व्यक्ति विशेष: आखिर कब तक सहेगी बेटी बेइज्जती की ये जंज़ीर?

By: | Last Updated: Saturday, 13 December 2014 12:54 PM

ये हिंदुस्तान है. हिमालय इसकी सरहदों का निगेहबान है.  और गंगा पवित्रता की सौगंध. इतिहास के आगाज से अंधेरों और उजालों का साथी रहा है. इसके जिस्म पर संगे मरमर की चादरों से लिपटी हुई ये खूबसूरत इमारतें गवाह रही हैं. कि जालिमों ने इसे लूटा और मोहब्बत करने वालों ने संवारा है. नादानों ने जंजीरें पहनाई और इसके चाहने वालों ने उन्हें काट फेंका है. लेकिन एक जंजीर का बोझ सदियों से उठा रहा है. ये जंजीर है उस जहनियत की जो मर्द और औरत के बीच फर्क करती है. वह पुरुषवादी सोच की जंजीर. जो सदियों से इसकी बेटी के पैरों में पड़ी हैं. समाज की बेरहम बेडियों का बोझ हिन्दुस्तान की बेटी आज भी उठाती है. बंदिशों का वह नश्तर आज भी उसके अहसास को कुरेदता है. यूं तो उसकी हिफाजत के लिए पुलिस भी है. कानून भी है. लेकिन उसकी इज्जत के साथ खिलवाड़ आज के आधुनिक समाज में भी जारी है.  बेटी की ये दर्द भरी दास्तान यूं तो सदियों पुरानी है लेकिन हिन्दुस्तान हैरान है इसलिए कि आधुनिकता के दमकते इस दौर में भी वो यही सवाल पूछ रही है कि और कब तक ढोएगी वो बंदिशों की ये जंज़ीर. आखिर कब तक सहेगी वो बेइज्जती की ये जंज़ीर. आखिर कब तक?

 

दिल्ली की छात्रा भूमिका कहती हैं कि मुझे दस बार ये सोचना पडता है कि हां मैं लडकी हूं होली पर निकलने से पहले मुझे सोचना पडता है कि बाहर निकलू फ्रेंड के घर जाउं या ना जाउं कोई मुझे कलर लगाकर मोलेस्ट ना कर दे. तो मुझे इतनी तो सेक्युरिटी दो कि मैं चौडे में निकलूं और कह सकू की हां मैं लडकी हूं.

 

एक भोपाल की छात्रा ने कहा कि ना ही हम भोपाल में सुरक्षित है और ना ही इंडिया कि किसी भी जगह पर क्योंकि आप देख सकते हैं स्थिति बद से बदतर होती जा रही है. हमें डर लगता है रात मे ज्यादा देर तक आने में जाने में.

 

छात्रा त्रिप्ता गुप्ता भी वही बताती हैं कि सोच ही इतनी गंदी है कि दिल्ली में क्या हिंदुस्तान में कहीं भी सेफ नहीं है. हमेशा लडकियों को ही सिखाते हैं कि अपने आप को ही प्रोटेक्ट करो. जैसे की पता नहीं हम शो पीस है या क्या है.

 

आसमान चूमती इमारतें, चमचमाती सड़के और जगमगाती रौशनियों के बीच मौजूद. देश की शान इंडिया गेट. इसी दिल्ली में देश के प्रधानमंत्री का दफ्तर है और माननीय राष्ट्रपति का घर भी. दिल्ली में ही मौजूद है वह सरकार जो देश चलाती है. करोडों लोग बसते हैं यहां लेकिन दिल्ली की इस भीड़ भरी दुनिया में बेटियां खुद को तन्हा पाती हैं. बेहद अकेली . सहमी हुई भी और बहुत डरी हुई भी. एक अनजाना खौफ सीने में हर पल धड़कता है. एक साया हमेशा पीछा करता है. खौफ में जीती हैं.  दहशत को पीती हैं क्योंकि ये देश की बेटी हैं. दर्द भऱी ये दास्तान यूं तो बहुत लंबी है लेकिन दर्द का एक पड़ाव ये भी है.

 

 

पांच दिसंबर की सर्द रात थी. करीब 11 बजे होंगे घड़ी में. दिल्ली में एक लड़की ने घर जाने के लिए टैक्सी किराए पर ली थी. पुलिस का कहना है कि शुक्रवार  रात जब वो लड़की इसी टैक्सी में बैठ कर वसंत विहार से अपने घर इंद्रलोक जा रही थी तो बीच सफर में ही टैक्सी ड्राइवर दरिंदा बन गया था. पुलिस कहती है कि जब लड़की टैक्सी में बैठ कर अपने घर की तरफ रवाना हुई तो उसे इस बात की तसल्ली हो गई कि करीब चालीस मिनट में वह अपने घर पहुंच जाएगी. लेकिन पंद्रह मिनट भी नहीं गुजरे थे अभी कि अचानक दिल्ली की एक सुनसान जगह पर टैक्सी रुक गई. इसके बाद ड्राइवर ने पिछली सीट पर बैठी लडकी से छेड़खानी शुरु कर दी. लेकिन जब लड़की ने ड्राइवर को रोकने की कोशिश की तो पहले उसने लड़की को बुरी तरह मारा–पीटा और फिर जान से मारने की धमकी देकर उसके साथ बलात्कार किया. उस दरिंदे ड्राइवर ने उस लड़की के साथ हैवानियत का ऐसा सलूक किया जिसने उसके जिस्म ही नहीं उसकी आत्मा को भी छलनी करके रख दिया. लेकिन इंसानियत को शर्मसार करने वाला ये सलूक साथ पहली बार नहीं हुआ है. बेटियां ऐसे दर्द हर रोज पीती हैं लेकिन फिर भी मर – मर कर जीती हैं.

 

दिल्ली की छात्रा भूमिका बताती है कि एक बार मैं इंटर्नशिप करके रात को आ रही थी. तो मैने ऑटो लिया उसके लिए तो वो बार बार मेरी तरफ देख रहा था. उसने जो मिरर था वो भी स्पेशली फिक्स किया उसमें मेरा फेस आ रहा था. तो बार बार मुझे पूछना पड़ा कि आप कहां ले जा रहे हैं. कौन से रास्ते पर ले जा रहे हैं. फाइनली मैं उतर गई और मैने सोचा कि मैं मेट्रो स्टेशन चल के जाउं. तो आटो वगैरह सेफ नहीं है कोई भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट सेफ नहीं है.

 

दिल्ली की श्वेता भी बताती हैं कि मैं जीटीबी के पास से जा रही थी और एक लडकी आ रही थी. वहां से लड़के आते हैं स्कूटी से और लड़की के पीछे मार के चले जाते हैं. मतलब ये दिन की बात है ना लड़की कुछ कर पाई ना लोगों ने कुछ किया. और वो चले गए तो ये तो बहुत एक आम सी बात लगती है मुझे. दिल्ली में तो बहुत ज्यादा है.

 

दिल्ली की छात्रा आस्था ने कहा कि मैं कनाट प्लेस रहती थी. क्नॉट प्लेस इकवली अनसेफ. इवटीजिंग की घटनाएं, पब्लिक ट्रांसपोर्ट ये जो ऑटो होते हैं .  वो जो गाने प्ले करते हैं. वो बहुत भद्दे होते हैं. वो ड्रिंक और ड्राइव करते हैं. तो ये सब चीजे हैं और ये सब बहुत अनसेफ है. सीपी बहुत अनसेफ है.

 

लाखों लबों पर फिर इंसाफ की आवाज बुलंद हो रही हैं. वो इंसाफ जिसका बेटियों को सदियों से इंतजार है. वो इंसाफ जो अक्सर तर्क की कसौटियों पर कुचला जाता रहा है. लेकिन इस बार ना तो बेटियों ने छोटे कपडे पहने थे. ना ही शराब पी थी. और ना ही अपने ब्वायफ्रैंड के साथ किसी बस में जा रही थी. इस बार तो एक सुरक्षित मानी जाने वाली कैब में सवार थी.

 

दिल्ली की छात्रा स्नेहा बताती हैं कि जब मैं चेन्नई में पढाई कर रही थी तो ये एप लांच हो रहा था उस वक्त. उबेर का. तो उस वक्त इसे सेफेस्ट कार बोला गया था. कि जहां पर आप है ये आपको वहां लोकेट कर लेगा. और इसे ऐसे ही प्रमोट किया गया था.  जिस कैब को सेफेस्ट कैब इन इंडिया बोला गया उसी में ये घटना हुई. तो दिस इज वैरी होरीफाइंग फार मी.

 

दिल्ली की छात्रा श्वेता कहती हैं कि मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी जैसे एरिया में रहती हूं. और जब बारह-एक बजे निकलना हो तो सच बताती हूं कि पुलिस वाले आकर ऐसा कहते हैं कि आप घर में चले जाइये वर्ना आप बाद में कहते हैं कि रेप होता है. तो मतलब मुझे कोई सुरक्षा मिले इसकी जगह पर वो इस तरह की बातें करते हैं. जब पुलिस इस तरह की बाते करेगी तो जो रेप केसेस हो रहे हैं इस तरह के एसाल्ट हो रहे हैं. उसमें तो डर लगता ही है बिल्कुल लगता है.

 

बेटियां खुल कर जी भी तो नहीं सकती. रोज कॉलेज भी जाना होता है. बसों में सफर करती हैं मेट्रो में भी चलती है. लेकिन ये एक दिन कि बात नहीं है हर दिन ऐसे हादसों का सामना किया है. रिक्शे में जाओ तो पास आकर कोई गंदा कमेंट पास करता है. डर नाम की जैसे कोई चीज ही नहीं है. बस में तो लोग जिस तरह की बदतमीजियां करते हैं वो आप सोच भी नहीं सकते. कभी भी वो कहीं भी हाथ मार देतें है. शिकायत करें तो क्या… किसको करें. 

 

मुरादाबाद की छात्रा रमा सिंह बताती हैं कि हम वापस लौट रहे थे गाजियाबाद से मुरादाबाद के लिए. तो वहां पर बस में एक बुजुर्ग से ही थे तो वहां पीछे से उनका हाथ टच हुआ. मैने सोचा ऐसे ही टच हो गया होगा दोबारा भी हो गया. चलिए कोई बात नहीं थोडा सा आगे बस चलती है हो ही जाता है. फिर हम जब नीचे उतर के खड़े हो गए. काफी स्पेस हो जाता है. उसके बाद भी उन सज्जन का हाथ मुझसे ऐसी जगह टच हुआ कि मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ. मेरे हाथ में एन 73 मोबाइल था. और मेरा उल्टा हाथ ही चलता है गुस्से में. मैने सताड से मारा उनके गाल पर हाथ. और मेरे हाथ मारने के बाद बड़ी सज्जनता से बोले मैडम क्या हुआ. दिमाग खराब हो गया आपका. मैने कहां भैया मेरा नहीं दिमाग तो आपका खराब हो गया. आप हाथ देख लीजिए इसमें चूड़ी नहीं है. चूड़ी घर पर निकाल कर के रख के आए है.

 

राजधानी दिल्ली ही क्या देश के किसी भी शहर में सुरक्षित नहीं हैं. इलाहाबाद तो बुद्धिजीवियों और कानून के जानकारों का शहर माना जाता है. उत्तर प्रदेश का हाईकोर्ट भी यही है और यूपी पुलिस का मुख्यालय भी इसी शहर में है. इलाहबाद हाईकोर्ट की वकील स्वाति अग्रवाल कहती हैं कि मैं पिछले बारह सालों से यहां हाईकोर्ट में वकालत कर रही हूं. क्रिमिनल केस भी लड़ती हूं. इसीलिए अब तक खुद को आम महिलाओं के मुकाबले ज्यादा सुरक्षित महसूस करती थी लेकिन मेरा ये भऱम उस वक्त टूट गया जब एक शख्स ने फोन पर मुझसे छेड़खानी की. वो मुझे अश्लील मैसेज भी भेजने लगा. और जब मैं अपनी फरियाद लेकर सिविल लाइन थाने गई तो इंस्पेक्टर के बर्ताव ने तो जैसे मेरे होश ही उड़ा दिए. मैने बोला कि इंस्पेक्टर साहब देखिए इस तरह से एक लडके की कॉल आ रही है. एंड ही नोज मी वैरी वैल कि मैं हाई कोर्ट की वकील हूं. इसके बावजूद वो मुझे इस तरह से परेशान कर रहा है. तो मेरी कंपलेंट दर्ज कर लीजिए. आप विश्वास नहीं करेंगे कि इंसपेक्टर साहब का क्या वर्जन आया. इंसपेक्टर साहब ने कहा कि ठीक है वकील साहब मैं आपकी एफआईआर तो दर्ज कर लूंगा. लेकिन उसके बाद के जो भी कान्सीक्वेंसेस होंगे उसके लिए मैं जिम्मेदार नहीं होउंगा. पुलिस नहीं होगी. अगर एसिड अटैक होता है या आपको धमकी मिलती है. तो ओनली यू विल भी रिसपांसिबल फार दैट. आपको समझना होगा अब आप कहे तो मैं आपकी एफआईआर दर्ज करुं. तो मैं क्या करती एक महिला होने के नाते. मैने चुपचाप उस दरख्वास्त को बटोरा पॉकेट में रखा और मैं वापस घर चली आई. और घर आई तो आई वापस उस नंबर से फिर मुझे कॉल आई क्यों वकील साहब हो गई आपकी एफआईआर दर्ज. औऱ बताइये मैं क्या बताउं इस इंडियन सोसाइटी के बारे में.

 

मुरादाबाद की सामाजिक कार्यकर्ता निधि गुप्ता कहती हैं कि दिल छोटी-छोटी बातों से भी घबरा जाता है. खौफ की ये इंतिहा है कि अब तो मोबाइल फोन की अनजान घंटी भी डराती है. पिछले साल ही की तो बात है जब एक शख्स ने फोन पर परेशान किया था मुझे. शुरू में तो मैने उसे इग्नोर किया लेकिन जब उसकी बदतमीजियां हद से ज्यादा बढ़ गई तो मैंने उसे डांटा और फोन कॉल रिसीव करने बंद कर दिए. लेकिन उस बंदे ने मेरा नंबर कहीं पब्लिक प्लेस पर लिख दिया और कुछ गलत बातें भी मुझसे रिलेटेड वहां लिखी गई जिसके बाद आने वाली फेक कॉल्स ने तो मेरी जिंदगी ही जैसे नरक बना दी थी.

 

जब मैं काफी परेशान हो गई तो मुझे काफी दिनों के बाद ये समझ आया कि ये उसी आदमी की हरकत थी और उसने मेरा नंबर पब्लिक प्लेस पर लिख दिया था. किसी ने मुझे फिर ये बाद में बताया. तभी भी मैं बहुत कुछ नहीं कर पाई मैं इग्नोर ही करती रही. मैने अपने घर में बताया हसबैंड ने थोडा रिएक्ट किया. लेकिन फिर वहीं हुआ कि वो चीज धीरे धीरे अपने आप ही खत्म हुईं. मैने कोई सॉलिड एक्शन नहीं लिया लेकिन मैं बहुत डिसटर्ब हो गई थी उस बात से. तो मुझे लगता है कि जो फोन पर हरेसमेंट होता है वो देखने में बहुत छोटा लगता है. पर जिनके साथ होता है वो मेंटली बहुत हेरिस होते हैं. स्पेशली गर्ल.

 

लखनऊ की प्रेरणा बताती हैं कि सड़क, मोहल्ले और गली से लेकर घर और ऑफिस तक कहीं भी सुरक्षित नहीं हूं मैं. पास में पुलिस भी खड़ी हो तब भी खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करती हूं मैं. कहीं ना कहीं मेरे अंदर एक डर हमेशा बना रहता है. अभी कुछ दिन पहले की ही बात है. सर्दियों में शाम वैसे भी जल्दी हो जाती है. मैं ऑफिस से आ रही थी अपनी स्कूटी पर. और रास्ते में मेरे पीछे एक सफेद रंग की स्कॉर्पियो थी जिसके शीशे ब्लैक थे. उन्होंने गाडी मेरे आगे लगा दी और कुछ लोगों ने वो ग्लासेस नीचे किए और कहां कि हां बस यहीं पर घेर लो. यहीं पर घेर लो. 

 

मैं बुहत तेज डर चुकी थी कि अब क्या करें. कैसे निकले अब तो यहां कोई मदद करने वाला भी नहीं है. क्योंकि कैंट रोड था और मेन रोड भी हो तो लोग किसी की मदद जल्दी करने के लिए तैयार नहीं होते हैं. कुछ भी रीजन हो सकता है उसके पीछे. तो मैं जैसे तैसे बाहर निकल पाई साइड से मैं स्कूटी लेकर आगे निकली. एक बाइक से भैया जा रहे थे वो पलट-पलट कर देखने लगे कि हो क्या रहा है. कि एक  स्कूटी खड़ी हुई है और एक स्कार्पियों ऐसे आकर रुक गई है. मैने मैनूपुलेट किया मैने कहा कहां चले गए थे आप मैं बहुत देर से पीछे देख रही थी. तो स्कॉर्पियों में जो लोग थे वो समझ गए कि अच्छा इनके साथ कोई और है ये अकेली नहीं है. तो उन लोगों ने थोड़ी देर तो पीछा किया वैसे वे लोग बुहत देर से मेरा पीछा कर रहे थे. तो थोड़ी देर तो उन्होंने पीछा किया लेकिन जब मैं उस बाइक वाले से बात करने लगी फिर वो स्कार्पियों जब निकल गई तो मैने उनको आगे जाकर समझाया कि एक्चुएली ये गाड़ी बहुत देर से मेरा पीछा कर रही है. बस ऐसे ही बचते हैं. और इनफेक्ट सिर्फ मैं ही नहीं. ना सिर्फ बाइक पे ना सिर्फ कार में आटो में भी जाती हूं तो आपके बगल में कोई बैठा हुआ है आपको परेशान कर रहा है आप कुछ कह नहीं सकते. ठीक है. क्योंकि आपकी मदद के लिए कोई नहीं आएगा.

 

दो साल पहले की ही तो बात है जब देश की संसद से लेकर राष्ट्रपति भवन तक लोग ज्यादतियों के विरोध में सड़कों पर उतर आएं थे. लेकिन जब- जब बेटियां खुद पर हुए जुल्म के खिलाफ आवाज उठाती हैं तो उन पर बरसने लगती हैं तोहमतें. उन पर लगाई जाती है बंदिशे. उन पर ही लगाए जाते हैं इल्जाम.

 

लडके कभी जाते है तो कभी पेपर पर नंबर लिख कर के हाथ में पकड़ा दिया. कभी कुछ कर दिया कभी कुछ कर दिया. ऐसे में लडकियों को प्रोटेस्ट करना चाहिए. कहते हैं कि इंडिया आजाद है. कैसे आजाद है. सरकार और प्रशासन में बैठे लोग ही बोल रहे है तो फिर बाकी लोग क्या बोलेंगे. सोसाइटी भी बोलती है कि ये लडकियों की प्राब्लम है लडकियां क्यों. लडके क्यों नहीं. लडकों को दो चार थप्पड मारकर सीधा कर देते हैं तब भी लडकियों को सपोर्ट करने की बजाए उल्टे उन पर इल्जाम ही लगाए जाते हैं.

हाल ही की तो बात है जब रोहतक में छेड़खानी करने वालों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. लेकिन इसको लेकर भी लड़कियों के कैरेक्टर पर ही सवाल उठाए गए. उन पर पैसे लेने का झूठा इल्जाम लगाया गया. उन पर ये दबाव भी बनाया गया कि उन बदतमीज लड़कों से समझौता कर लें. आखिर बेटियों को ही क्यों दबाया जाता है. 

 

रोहतक में पिटाई करने वाली लड़की कहती हैं कि जो हमें स्ट्रेस किया जा रहा है . हमें मैनटली डिस्टर्ब किया जा रहा है..कि जो लड़कियां है आज आवाज उठाने लगी है..जैसे हमने आवाज उठाई है ऐसे कोई ओर लड़कियां आवाज न उठा ले इस डर से ये जो शरारती तत्व है सोचते है कि उनकी जो ये बदतमिजियां है ये करनी कही बंद न हो जाएं इसके डर से वो हमें दबा रहें है कि हम अपना केस वापस ले लें और आगे कोई भी लड़की ऐसा कदम उठाने की कोशिश न करे.

 

पूजा बताती है कि अगर मुझे मेरी फैमली और रिलेटिव सपोर्ट नहीं करते तो शायद तो मैं सुसाइड कर चुकी होती. मुझे सामाजिक सपोर्ट भी मेरे को बहुत मिला आज उन सभी की वजह से मै यहां हूं और मैं यह कहना चाहूंगी कि ये लड़ाई हर लड़की की है हमारी नहीं है समाज में जितनी भी औरतें हैं उनकी ये लड़ाई हो चुकी है अगर आज एक लड़की को दबाया गया तो आगे कोई भी लड़की आवाज उठाने लायक नहीं रहेगी.

 

मुरादाबाद की छात्रा तलबिया खान बताती हैं कि ये कहानी हर रोज दोहराई जाती है. अभी हाल ही की तो बात है….सुबह का वक्त था वैसे भी सर्दियों में सुबह कोहरा सा रहता है. मैं स्कूल जा रही थी. कुछ लड़के दूसरी तरफ से आ रहे थे वो लोग इतना कुछ बोल कर जा रहे थे कि पता नहीं क्या कर दिया है मैनें उनके लिए. कपडे भी ठीक ठाक पहने थे मैने. खुद को संभालने के लिए ये सब करना पडता है आजकल. लेकिन वो लड़का इतने गंदे- गंदे शब्द बोलकर जा रहा था कि जैसे पता नहीं मैने क्या कर दिया है.

 

डर लगता है सबुह में कभी अकेले जाना होता है कोहरा होता है. कोई कमेंट पास करता है कभी कोई साथ साथ आ जाता है. पास आ कर कुछ ना कुछ कहता है. पलट के कुछ बोलो सुबह में सन्नाटा होता है कोई भी नहीं होता है. कुछ बोल भी नहीं सकते जी बहुत डर लगता है. अकेले आने में बहुत परेशानी होती है स्कूल.

 

भोपाल की छात्रा बताती है कि जब से होश संभाला है इन सडकों पर झेला है लोगों का वो बर्ताव जिसे बताते हुए भी मुझे शर्म आती है. छेड़छाड़, बद-तमीजियां, हिंसा और मानसिक यातना जैसे लफ्ज तो जैसे मेरी जिंदगी का अब हिस्सा सा बन गए हैं. मैं भोपाल में रहती हूं और मुझे पढ़ाई के लिए जनरली मिनी बस में सफर करना पडता है. लेकिन वो छोटा सा सफर भी क्या बताउं कितना दर्द भरा होता है. बस में छेड़छाड को लेकर तो मैं अब जैसे आदी सी हो चुकी हूं. आखिर कब तक और कितना विरोध करुंगी मैं.

 

लोग आपको धक्का मारके जाते हैं सीट पर आपको बैठने नहीं देते. बैठते हैं तो जबरदस्ती आपको टच करने की कोशिश करते हैं. मैने बहुत बार देखा है कि मिनी बस में अक्सर यहां भोपाल में ईवटिजिंग के केसेस बहुत कॉमन हैं. आप रोड़ पर चल रहे हैं लोग आप पर कमेंट पास करके जाएंगे. लड़की को ऑब्जेक्ट की तरह पोर्टे किया जाता है. यहां तक कि ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है.

 

ऑटो में जाने में टैंपो में जाने में मिनी बस मे जाने में हमको बहुत डर लगता है. कभी कभी हम जाते हैं तो बहुत ही भद्दा कमेंट सुनने को मिलते हैं. जो कि हमारे लिए बहुत ही असहनीय है हम सहन नहीं कर सकते इन चीजों को लेकिन हमें ना चाहकर भी सहन करनी पडती है. क्योकि ये हर दिन का रोना है. हम रोड से जा रहे हैं. पैदल आ रहे हैं तो कोई भी लड़का हमारी बाजू से जाएगा तो हमें कुछ उल्टा सीधा बोल कर जाएगा. ऐसी लग रही हो वैसी लग रही हो. बहुत ही ऐसे शब्द होते हैं जिसे मैं बता नहीं सकती. मैं बता नहीं सकती हूं कैमरे के सामने.

 

बदलाव…..आजाद भारत से लेकर आज का मार्डन इंडिया. 

 

चंद बरस ही तो गुजरे है अभी, जब देश आजाद हुआ था. लेकिन इस छोटे से वक्त में भी क्या कुछ नहीं बदल गया. देश…काल….समाज सब कुछ तो बदला गया है. ब्लैक एंड व्हाइट का जमाना भी कभी का रंगीन हो गया लेकिन बेटियों की जिंदगी में रंग अधूरे ही रह गए. क्योंकि ना तो समाज की सोच बदली और ना ही उसका नजरिया. आज भी दहेज के नाम पर जलाई जाती हैं. बलात्कार तो जैसे अब नसीब ही बन गया है. इस समाज ने देवी का सम्मान तो दिया लेकिन हक देने से हमेशा कतराता रहा है. बल्कि उल्टे उसने तो इनकी राह में पाबंदियों के कांटे ही बोए है. बंदिशों की बाधा खड़ी की हैं इनकी मंजिलों की राह में. ताकि कभी अपने पैरों पर खड़ी ना हो सकें. खुद कभी अपनी हिफाजत ना कर सकें. देवी बनाने वाले इस समाज में एक इंसान की तरह जीने के अधिकार तक छीन लिए गए इनसे.

 

 

दिल्ली की छात्रा त्रिप्ता गुप्ता बताती हैं कि मेट्रो जाने ही वाली थी तो मैने वूमेन कार्ड की बजाए जनरल कार्ड में ही बोर्ड कर लिया. औऱ उसके बाद एक दो लडकियां थी वहां पर उनको किसी ने टच किया तो उनमें से एक लडकी बहुत रोने लग गई और तो एक अंकल लड़के को समझाने की बजाए उसको बोला कि आप जनरल कार्ड में क्यों ट्रेवल कर रही हो. तुम्हे वूमेन कार्ड में ट्रेवल करनी चाहिए. तब तक तो मैं चुप थी मैने कहा एक्सक्यूज मी अकंल आप हमेशा लडकियों को क्यों समझाते हो. कि पूरे कपड़े पहनों वूमेन कार्ड में ट्रेवल करो. लेट नाइट मत आओ. और अपने ड्राइवर के साथ आओ आप लड़के को क्यों नहीं समझाते हो. कि वूमेन की रिस्पेक्ट करो उसे प्रोटेक्ट करो हमेशा लड़कियां ही क्यों समझे ये बात.

 

बंधन और बंदिशे, तोहमतें और रुकावटें सारे इल्जाम जैसे बेटियों के लिए ही हैं. समझ नहीं आता अपने दर्द की ये दास्तान कहां से शुरु करें और कहां खत्म. हिंदुस्तान के धड़कते दिल दिल्ली से या फिर इंडिया की शान चमचमाते शहर मुंबई से. आसमान चूमती इमारते…. चमचमाती सड़के और इन सड़कों पर सैकड़ो हजारों कारों का हुजूम. लोग कहते है कि मुंबई मेरी जान है. लेकिन मुंबई की इन भीड़ भरी सड़कों पर भी खुद को बेहद अकेला और असुरक्षित महसूस करती हैं बेटियां.

 

मुंबई में न्यूट्रीशियन रेशमा पठारे बताती हैं कि मैं दादर से ट्रेवल करती हूं तो दादर के ब्रिज पर इतना क्राउड रहता है. स्पेशली जेंट्स क्राउंड तो कोई कोई धक्का मारके जाता है. इतनी गंदी फीलिंग आती है और किसे फिर बताएं. फिर ऐसे भी डर लगता है कि किसी पुलिस स्टेशन मे जाकर हम बोले तो हमें ही उल्टे प्रशन पूछे जाएंगे.

 

मैं पेशे से एक न्यूट्रीशियन हूं. मैं रोज दादर से अंधेरी ट्रेवल करती हूं. दोनों ही स्टेशन बेहद क्राउडेड हैं. कहीं भी हमारा ध्यान नहीं रहता कि आजू बाजू कौन है और इसीलिए दिल में हमेशा एक खौफ सा बना रहता है. कि पता नहीं कौन हम पर क्या नजर डाल रहा है. या किस एटीट्यूड से देख रहा है. उन्हें चोरी करनी है. बैग लेकर जाना है या तो हमारी ज्वैलरी लेकर जाना है. या किसी दिन पीछा करके हमको लेकर ही जाए.

 

अभी मैं तैयार होकर एक फंक्शन में जा रही हूं मैंने बहुत सी ज्वेलरी पहनी है. तो देखा कि एक बंदा मेरा पीछा कर रहा है बहुत ही इनसेक्योर फील हुआ कि आफटरनून का टाइम है बहुत ज्यादा क्राउंड नहीं है रास्ते पर. और वो जिस नजर से देख रहा था तो ये जाहिर था कि वो या तो चोरी करना चाह रहा है. या तो मुझे टच भी कर सकता है तो बुहत गंदी फीलिंग आ रही थी कोई पुलिस पेट्रोलिंग भी नहीं है रास्ते पर तो किसे कंपलेंट किया जाए. ये बहुत बड़ा क्वेचन मार्क था बुहत डर भी लग रहा था. रिक्शा टैक्सी कुछ नहीं दिख रहा था और वैसे भी लग रहा था कि अगर मैं जाती भी हूं पुलिस के पास कोई मेरी हैल्प करेगा या मुझसे ही रांग क्वेश्चन पूछेगा. इसीलिए मैने एवाइंड किया. तो इसीलिए मैं सोचती हूं कि हमे जाना चाहिए किसी भी फक्शन के लिए तो तैयार होकर जाए कि ना जाए ज्वेलरी पहनकर जाए कि ना जाए.

 

चमचमाती सड़कों औऱ उनके फुटपाथ से लेकर गली मोहल्लों तक. कही भी सेफ नहीं हूं मैं. स्कूल से लेकर कॉलेज तक में हर जगह… हर सफऱ में एक खौफ साये की तरह मेरा पीछा करता है. मैं अजमेर से हूं. मेरे माता – पिता ने मुझे पढाई करने जयपुर भेजा है. यहीं कॉलेज के पास बनी पार्क में रहती हूं मैं. वैसे तो जयपुर शांत शहर माना जाता है लेकिन यहां भी जब दिन ढलता है तो सड़कों पर खौफ पसरने लगता है. स्ट्रीट लाइट की रोशनी में भले ही सड़के जगमगाती हैं लेकिन साथ ही अंधेरे की आड़ में आवारा हरकतें भी बढ जाती हैं.

 

जयपुर की छात्रा तमन्ना सिंह बताती हैं कि एक बार मैं औऱ मेरी एक पीजी मेट बाहर गए थे कुछ दवाईंयां लेने तब हुआ था कि दो लड़के थे वो पीछे स्टाक कर रहे थे कह रहे थे कहां जा रही हो मैडम और हम छोड़ दे. तो थोड़ी देर इग्नोर किया वहां बहुत सारे लोग थे लेकिन कोई सपोर्ट नहीं कर रहा था. कोई एक जना बोले तो लोग ध्यान नहीं देते है उन्हे लगता है कि लड़की ने ही कुछ बोला होगा. या लडकी की ही गलती रही होगी तो लोगों का सपोर्ट नहीं रहता है. बुरा लगता है इतने शिक्षित लोग होकर भी सोचते नहीं है कि लडकी अकेली है अनसेफ है. उसको सपोर्ट करना चाहिए तो लोग इग्नोर करके निकल जाते हैं.

 

जयपुर की ही निकिता बताती हैं कि हम ट्यूशन जाते थे तो एक्टिवा पर होते थे तो लड़के फॉलो करते थे उन्होंने घर तक फॉलो किया है. इतना गंदा लगता था क्या करें हैल्पलैस हो जाते थे. एकदम लोनली रोड होता था . घर पर बताया है लेकिन मेरी मॉम ने कहा है कि ऐसा हो तो कॉल करना. अगली बार से ऐसा हो तो हम हैं सपोर्ट करने के लिए. थैक्स गाड ऐसी फैमिली है जो मुझे सपोर्ट करती है .  सब लोग ऐसे नहीं होते है कि गर्ल्स को सपोर्ट करें. बल्कि गर्ल्स पर रिस्ट्रिक्सन औऱ बढ़ता है ऐसी चीजों के बाद.

 

अब क्या मुंबई और क्या दिल्ली. देश के छोटे – छोटे शहरों में भी मुझ पर बड़े-बड़े सितम तोड़े जाते हैं. सच तो यही है कि देश के हर कोने में, हर सूबे और हर शहर में देश की बेटी की कहानी एक सी है.

 

 

पटना की अवंतिका बताती हैं कि ऐसा नहीं है कि सिर्फ लड़के ही परेशान करते हैं. मैने जनरली ऑबजर्व किया है कि जब मैं ऑटो से ट्रेवल करती हूं तो जो सीनियर लोग होते हैं. सीनियर ग्रुप के लोग ज्यादा बदतमीजी करते हैं. वो टच करने की कोशिश करते हैं. बहुत बुरा लगता है. अगर हम रोड़ पर जा रहे होते हैं तो दूर से ही लोग ऐसे घूरते हैं मतलब थोड़ा अनकम्फर्टेबल फील होने लगता है. कि मेरे में क्या प्रॉब्लम है.

 

बहुत सारी प्राब्लम होती है. मार्केट हो कहीं भी हो पता चला आप कहीं भी जा रहे हो कुछ लोग आपको फालो कर रहे हैं. कुछ लोग आपको कमेंट कर रहे हैं आल द टाइम. पटना की ही अपर्णा बताती हैं कि आजकल कहीं भी लड़कियां चाहे रोड पर चल रही हैं चाहे बस में या रेल में ट्रेवल कर रहे हैं. उन्हें तरह तरह के कमेंट, गंदी गंदी बातें और बेड टचेस को सहना ही पडता है. और ये लड़के ही नहीं मिडिल एज के आदमी आजकल ज्यादा करते हैं. जब हम लोग आटो में बैठते है बगल में बैठते हैं अपने हाथ को रखते हैं हमारे हाथों पर पैरो पर. ये सब ज्यादा मिडिल एज के लोग करते हैं. लड़के तो कमेंट करते हैं लेकिन जो आदमी है मिडिल एज के वो अपनी लिमिट क्रास कर देते हैं.

 

अब तो दिल्ली का अंधेरा ही नहीं उजाला भी बेटियों को डराता है. सुबह और शाम किसी अनहोनी से खौफ खाती हैं. हर्षिता बताती हैं कि एक सुबह जब मैं बस से आ रही थी तो एक अंकल के उम्र के आदमी. शायद मेरे पापा से दो साल छोटे होंगे वो मुझे ऐसे-ऐसे छूने की कोशिश कर रहे थे…तो मुझे लग रहा था कि इनकी उम्र इतनी ज्यादा है मैं बोलूं तो क्या बोलूं. मुझे खुद शर्म आ रही थी पर उनको शर्म नहीं आई. और जब मैं बस से उतर गई तो वो मुझ से कह रहे थे. मेरे साथ ऑटो मे चलोगी ग्रीन पार्क तक. ये सब रोज फेस करना पड़ता है इतना ज्यादा हो चुका है ये सब कि अब मुझे लगता है कि मेरी जिंदगी की हिस्सी बन गया है ये सब . रोज अब कुछ नया नहीं लगता अगर थोड़ी सी छेड़खानी हो जाए तो अब इसको मैं हिस्सा मान चुकी हूं.

 

जयपुर की छात्रा निष्ठा जैन बताती हैं कि बहुत सारे लड़के चीप माइंडेड होते हैं. उनको घर में ऐसा बताया जाता है कि यू आर ए ब्वॉय और यू आर ए गर्ल. ये घर में ही ऐसा मेंटालिटी बनाई जाती है कि लड़के बाहर जाकर ऐसा बैड बिहेवियर करते हैं. इसको रोकना ही चाहिए. क्योंकि हम लोग कहीं बाहर पढने नहीं जा सकते हैं. हम लोगों का ड्रीम है कि हम लोग किसी अच्छी यूनीवर्सिटी में पढे, दिल्ली वगैरह में. लेकिन इतने केसेज जो आजकल हो रहे हैं. किसी के भी पैरेंट अलाउ नहीं करेंगे कि वो बाहर जाकर पढ़े. 

 

दिल्ली की आस्था बताती हैं कि घर वाले ये बोलते हैं कि तुम उन लोगों को क्यों बोलते हो तुम उन लोगों को इगनोर करो. तुम अपना काम करो या वहां पर कोई हो तो तुम उस को बोल दो. किसी को बोलते हैं तो कोई एख्शन नहीं लेता. इग्नौर करना सोल्यूशन नहीं है.

 

रात में निकलना इंपोसिबल है. अगर आप रात को निकलते हो तो मेरे पापा को ये डर बना रहता है. कॉल करते रहते हैं कौन से आटो में बैठी हो नंबर क्या है. नंबर बताओं अभी दो साल पहले जो घटना हुई थी. उसके बाद तो और भई दहशत है मेरे पेरेंट के मन में मेरे मन में खुद भी.

 

रेल हो या बस, सडक हो या फिर कोई शहर. छेड़छाड का शिकार बनना तो जैसे बेटियों की नियती बन चुकी है. मेट्रो में भी लोग गंदी-गंदी फब्तियां कसते हैं . बाजार और भीड़ भरे इलाकों में रौंदते हुए बदसलूकी का जो तूफान गुजरता है उसकी टीस. उसका दर्द सिर्फ वे ही महसूस कर सकती हैं.

 

दिल्ली की छात्रा ज्योति बताती हैं कि छह कोचेस की मेट्रो आई जबकि आठ लिखा हुआ था तो जो लड़के खड़े थे. और लेडिज कोच एकदम पीछे चला गया और लड़के उसमें घुस गए. और उस वक्त मुझे टच किया. तो उस वक्त कुछ हुआ. तो मुझे लगा कि यार मेरे साथ ये क्या हो गया मेरी क्या गलती थी मैं तो सिर्फ मेट्रो लेने के लिए खड़ी हुई थी ना. मेरी तो कोई गलती नहीं थी उस टाइम पर लेकिन मुझे ही गलती फील हुई, मुझे गंदा फील हुआ उस टाइम पर मेरी अटेंटिव नेस थी कि मैंने उसको पकड़कर मारा और जब मैंने पुलिस वाले को हैंड ओवर किया तो पुलिस वाले ने कहा कि दो थप्पड़ लगाए हैं चार और लगा दो. जब पुलिस से ही मुझे ऐसा जवाब मिल रहा है तो मैं तो यहीं कहूंगी कि यार अपने साथ चाकू छुरी लेकर चलो और उनको मारो.

 

जब दिल्ली में मेट्रो शुरु हुई थी तो मैने राहत की सांस ली थी कि चलो बस के सफर से कुछ निजात तो मिलेगी. लेकिन अब तो मेट्रो का सफर भी मेरे लिए छेडखानी का सबब बन गया है. एक बार मैं राजीव चौक पर थी बहुत क्राउडेड था. तो मैने अंदर घुस कर कॉमन कोच बोर्ड कर लिया था. मैं बस वहां पर खडी हुई ही थी तो किसी ने मुझे छुआ.

 

दरवाजा खुलते ही वो भाग गया. मैं समझ ही नहीं पाई की असल में हुआ क्या है. बस हो गया और मैं खडी रह गई कि ये हुआ क्या है मेरे साथ. समवन टच मी, लेकिन पीपीलु्स डोंट रिलाइज. उन्हें समझ नहीं आता कि वो क्या कर रहे हैं. या उनका माइंडसेट ऐसा हो जाता है कि क्या हो रहा है. मुझे अभी तक ये चीज क्लीयर नहीं हुई है. कि लोगों का माइंडसेट कैसे चेज किया जाए. 

 

ये पुरुषवादी सोच आखिर कब बदलेगी. ये बंदिशों की बेडियां आखिर कब टूटेगी. समाज की नजरें ही नहीं. पुलिस के रिकॉर्ड और मीडिया की खबरें भी गवाह है कि किस कदर सतायी गई हैं बेटियां. अब तो घर से बाहर कदम निकालने से भी डरती हैं. हर दिन सिसकती हैं. हर दिन तड़पती हैं. लेकिन ये आंसू , ये जख्मी आत्मा ना जाने क्यों किसी को नजर नहीं आती. हर वक्त. हर जगह सताई जाती हैं फिर भी ना जाने क्यों बेटियों ये दर्द किसी को सुनाई नही देता है. आखिर ये देश अपनी बेटी को इतना सताता क्यों है? आखिर ये देश ऐसा क्यों है?  

 

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Web Title: special story on rape
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