मानसिक रोगों पर भारत में अभी भी खास ध्यान नहीं

मानसिक रोगों पर भारत में अभी भी खास ध्यान नहीं

By: | Updated: 15 Sep 2017 08:36 AM

नई दिल्लीः भारत में आज भी मेंटल हेल्थ पर बहुत ध्यान नहीं दिया जाता. इस संबंध में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) का मानना है कि देश में मानसिक रोगों को अभी भी उचित महत्व नहीं दिया जा रहा. अभी भी लोगों को इसके लिए जागरूक होने की जरूरत है. आज हम आपको ऐसे ही एक मानसिक विकार के बारे में बताने जा रहे है जिसे सिजोफ्रेनिया के नाम से जाना जाता है.


क्या है सिजोफ्रेनिया-
सिजोफ्रेनिया एक ऐसा ही मानसिक विकार है जो एक पुराना और गंभीर मानसिक विकार है और जिसकी वजह से व्यक्ति के सोचने, महसूस करने और व्यवहार करने का तरीका प्रभावित होता है.


क्या कहते हैं एक्सपर्ट-
आईएमए के अध्यक्ष डॉ. के.के. अग्रवाल ने कहा, "सिजोफ्रेनिया 16 से 30 साल की आयु में हो सकता है. पुरुषों में इस रोग के लक्षण महिलाओं की तुलना में कम उम्र में दिखने शुरू हो सकते हैं. बहुत से लोगों को इस बात का अहसास ही नहीं होता कि उन्हें यह रोग हो गया है, क्योंकि इसके लक्षण बहुत लंबे समय बाद सामने आते हैं."


क्या कहते हैं आंकड़े-
देशभर में किए गए एक सर्वे के अनुसार, भारत की सामान्य जनसंख्या का लगभग 13.7 प्रतिशत हिस्सा मानसिक बीमारियों से ग्रस्त है. इसके अलावा, इनमें से लगभग 10.6 प्रतिशत लोगों को इमिडिएट मेडिकल केयर की आवश्यकता होती है.


सिजोफ्रेनिया के मरीजों का बिहेवियर-




  • ऐसे लोग दूसरों से दूर रहने लगते हैं और अकेले होते जाते हैं.

  • वे अटपटे तरीके से सोचते हैं और हर बात पर संदेह करते हैं.

  • ऐसे लोगों के परिवार में अक्सर पहले से मनोविकृति की समस्या चली आ रही होती है.

  • युवाओं में ऐसी स्थिति को 'प्रोड्रोमल पीरियड' कहा जाता है.

  • रोग का पता लगाना इसलिए भी मुश्किल हो जाता है, क्योंकि बहुत से लोग मानते हैं कि उन्हें ऐसा कुछ है ही नहीं.

  • सिजोफ्रेनिया के मरीजों को अन्य दिक्कतें भी हो सकती हैं जैसे कि किसी नशीले पदार्थ की लत, स्ट्रेस, और डिप्रेशन.


शोधकर्ताओं का यह भी सुझाव है कि इस स्थिति के लिए भ्रूणावस्था में न्यूरोनल विकास भी जिम्मेदार हो सकता है." सिजोफ्रेनिया रोगियों का इलाज आमतौर पर दवा और साइक्लोजिकल काउंसलिंग से होता है.


इस बीमारी से बचाव के लिए कुछ उपाय -




  • सही उपचार कराएं. इलाज को बीच में बंद न करें.

  • ऐसे रोगियों को यही लगता है कि वे जो सोच रहे हैं, वही सच है.

  • ऐसे रोगियों को बताएं कि हर किसी को अपने तरीके से सोचने का अधिकार है.

  • खतरनाक या अनुचित व्यवहार को बर्दाश्त किए बिना ऐसे मरीजों से सम्मान के साथ पेश आए और उनकी मदद करें.


नोट: ये रिसर्च के दावे पर हैं. ABP न्यूज़ इसकी पुष्टि नहीं करता. आप किसी भी सुझाव पर अमल या इलाज शुरू करने से पहले अपने डॉक्टर की सलाह जरूर ले लें.

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