन पूछने वाला है. मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं है. और ऐसे घसक रहे है जैसे लालू को जानते नहीं हैं.

 

वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन बताते हैं कि लालू जी के समर्थन का आधारा. एक ग्रुप के तौर पर देखेंगे तो उतना बढा आधार अभी कम नेता के पास है. पिछले चुनाव में भी उनको एक करोड़ से ज्यादा वोट आए थे. तो लालू का बेस आप खत्म मत मानिए भले ही आज पिट गए हो. या फिर कोर्ट भी उनके खिलाफ चला गया हो. लेकिन कल को वो या उनकी पार्टी का कोई काबिल नेता निकलकर आता है. तो वो किस तरह से संभावता है ये देखने की चीज होगी.

 

बिहार की राजनीति में उतार –चढ़ाव भरा एक लंबा दौर देखने वाले लालू यादव जिस पिछड़े वर्ग से आते हैं. उसकी पृष्टभूमि का इस्तेमाल ही उन्होंने बिहार में पिछड़ों और दलितों को गोलबंद करने में किया है. इस बात से शायद ही कोई इंकार करे कि लालू यादव जब बिहार के मुख्यमंत्री थे तब उनके शासन में दलित सीना चौड़ा करके चला करते थे और बिहार की राजनीति में ये बात लालू ने ही पिछड़ों और दलितों दोनों को सिखायी थी लेकिन शायद वो ये बात भूल गये थे कि सीने के नीचे एक पेट भी होता है जिसे भरने के लिए काम करना पड़ता है.

 

साल 1990 में जब बीजेपी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी रामरथ पर सवार होकर लंबी रथयात्रा पर निकले थे तब उन्हें बिहार के समस्तीपुर में गिरफ्तार करवा कर लालू यादव मुसलमानों के भी हीरो बन गए थे. और इसी के बाद बिहार में उन्होंने यादवों, दलितों, पिछड़ों और मुसलमान वोटों का एक ऐसा अजेय समीकरण बना लिया था जिसके दम पर वो करीब 15 सालों तक बिहार पर राज करते रहे.

 

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक शंकर्षण सिंह ठाकुर बताते हैं कि लालू की कई डिफिसिएंशी है. उनके एडमिनिस्ट्रशन काल में बिहार की स्थिती काफी खराब हुई थी लेकिन लालू का एक ही पक्ष नहीं है लालू के कई पक्ष हैं बिहार के पिछड़ों को जिस तरह से 1990 के बाद लालू यादव ने जागरुक ही नहीं किया बल्कि उनको सत्ता में हिस्सेदारी और उनका जो आत्मसम्मान था उसको उजागर करना वो एक बहुत बड़ा रोल रहा है. लालू यादव का सेक्युलरिज्म के मुद्दे पर अटल रहना एक बहुत बड़ा योगदान रहा है लालू यादव का ये सब लोग भूलते नहीं है. ये लोग लंबी रेस के घोड़े हैं एक चुनाव में मरते नहीं और एक चुनाव में देवता नहीं बन जाते क्योंकि इनको मालूम होता है कि अगले चुनाव में परास्त भी हो सकती है नीतिश कुमार को लालू को हराने में 15 साल लगे थे.

 

1990 में लालू प्रसाद यादव पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे. उन्होंने करीब पंद्रह सालों तक बिहार पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर शासन भी किया है. इस दौरान उनके करीबी रहे नीतीश कुमार उनसे अलग हो गए और 2005 के चुनाव में नीतीश ने लालू को हराकर उनसे बिहार की सत्ता भी छीन ली थी लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद एक बार फिर लालू और नीतीश बीजेपी के खिलाफ एकजुट हो गए. बिहार के मौजूदा चुनाव में एनडीए को मात देने के लिए लालू और नीतीश ने अपना एक महागठबंधन भी बनाया है.

 

कॉलेज के अपने दिनों में समाजवादी आंदोलन के समय से साथी रहे लालू यादव और नीतीश कुमार करीब इक्कीस साल पहले अलग हो गए थे. साल 1994 में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के काम करने के तरीकों से नाराज होकर नीतीश कुमार ने उनका साथ छोड़ दिया था.

 

लालू यादव से अपना बीस साल पुराना रिश्ता तोड़ कर अक्टूबर 1994 में नीतीश कुमार ने समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नान्डीज के साथ मिलकर समता पार्टी बनाई थी. समता पार्टी के जरिए ही नीतीश ने बाद में बीजेपी के साथ राजनीतिक दोस्ती भी कर ली और 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव में लालू यादव के जंगलराज को मुद्दा बना कर वो बिहार की सत्ता हासिल करने में भी कामयाब रहे थे. करीब आठ सालों तक बीजेपी के साथ मिलकर नीतीश कुमार बिहार में सरकार चलाते रहे लेकिन 2013 में एनडीए से अलग होने के बाद बदले राजनीतिक हालात ने उन्हें एक बार फिर घुमा कर लालू प्रसाद यादव के करीब पहुंचा दिया.

 

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक शंकर्षण सिंह ठाकुर बताते हैं कि नीतिश और लालू में जो लड़ाई चली वो पूरा बिहार और पूरा देश जानता है. मेरी किताब में आपको इसका जिक्र हर पन्नें में मिलेगा कि किस तरह की लड़ाई थी और कितनी कटु लड़ाई थी. महागठबंधन बनने के बाद नीतिश कुमार ने और लालू ने हजारों बार कह चुके हैं कि हां हम एक दुसरे के दुश्मन थे बिहार में लेकिन आज एक नई परिस्थिती आई है जिसकी वजह से हम दोनों को एक होना पड़ रहा है कंप्लशन है दोनों जानते हैं. महागठबंधन जैसा कि अभी तक चला है महागठबंधन के जो फालोअर्स हैं उनको भी नहीं लग रहा था कि इस तरीके से चल पाएगा समन्व्य से चल पाएगा आगे क्या होगा नहीं होगा ये तो वक्त ही जानेगा लेकिन जो कंप्लशन है और जो कंप्लशन के चलते ये साथ हुए हैं ये दोंनों नेताओं पर पूरी तरह से जानते हैं.

 

बिहार का मौजूदा चुनाव राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से भी बेहद अहम माना जा रहा है और यही वजह है कि बिहार के चुनाव में गूंज रहें एक- एक मुद्दे और नेताओ के बयानों पर पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं. बिहार चुनाव से पहले जनता परिवार के एक होने और उसके बिखराव की संभावनाओं को भी राजनीतिक गलियारों में दिल थाम कर देखा जा रहा है. जाहिर लालू – नीतीश के एक होने के बाद से ही बीजेपी पर दबाव बढ़ा है. बिहार की चुनावी राजनीति के इस पूरे गणित को भी हम समझेंगे आगे लेकिन उससे पहले एक नजर बिहार में सीटों और वोटों के मौजूदा गणित पर भी डाल लीजिए.

 

243 सीटों वाली बिहार विधानसभा की वेबसाइट के मुताबिक जनता दल यूनाइटेड यानी जेडीयू के पास 110 सीटें है. इसके बाद बीजेपी के पास 86 और राष्ट्रीय जनता दल यानी आरजेडी के पास 24 सीटें है. लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी गठबंधन को बिहार की 40 में से 31 सीटें मिली थी. जबकि नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू को सिर्फ 2 सीट और लालू प्रसाद यादव की आरजेडी और कांग्रेस गठबंधन को महज 7 सीटें मिली थी. वोट प्रतिशत के हिसाब से भी अगर देखें तो बिहार में बीजेपी गठबंधन को करीब 39 फीसदी,  नीतीश कुमार की जेडीयू को 16 फीसदी और आरजेडी गठबंधन को 29 फीसदी वोट मिले थे. जाहिर है पिछले लोकसभा चुनाव में भले ही लालू प्रसाद यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल को कम सीटें मिलीं थी लेकिन आरजेड़ी गठबंधन का वोट प्रतिशत ज्यादा था. और यही वजह है कि बिहार के चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी से लेकर एनडीए के तमाम छोटे बड़े नेताओं के निशाने पर अब नीतीश कुमार की बजाए लालू प्रसाद यादव आ गए है. पहले चरण के मतदान से पहले ही बिहार में चुनाव प्रचार कुटता के चरम पर पहुंच चुका है. कोई नेता किसी को शैतान कह रहा है तो कोई किसी को नरपिशाच. कहीं मंच से गोमूत्र पीने का चैलेंज दिया जा रहा है तो कहीं गोमांस का मुद्दा चुनावी माहौल को तवे की तरह गर्मा रहा है. बिहार में धुआंधार प्रचार कर रही बीजेपी की सांसद हेमा मालिनी भी विकास के मुद्दे को लेकर लालू प्रसाद यादव पर ही हमले बोल रही हैं. अपने भाषणों में वो पहले की सरकारों की इस बात के लिए आलोचना कर रही हैं कि उन्होंने बिहार का विकास नहीं किया.

 

जाहिर है एनडीए के दल लालू प्रसाद यादव को घेरने की कोशिश में हैं. लेकिन चारों तरफ से हमले झेल रहे लालू भी लगातार विरोधियों पर चुटीले प्रहार कर रहे हैं. कभी बिहार की सड़कों को हेमामालनी के गाल की तरह चिकना बनाने जैसा बयान देने वाले लालू ने हेमामालिनी को भी नहीं बख्शा.

 

15 साल 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लहर ने कांग्रेस समेत समूचे विपक्ष का सूपड़ा साफ कर दिया था. बिहार में लालू प्रसाद यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल को भी करारी शिकस्त मिली थी औऱ वो महज 4 सीटों पर ही सिमट गई थी. नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू भी महज 2 सीटें ही जीत सकी थी लेकिन बिहार चुनाव की ये जंग अब लालू और नीतीश मिलकर लड़ रहे हैं और ऐसे में उनके महागठबंधन को ही सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा देनी है. जाहिर है बिहार का ये चुनाव लालू यादव की जिंदगी का भी सबसे अहम चुनाव बन चुका है.

 

राजनीतिक विश्लेषक संकर्षण ठाकुर बताते हैं कि बिहार का ये चुनाव और इसका जो एको है ये बिहार के बहुत बाहर तक गूंजेगा और ये बात अमित शाह बिहार के परिवर्तन रैली में गांधी मैदान में कह चुके हैं खुद कि याद रखिएगा ये चुनाव बिहार के बाउंड्री से काफी आगे तक जाएगी. ये चुनाव बहुत महत्वपूर्ण चुनाव है लेकिन. ये चुनाव सबके लिए अहम है और ये कह देना कि मोदी जी के लिए ज्यादा अहम है और इनके लिए कम अहम है इस आंकलन में मैं जाता नहीं इस चुनाव के बाद और भी चुनाव होने है इस देश में औऱ जो माहौल है और जो माहौल बन रहा है उसमें ये लड़ाई तीव्र होती चली जाएगी कमती दिखती नहीं मुझे और अगर बीजेपी 2014 के चुनावों को देख रही है तो उनके जो प्रतिद्वंडी है और ये दो हैं ऐसा नहीं है कि ये 2019 नहीं देख रहें हैं. और 2019 की लड़ाई में क्या क्या होना है ये नहीं देख रहें हैं.

 

राजनीतिक विश्लेषक अरविंद मोहन बताते हैं कि अगर बिहार हार गई बीजेपी तो फिर मोदी के लिए आगे की पॉलिटिक्स में दिक्कत आएगी. अमित शाह के लिए टिकना मुश्किल हो जाएगा. मोदी के लिए पार्टी और सरकार के अंदर से आलोचना शुरु हो जाएगी. और फिर देश की पालिटिक्स फिर एक नए फेज़ में जाएगी. इसीलिए बिहार चुनाव का ज्यादा महत्व है.  

 

देश के तीसरे सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले राज्य बिहार में चुनावी बिसात पर शह और मात का खेल अब बीच दौर में पहुंच चुका है. 28 अक्टूबर को बिहार में तीसरे चरण का मतदान होना है. इस बीच जातियों के गणित के वार और बदलते मुद्दों के प्रहार भी तेज हो चुके है. हांलाकि मुख्यमंत्री पद के लिए नीतीश कुमार की उम्मीदवारी और लालू के पिछड़ी जाति की राजनीति के प्रहारों ने बीजेपी की बेचैनी बढ़ाए रखी है लेकिन बीजेपी के मुकाबले खुद को बेहतर विकल्प के तौर पर पेश करने में लालू – नीतीश की लड़ाई अभी और बाकी है. और खास बात ये कि बिहार में लालू प्रसाद यादव की लोकप्रियता का इम्तिहान अभी बाकी.

  

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