अंबेडकर के मुताबिक अराजकता के मायने: हमें क्रांति का खूनी रास्ता छोड़ना होगा

By: | Last Updated: Tuesday, 21 January 2014 1:25 PM
अंबेडकर के मुताबिक अराजकता के मायने: हमें क्रांति का खूनी रास्ता छोड़ना होगा

नई दिल्ली: दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के धरने को लेकर अराजकता शब्द की खूब चर्चा है. आखिर क्या हैं इस शब्द के मायने और किसे कहते हैं अराजकता.

 

अराजकता को जानने से पहले पता दूं कि कल अरविंद केजरीवाल ने रेल भवन के बाहर कहा था कि ‘अगर इस धरने को अराजकता कहा जा रहा है हां मैं अराजक हूं.’

 

आखिर मुख्यमंत्री केजरीवाल क्यों कह रहे हैं कि वो अराजक हैं, ये बताने से पहले ये जानना जरूरी है कि आखिर क्या है अराजकता के मायने.

 

अराजकता के मायने

 

आइए सबसे पहले देखते हैं दुनिया की जानी मानी डिक्शनरी वेब्सटर में अराजकता का क्या अर्थ बताया गया है. अराजकता को अग्रेजी में एनारकी कहते हैं.

 

वेब्सटर डिक्शनरी में एनारकी का मतलब बताया गया है-

 

ऐबसेंट ऑफ गवर्नमेंट- लॉलेसनेस एंड डिसऑर्डर ऑफ गवर्नमेंट- इसका मतलब है- कानून का राज खत्म हो जाना. सरकार की भूमिका का खत्म हो जाना. एक तरह से जंगल राज कह सकते हैं.

 

अरविंद केजरीवाल ने खुद को न ही सिर्फ अराजक बताया बल्कि लोकतंत्र की ही नई परिभाषा गढ़ डाली. अब वो कह रहे हैं कि रेल भवन के बाहर अभी जो कुछ वो कर रहे हैं वो अगर अराजकता है तो लोकतंत्र भी अराजकता है.

 

समय-समय पर राजनीतिक पार्टियां अपने हित के लिए भीड़तंत्र का इस्तेमाल करती हैं.. धरना, प्रदर्शन, सत्याग्रह, अनशन.

 

अरविंद केजरीवाल के भी ये राजनीतिक हथियार रहे हैं- पर इस बारे संविधान बनते समय संविधान सभा के अध्यक्ष भीमराव अंबेडकर ने चेताया था.  

 

अंबेडकर ने कहा था, ” प्रजातंत्र को केवल नाम के लिए नहीं बल्कि वास्तव में बनाए रखने के लिए हमें क्या करना चाहिए?  मेरी समझ से, हमें पहला काम यह करना चाहिए कि अपने सामाजिक और आर्थिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए ईमानदारी के साथ संवैधानिक उपायों का ही सहारा लेना चाहिए. इसका अर्थ है, हमें क्रांति का खूनी रास्ता छोड़ना होगा. इसका अर्थ है कि हमें सविनय अवज्ञा आंदोलन, असहयोग और सत्याग्रह के तरीके छोड़ने होंगे. जब आर्थिक और सामाजिक लक्ष्यों को हासिल करने का कोई संवैधानिक उपाय न बचा हो, तब असंवैधानिक उपाय उचित जान पड़ते हैं. परंतु जहां संवैधानिक उपाय खुले हों, वहां इन असंवैधानिक उपायों का कोई मतलब नहीं है. ये तरीके अराजकता के व्याकरण के सिवाय कुछ भी नहीं हैं और जितनी जल्दी इन्हें छोड़ दिया जाए, हमारे लिए उतना ही अच्छा है.”

 

अरविंद केजरीवाल के लोग तो संविधान बदलने की भी बात करते रहे हैं- भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि संविधान के दायरे में रह कर सभी तरह की समस्याओं का समाधान हो सकता है.

 

अंबेडकर ने कहा था, ” यह कौन कह सकता है कि भारत की जनता और उनके राजनीतिक दल किस तरह का आचरण करेंगे? अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए क्या वे संवैधानिक तरीके इस्तेमाल करेंगे या उनके लिए क्रांतिकारी तरीके अपनाएंगे? यदि वे क्रांतिकारी तरीके अपनाते हैं तो संविधान चाहे जितना अच्छा हो, यह बात कहने के लिए किसी ज्योतिषी की आवश्यकता नहीं कि वह असफल रहेगा. इसलिए जनता और उनके राजनीतिक दलों की संभावित भूमिका को ध्यान में रखे बिना संविधान पर कोई राय व्यक्त करना उपयोगी नहीं है.”

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Web Title: अंबेडकर के मुताबिक अराजकता के मायने: हमें क्रांति का खूनी रास्ता छोड़ना होगा
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