ये कौन अब ‘असहिष्णुता’को फिर से सुर्ख़ियों में ला रहा है…!

By: | Last Updated: Tuesday, 24 November 2015 2:08 PM
intolerance in india

नई दिल्ली: अब अचानक ‘असहिष्णुता’ कैसे फिर से सुर्ख़ियों में आ गयी! अब तो बिहार के चुनाव निपट चुके हैं! मध्य प्रदेश की झाबुआ-रतलाम सीट का उपचुनाव भले ही काँग्रेस की झोली में चला गया, लेकिन प्रचार तो वहाँ चार दिन पहले थम चुका था. असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडू और पुडुचेरी विधानसभाओं के चुनाव भी छह महीना दूर हैं तो फिर अभी ‘असहिष्णुता’ की दुकान सजाने से किसे फ़ायदा होगा?

 

शायद, कालाबाज़ारियों और जमाख़ोरों को, जो अभी ज्वलनशील पदार्थ का स्टॉक कर लेंगे ताकि बाद में दाल और सरसों के तेल की तरह जनता को लूट सकें! इसीलिए ये सवाल उठना लाज़िमी है कि क्या आमिर ख़ान, अनुपम खेर, परेश रावल, राम गोपाल वर्मा, मनोज तिवारी जैसे जाने-माने कलाकारों की ‘असहिष्णुतावादियों’ से कोई साँठ-गाँठ तो नहीं है? ज़ाहिर है ‘फ़ैशन के इस दौर में पक्के रंगों की कोई गारन्टी नहीं है!’

 

आमिर ख़ान एक व्यक्ति ही तो हैं. नामी-गिरामी कलाकार हैं तो भी क्या आफ़त आ गयी कि अपने अनुपम खेर साहब हाथ में त्रिशूल लेकर भजन करने निकल पड़े. उनकी सांसद पत्नी किरण खेर बोलतीं तो भी थोड़ी तुक़बन्दी समझ में आती लेकिन खेर साहब को ये क्या हो गया!

 

क्या राष्ट्रपति भवन परिसर में हुए उनके प्रदर्शन और नेतृत्व कौशल को देखते हुए प्रधान सेवक जी ने कहीं उन्हें अघोषित ‘सहिष्णुता’ मंत्री तो नहीं बना दिया? या फिर वो फ़िल्मी सितारों से निपट लेने वाले बीजेपी के नये प्रवक्ता बन गये हैं और उनकी मदद के लिए सांसद परेश रावल और सांसद मनोज तिवारी जैसे गणमान्य लोगों ने भी तलवारें उठा लीं! क्या ये सब कुछ ‘धर्म संस्थापनार्थाय’ हो रहा है?

 

खेर साहब, थोड़ा और इन्तज़ार कर लेते तो कम से कम ख़बर या मुद्दा तो पक जाता! ज़रा आमिर से अपील ही हो जाती कि अपना कोई ‘सम्मान’ही लौटा दें! हड़बड़ी में उन्होंने कच्चा फल तोड़ लिया. जो अभी खाने लायक नहीं था. थोड़ा पकने देते तो स्वाद आता! खेर साहब, अब भी मान जाइए कि ग़लत टाइमिंग पर शॉट लगाने से बड़े से बड़ा बल्लेबाज़ आउट हो जाता है.

 

 

यही कच्चा फल आपने परेश रावल और मनोज तिवारी को भी चखने के लिए दे दिया. उनके मुँह का भी ज़ायक़ा बिगड़ गया. किसी को कुछ भी हासिल नहीं हुआ. यदि आपको लगा है कि आमिर ने बे-सिर-पैर की बात की है तो ‘मिस्टर परफेक्शनिस्ट’ की कलई क्या अपने आप नहीं खुल जाती? लेकिन आप जिस ढंग से आग-बबूला हुए, उससे क्या आमिर के बेजान और बनावटी बयान को प्राणवायु नहीं मिल गयी?

 

मोदी जी, सम्मान वापसी की आग सच्ची हो या झूठी, उसे बुझाने में ही फ़ायदा है…!

http://abpnews.abplive.in/author/mukeshkumarsingh/2015/10/30/article750943.ece/an-inspection-of-truth-behind-returing-of-awards

 

लगता है कि भक्तों ने बिहार से कुछ नहीं सीखा. कुत्ते की दुम की तरह अपनी आदतों से लाचार हैं. उनका यक़ीन ख़ुद के सही होने में कम, उन लोगों की बातों में ज़्यादा है, जो उन्हें सही मानें. बिहार में ‘डीएनए’, आरक्षण की समीक्षा, अगड़ों-पिछड़ों का ध्रुवीकरण जैसी बातों के अंज़ाम से भक्तों ने कोई सबक नहीं सीखा. वर्ना वो देशवासियों को इतना नादान क्यों समझते कि हम आमिर ख़ान के विशुद्ध ‘इम्परफेक्ट’ बयान को नहीं समझ पाएँगे?

 

देश में ‘असहिष्णुता’ की चिंगारी है, इसमें कोई शक़ नहीं. लेकिन भक्त गण क्यों उसे शोला बनाने पर आमादा हैं? क्या किसी को ये समझाने की ज़रूरत है कि आमिर ख़ान का ये बयान सरासर अतिश्योक्तिपूर्ण है कि उनकी पत्नी किरन राव को कुछ महीनों से भारत इस क़दर डराने लगा कि वो देश छोड़ कहीं और बसने की सोचने लगी हैं? ये सच नहीं हो सकता.

 

ऐसे सफ़ेद झूठ के साथ गढ़े गये बयान ही छोटे विवादों को बड़ा बनाते हैं. समाज में आपसी समझ बिगाड़ते हैं. इसीलिए कट्टरपन्थियों की आलोचना सही तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए. तभी ग़लती करने वाला लाज़बाव हो सकता है.

 

आमिर ख़ान ने तो कदाचित अपनी पत्नी किरन राव को ही झूठा बना दिया. बहरहाल, अब ये ग़लतफ़हमी भी दूर हुई कि शाहरूख़ से बेहतर, परिपक्व और समझदार नहीं हैं आमिर ख़ान. अनुपम खेर को लेकर बना भ्रम तो पहले ही टूट चुका था. अबकी बार तो परेश रावल और मनोज तिवारी जैसे लोग भी ‘चींटी मारने के लिए तोप चलाने’ वाली क़वायद का हिस्सा बन गये.

 

लोकतंत्र सिर्फ़ ‘स्थायी समर्थन’ अथवा ‘स्थायी विरोध’ से नहीं चलता. सितारों से आगे जहाँ और भी है! इसे समझे बग़ैर भारत जैसे देश को चला पाना नामुमकिन है. लोकतंत्र में धारणाओं का बड़ा महत्व है. बोफोर्स सौदे से काँग्रेस के भ्रष्ट होने की जो धारणा बनी उससे वो कभी उबर नहीं सकी.

 

1989 की हार के बाद वो कई बार सत्ता में लौटी लेकिन कभी बहुमत नहीं पा सकी. उसी तरह, असहिष्णुता की धारणा सिर्फ़ इसलिए मज़बूत हो रही है कि बहुमत के नशे में चूर मोदी सरकार ने पहले तो इसे अहंकार के चश्मे से देखा, फिर मामला बिगड़ने पर बयान-बहादुरों की फ़ौज उतार दी. असहमति जताने वालों को देशद्रोही और ख़ाँग्रेसी कहा गया. विरोध करने वालों का प्रतिकार विरोध से हुआ. ग़ुबार थम ही रहा था कि आमिर का बयान आ गया.

 

‘असहिष्णुता’ के बुत में वही लोग जान डालने लगे जो इसे सबसे ज़्यादा ग़ैर-वाज़िब मानते हैं. अब सरकार और भक्त ऐसे अतिवादी ध्रुव पर जा खड़े हुए हैं, जहाँ से उन्हें समर्थक और विरोधी ही नज़र आते हैं.

 

जो क़ौमें इतिहास से सीखती नहीं, वो उसी में दफ़्न हो जाती हैं…!

http://abpnews.abplive.in/author/mukeshkumarsingh/2015/10/12/article738145.ece/A-Blog-by-Mukesh-Kumar-Singh-on-Sahitya-Akademi-awardees-protest

 

उधर, ‘तिल का ताड़’ बनाने वाली बीमारी ने अरविन्द केजरीवाल को जकड़ लिया है! वर्ना राजनीति का तो ये सामान्य नियम है कि ‘दुश्मन का दुश्मन’ आपका दोस्त होगा. मोदी-लालू-केजरी के बीच फिलहाल ऐसा ही रिश्ता क्यों न माना जाए? क्या ‘ज़ुमलेबाज़ी’ का हक़ सिर्फ़ ‘अच्छे दिन’ वालों को है! क्या उनके पास इसका कॉपीराइट है! केजरीवाल क्या किसी से छोटे ज़ुमलेबाज़ हैं? उन्होंने जब लालू को ‘अछूत’ बताया था, तब वो मुख्यमंत्री नहीं थे. प्रदर्शनकारी थे. अब संवैधानिक पद पर बैठे हैं.

 

शपथ ग्रहण में जाएँगे और जिसकी सरकार बन रही हो, उससे नहीं मिलेंगे, ये कैसे मुमकिन है! वैसे भी जीत के बाद कौन राजनेता अछूत रह जाता है? क्या गुजरात दंगों के बाद मोदी या बीजेपी अछूत हो गये या सिख विरोधी दंगों के बाद काँग्रेस ग़ुमनाम हो गयी? क्या राहुल गाँधी ने इन्हीं लालू को राहत देने वाले अध्यादेश को फाड़कर फेंकने लायक नहीं बताया था? क्या बंगारू लक्ष्मण और दिलीप सिंह जूदेव ने जब नाम कमाया तब वो बीजेपी में नहीं थे?

 

इसीलिए क्या दुश्मन के प्रति भी इंसानियत से पेश आना ग़ुनाह है? क्या अब इस बात का कोई मतलब नहीं बचा कि ‘पाप से घृणा करो, पापी से नहीं’ या ‘पापी को पहला पत्थर वो मारे, जिसने पाप न किया हो’. कौन है दूध का धुला?  केजरीवाल या आम आदमी पार्टी को क्यों रक्षात्मक होना चाहिए? भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ दृढ़ता ज़रूरी है या उसका दिखावा? क्यों ये डर है कि लालू से गले मिलने की बात ‘साबित’ होने से सियासी नुकसान होगा?

 

‘मौत के सौदागर’ से मिलने पर तो ऐसी हॉय-तौबा नहीं मची थी! क्या ‘सही राजनीति’ (Correct Politics) और ‘राजनीतिक रूप से सही’ (Politically Correct) ये दोनों रेल की पटरियों की तरह हमेशा एक दूरी पर ही बने रहने के लिए अभिशप्त हैं?

 

मुकेश कुमार सिंह से ट्विटर पर जुड़ने के लिए नीचे क्लिक करें

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