अध्यादेश के विरोध के शब्द थे कड़े, लेकिन भावनाएं थी सही: राहुल

By: | Last Updated: Thursday, 3 October 2013 7:22 AM
अध्यादेश के विरोध के शब्द थे कड़े, लेकिन भावनाएं थी सही: राहुल

अहमदाबाद: दागी नेताओं को
बचाने वाले अध्यादेश के
विरोध में राहुल गांधी ने
पिछले शुक्रवार को जिन
शब्दों का इस्तेमाल किया था,
वो शब्द थे कड़े. ठीक सातवें
दिन राहुल को इस बात का एहसास
हुआ है.

पिछले शुक्रवार को दिल्ली के
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में
सरप्राइज इंट्री मारते हुए
राहुल ने पत्रकारों के बीच इस
अध्यादेश के मुद्दे पर अपनी
राय रखी और इसका विरोध करते
हुए अध्यादेश को कह दिया
बकवास.

इसे लेकर तुरंत चर्चा शुरु हो
गई कि आखिर जिस अध्यादेश को
कांग्रेस की कोर कमेटी और
कैबिनेट की बैठक में मंजूरी
के बाद राष्ट्रपति के
हस्ताक्षर के लिए भेजा गया
हो, उसके विरोध में राहुल का
बकवास जैसा शब्द कहना कितना
उचित था या फिर ये कि इसे
फाड़कर कूड़े में फेंक देना
चाहिए.

इस बहस के जोर पकड़ने और कल ही
इस अध्यादेश को वापस लिए जाने
का कांग्रेस कोर कमेटी और
कैबिनेट में फैसला हो जाने के
बाद अब राहुल गांधी ने इस
मुद्दे पर एक बार फिर से अपनी
बात रखी है. इसके लिए भी राहुल
गांधी ने मौका चुना
पत्रकारों के एक मंच का ही. दो
दिन के गुजरात दौरे पर आये
राहुल गांधी ने गुरुवार की
शाम गुजरात मीडिया क्लब की
तरफ से आयोजित पत्रकारों के
साथ अनौपचारिक मुलाकात को
खुद ही औपचारिक कर दिया और
पत्रकारों के सवालों का जवाब
देने के पूरे मूड में दिखे.

सोनिया ने कहा कि अध्यादेश
के विरोध में इस्तेमाल हुए
शब्द थे कड़े

इसी दौरान उनसे ये पूछा गया
कि दागी नेताओं को मदद
पहुंचाने संबंधी अध्यादेश
के विरोध में बकवास जैसा शब्द
जो उन्हें इस्तेमाल किया और
इससे प्रधानमंत्री मनमोहन
सिंह की किरकिरी होती दिखी,
उसके बारे मे वो क्या सोचते
हैं. इसके जवाब में राहुल ने
कहा कि उनकी मां सोनिया गांधी
ने खुद उनसे कहा कि विरोध में
बोले गये शब्द काफी कड़े थे.
राहुल भी अब अपनी मां की बात
से इत्तफाक रख रहे हैं. राहुल
ने कहा कि शब्द वाकई मैंने
कड़े कह दिये थे, लेकिन मेरी
भावनाएं गलत नहीं थीं.

कांग्रेस और बीजेपी दोनों
ही पार्टियों में महज पांच सौ
लोग तय करते हैं कि कौन बनेगा
सांसद या विधायक

गुजरात मीडिया क्लब के ही इस
कार्यक्रम में राहुल गांधी
ने कहा कि आज देश में जो
सियासी पार्टियों की स्थिति
है, उसमें काफी छोटा समूह ये
तय करता है कि आखिर देश में
कौन सांसद का उम्मीदवार हो या
फिर कौन विधानसभा में चुनकर
जाए. राहुल ने स्वीकार किया
कि उनकी पार्टी कांग्रेस में
भी पांच सौ के करीब लोग ही ये
तय कर लेते हैं कि देश के किस
हिस्से में कौन विधायक बनने
लायक है या फिर सांसद. राहुल
के मुताबिक बीजेपी की भी यही
स्थिति है और बीएसपी में तो
सिर्फ अकेले मायावती ये तय
करती हैं कि आखिर उनकी पार्टी
से कौन विधायक या सांसद
बनेगा. राहुल ने इस परिस्थिति
को राजनीतिक दलों में
पारदर्शिता की कमी से जोड़ा.

क्या हैं वो 2014 के पीएम
उम्मीदवार, चुप्पी साध गये
राहुल

जब राहुल से 2014 चुनावों के
मद्देनजर पीएम उम्मीदवारी
के लिए पूछा गया, तो वो इस सवाल
को टाल गये. पहले भी कई मौकों
पर वो इस सवाल का सीधा जवाब
देने से बचते रहे हैं. यही
नहीं, जब किसी पत्रकार ने ये
सवाल दागा कि कब करेंगे वो
शादी, इस सवाल के जवाब में भी
उन्होंने साध ली चुप्पी.

उत्तर प्रदेश में बीजेपी
दिवास्वप्न देख रही है, नहीं
मिलेगी उसे राज्य में बीस
सीटें भी

उत्तर प्रदेश में हाल में हुए
दंगे और सांप्रदायिक
ध्रुवीकरण के बाद चर्चा इस
बात की है कि बीजेपी को वहां
बड़े पैमाने पर फायदा होगा.
लेकिन राहुल गांधी इससे सहमत
नहीं हैं. राहुल का मानना है
कि बीजेपी उत्तर प्रदेश में
दिवा स्वप्न देख रही है.
राहुल के मुताबिक, उत्तर
प्रदेश में बीजेपी चालीस
सीटों की कौन कहे, लोकसभा की
बीस सीटें भी नहीं जीत पाएगी.
राहुल नरेंद्र मोदी के खास
सिपहसालार और बीजेपी के
उत्तर प्रदेश के प्रभारी
महासचिव अमित शाह को भी
ज्यादा तवज्जो देने को तैयार
नहीं. राहुल मानते हैं कि भले
ही अमित शाह गुजरात की चुनावी
राजनीति में बड़े रणनीतिकार
हों, उन्हें उत्तर प्रदेश की
जमीनी हकीकत की खबर नहीं.

गुजरात में पार्टी की खराब
हालत के लिए बाहरी नहीं,
आंतरिक कारण जिम्मेदार हैं

अपने दो दिन के गुजरात दौरे
में राहुल गांधी 2014 लोकसभा
चुनावों के मद्देनजर राज्य
इकाई का हाल जानने और उसे
दुरुस्त करने की नीयत से आये
हैं. लेकिन वो साफ तौर पर
मानते हैं कि पार्टी की राज्य
इकाई में गुटबाजी खूब है.

राहुल के मुताबिक, गुजरात में
कांग्रेस की बुरी हालत के लिए
आंतरिक कारण ही जिम्मेदार है,
बाहरी कारण ज्यादा
जिम्मेदार नहीं हैं. राहुल का
मानना है कि पार्टी में
इंटरनल डेमोक्रेसी बढ़ाने
की जरुरत है, जिसकी कोशिश
एनएसयूआई और युवा कांग्रेस
में उन्होंने की है.

राहुल ये भी कबूल करते हैं कि
कांग्रेस के मुख्य संगठन में
अचानक बदलाव करना संभव नहीं
हैं. 2014 लोकसभा चुनावों के बाद
आंतरिक चुनाव जैसा प्रयोग
कांग्रेस के मुख्य संगठन में
करने का इरादा है राहुल गांधी
का.

पाकिस्तान से हथियार नहीं,
विचारों के जरिये लड़ने की
जरुरत

राहुल गांधी को लगता है कि
पाकिस्तान के मामले में
हमारी रणनीति अलग होनी चाहिए.
राहुल के मुताबिक, बंदूक के
बदले बंदूक या नकली करेंसी के
बदले नकली करेंसी डंप करने से
काम नहीं चलेगा.

राहुल का कहना है कि अगर
स्त्री सशक्तीकरण या
क्षेत्रीय विषमता जैसे
मुद्दों को पाकिस्तान में
हवा दी जाए, तो पाकिस्तान की
हालत ज्यादा खराब होगी.

नहीं है कोई सार्वजनिक
कार्यक्रम

राहुल गांधी के इस दो दिन के
गुजरात दौरे में एक भी रैली
या सार्वजनिक सभा का आयोजन
नहीं किया गया है. पार्टी के
स्थानीय नेता इसकी वजह बारिश
का सीजन बता रहे हैं. ऐसे में
राहुल सिर्फ पार्टी नेताओं
और कार्यकर्ताओं से क्लोज
डोर मीटिंग कर चले जाने वाले
हैं.

पहले दिन जहां उन्होंने
अहमदाबाद में मध्य और दक्षिण
गुजरात के पार्टी नेताओं और
कार्यकर्ताओं से बातचीत की,
तो कल वो राजकोट में
सौराष्ट्र और उत्तर गुजरात
के नेताओं और कार्यकर्ताओं
से मिलने वाले हैं. इसे 2014
लोकसभा चुनावों की
तैयारियों के तौर पर देखा जा
रहा है, खास तौर पर तब जबकि
गुजरात में चुनौती और कड़ी हो
सकती है, क्योंकि यहां के
मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी
बीजेपी के पीएम उम्मीदवार बन
चुके हैं.  

http://www.youtube.com/watch?v=DvJpE4nCCi8

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