अन्‍ना का आंदोलन: जब दौड़ी चली आई जनता

अन्‍ना का आंदोलन: जब दौड़ी चली आई जनता

By: | Updated: 04 Apr 2012 09:32 PM


नई
दिल्‍ली:
ठीक एक साल पहले 5
अप्रैल 2011 को दिल्ली के
जंतर-मंतर में एक ऐसी चिंगारी
को हवा मिली, जो देश के
ज़्यादातर लोगों के दिलों
में सुलग रही थी. ये
भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों
के मन में दबे आक्रोश की
चिंगारी थी.





भ्रष्टाचार के जंजाल में
फंसी जनता का गुस्सा, जनता की
बेबसी और जनता का आक्रोश
अगस्त 2011 में फूटा पड़ा. इस
आंदोलन को समझने के लिए एक
साल पीछे जाना पड़ेगा, जब
दिल्ली के जंतर-मंतर से इसकी
शुरुआत हुई थी.

5 अप्रैल
2011:
जन लोकपाल बिल की मांग के
साथ अन्‍ना हजारे ने दिल्‍ली
स्थित जंतर-मंतर पर अपना अनशन
शुरू किया. जंतर-मंतर पर महज़
पांच दिनों में अन्ना का छोटा
सा अनशन भ्रष्टाचार के खिलाफ
भारत का सबसे बड़ा अनशन बन
गया. अन्‍ना 5 अप्रैल 2011 से
पहले न तो इतने मशहूर थे और न
ही उनका जन लोकपाल बिल. लेकिन
जंतर-मंतर पर पांच दिन के
अनशन के बाद अन्ना
भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन
के सबसे ताकतवर चेहरा बन गए.

'मैं
भी अन्ना, तू भी अन्ना...',
'वंदेमातरम...' और 'भारत माता की
जय...' जैसे नारों से पूरी
दिल्‍ली गूंज उठी. देखते ही
देखते गांधी टोपी वाले
अन्‍ना हजारे भ्रष्टाचार के
खिलाफ जंग का प्रतीक बन गए.
यहीं से सरकार के साथ
जनलोकपाल की लड़ाई को लेकर
देश भर में अन्ना की आंधी
चलने लगी.

जन लोकपाल बिल
पर जैसे-जैसे अन्ना के अनशन
ने रफ्तार पकड़ी सरकार के साथ
टकराव भी बढ़ता गया, लेकिन
अन्ना को मिल रहे जनसमर्थन के
आगे आखिरकार सरकार ने घुटने
टेक दिए.

9 अप्रैल 2011: अनशन
के महज पांच दिन बाद ही नौ
अप्रैल की सुबह सरकार ने
जनलोकपाल बिल के लिए संयुक्त
समिति बनाने का नोटिफिकेशन
जारी कर दिया. सरकार लोकपाल
बिल का ड्राफ्ट तैयार करने के
लिए संयुक्‍त टीम के गठन को
राजी हो गई. इसी के साथ अन्‍ना
ने अपना अनशन भी तोड़ दिया.

अन्ना
के अनशन से घबराई केंद्र
सरकार ने लोकपाल बिल का
ड्राफ्ट तैयार करने के काम
में अन्ना समत उनकी टीम के
पांच लोगों को इस समिति में
शामिल कर लिया. यह फैसला लिया
गया कि इस कमेटी में सरकार और
सिविल सोसाइटी की तरफ से
पांच-पांच सदस्‍य होंगे.
कांग्रेस के संकटमोचक प्रणब
मुखर्जी को इस कमेटी का
अध्‍यक्ष बनाया गया , जबकि
टीम अन्‍ना की ओर से प्रशांत
भूषण उपाध्‍यक्ष बनाए गए. इस
एक कामयाबी ने अन्ना हजारे को
देश का हीरो बना दिया.

16
अप्रैल 2011:
सरकारी नुमाइंदो
और टीम अन्‍ना की सयुंक्त
समिति की पहली बैठक अनशन के
11वें दिन बाद बुला ली गई. सब
कुछ एक दम अन्ना की उम्मीद के
मुताबिक चल रहा था.

30 मई 2011:
संयुक्‍त कमेटी की पांचवीं
बैठक हुई. इस बैठक में
भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना
की जंग और सरकार की मंशा के
बीच पैदा हुए मतभेद बहुत जल्द
जगजाहिर हो गए. सरकार और
अन्ना के बीच सहयोग का यह
रिश्ता ज्यादा दिन नहीं चल
सका. सरकार ने अन्‍ना हजारे
से साफ तौर पर कह दिया कि वो
प्रधानमंत्री, न्‍यायपालिका
और संसद के अंदर सांसदों के
व्‍यवहार को लोकपाल के दायरे
में लाने के लिए तैयार नहीं
है.

6 जून 2011: बाबा रामदेव
के अनशन पर पुलिसिया
कार्रवाई का विरोध करते हुए
टीम अन्‍ना ने संयुक्‍त
कमेटी बैठक का बहिष्‍कार
किया. टीम अन्‍ना के शामिल
नहीं होने के बावजूद सरकारी
नुमांइदों ने बैठक की.

21
जून 2011:
संयुक्‍त कमेटी की
आखिरी बैठक. करीब दो महीने की
मशक्क्त के बाद आखिरकार
संयुक्त समिति का कार्यकाल
लोकपाल बिल पर अन्ना और सरकार
के बीच सहमति बने बगैर ही
खत्म हो गया. प्रधानमंत्री,
जजों और सांसदों को लोकपाल के
दायरे में लाने के लिए अन्ना
अड़ गए. सरकार मानी नहीं और
अन्ना पीछे हटे नहीं. यहीं से
अन्ना के एक और अनशन का
रास्ता बनना शुरू हो गया.

19
जुलाई 2011:
अन्ना हजारे ने
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह
को चिट्ठी लिखी. सरकार के
रवैये से भड़के अन्ना हजारे
ने इस चिट्ठी में चेतावनी दी
कि अगर सरकार ने मानसून सत्र
में मजबूत लोकपाल बिल पारित
नहीं किया तो वो एक बार फिर 16
अगस्त से दिल्ली में आमरण
अनशन करने पर मजबूर हो
जाएंगे.

15 अगस्‍त 2011: एक
तरफ देश आज़ादी का जश्न मना
रहा था और दूसरी तरफ अन्ना
अनशन की तैयारी में लगे थे. तब
तक किसी ने सोचा भी नहीं था कि
महज़ एक दिन बाद देश में एक और
क्रांति की शुरुआत होने वाली
है. उधर, टीम अन्ना ने दिल्‍ली
प्रशासन की ओर से लगाई गई 22
शर्तों में से छह को मानने से
इनकार कर दिया था.

इसके
बाद पुलिस ने अन्‍ना हजारे को
दिल्‍ली के जेपी पार्क में
अनशन की मंजूरी नहीं दी. वहीं,
अन्‍ना ने दिल्ली पुलिस के
अनुमति न देने के बावजूद जेपी
पार्क में अपना
अनिश्चितकालीन अनशन शुरू
करने की घोषणा की.

16
अगस्‍त 2011:
स्वतंत्रता दिवस
के दूसरे ही दिन पूरा देश वो
ड्रामा देख रहा था जो अन्ना
के अनशन और सरकार की ताकत के
बीच खेला जा रहा था. दिल्ली के
मयूर विहार से अन्ना को
दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर
लिया. दिन भर दिल्ली पुलिस
अन्ना को एक जगह से दूसरी जगह
घुमाती रही. अन्ना के समर्थन
में लोग दिल्ली की सड़कों पर
उतर आए. देश के कई और शहरों में
अन्ना समर्थकों ने
गिरफ्तारियां दीं.

देश
गुस्से में उबल रहा था. जनता
के आक्रोश का वो चेहरा सामने
आया जिसके बारे में ने तो
सरकार और न खुद टीम अन्ना ने
सोचा था. शाम होते-होते अन्ना
को सात दिन की न्यायिक हिरासत
में दिल्ली की तिहाड़ जेल भेज
दिया गया. सरकार के इस एक
फैसले ने आंदोलन को हवा दे दी.
देश भर में अन्ना के समर्थन
में लोग सड़कों पर उतर आए.
दिल्ली का छत्रसाल स्टेडियम
अन्ना के गिरफ्तार समर्थकों
से भर गया और तिहाड़ जेल के
बाहर लोगों ने डेरा डाल दिया.

अन्ना
को जनता की ताकत का अंदाज़ा
था. वो आंदोलन का कल देख रहे
थे. वो जानते थे कि जब तक जनता
उनके साथ है वो सरकार को झुका
सकते हैं. अन्ना तिहाड़ जेल
में ही अनशन पर बैठ गए. तिहाड
जेल के अंदर अन्ना का अनशन और
तिहाड़ के बाहर समर्थकों का
भारी हुजूम. अब तक सरकार भी यह
समझ चुकी थी कि अन्ना को रिहा
करने में ही भलाई है. इसलिए
अन्ना की रिहाई का फरमान जारी
कर दिया. अन्‍ना ने बाहर जाने
से इनकार कर दिया.

17
अगस्‍त 2011:
अन्ना ने जेल से
बाहर निकलने की शर्त रख दी.
उन्‍होंने कहा कि उन्‍हें
अनशन की इजाजत और जगह दी जाए.
सरकार को दिल्ली का रामलीला
मैदान अन्ना को अनशन के लिए
देना पड़ा.

19 अगस्‍त 2011:
अन्ना हज़ारे ने तिहाड़ जेल
से बाहर निकलते ही वहां जमा
अपने समर्थकों का अभिवादन
किया और अपील की कि वे
शांतिपूर्ण ढंग से अपना
आंदोलन जारी रखें. पिछले तीन
दिनों से लोग वहां से हटे
नहीं थे. तिहाड़ जेल में रहने
के दौरान भी अन्ना ने अपना
अनशन जारी रखा था. रामलीला
मैदान में अनशन की अनुमति
मिलने के बाद वो बाहर निकले
तो सुरक्षा के व्यापक
इंतज़ाम किए गए थे.

अन्ना
हज़ारे के लिए एक ट्रक का
इंतज़ाम किया गया था, जिसके
ज़रिए वो तिहाड़ जेल से
रामलीला मैदान की ओर रवाना
हुए. उनके साथ तिरंगा लहराते
हुए लोगों का हुजूम चल रहा था.
तय कार्यक्रम के अनुसार
तिहाड़ से निकलने के बाद
अन्ना हज़ारे राजघाट में
महात्मा गांधी की समाधि स्थल
पर पहुंचे और उन्हें अपनी
श्रद्धांजलि अर्पित की.

अन्ना
हज़ारे जगह-जगह लोगों का
अभिवादन स्वीकार करते रहे और
उन्हें भ्रष्टाचार के
ख़िलाफ़ लड़ाई में साथ देने
के लिए उन्हें धन्यवाद देते
रहे. अन्ना हज़ारे 16 अगस्त से
लगातार अनशन पर थे, लेकिन
उनकी स्‍फूर्ति देखकर लोग
चौंक गए जब 74 वर्षीय अन्ना
लगभग दौ़ड़ते हुए राजघाट से
बाहर निकले.

दिल्ली ने
लंबे समय बाद एक ऐसी रैली
देखी जो गैर राजनीतिक थी,
लेकिन इसके बावजूद बड़ी
संख्या में लोग इसमें शामिल
थे और लगातार नारे लगाते चल
रहे थे. उधर, रामलीला मैदान
में हो रही बारिश के बावजूद
लोग डटे हुए थे और अन्ना
हज़ारे का इंतज़ार कर रहे थे.
अन्ना की टीम की सदस्य किरण
बेदी तिरंगा लहराते हुए उनके
स्वागत की तैयारी कर रही थीं.


रामलीला मैदान में
पहुंचने के बाद समर्थकों ने
उनका जोरदार स्‍वागत किया.
ऐतिहासिक रामलीला मैदान में
दिए अपने पहले भाषण में
अन्‍ना हजारे ने कहा, 'यह
आजादी की दूसरी लड़ाई है और
मैं रहूं न रहूं मशाल जलती
रहनी चाहिए.

23 अगस्‍त 2011:
सरकार ने टीम अन्‍ना के साथ
बातचीत की पहल की.

24
अगस्‍त 2011:
अन्‍ना के आंदोलन
से घबराई सरकार ने फिर
सर्वदलीय बैठक बुलाई.

25
अगस्‍त 2011:
देश की जनता अन्ना
के साथ खड़ी रही. हकीकत में इस
आंदोलन को उम्मीद से कहीं
ज्यादा कामयाबी मिली. सरकार
संसद में लोकपाल बिल पर चर्चा
के तैयार हो गई.

27 अगस्‍त
2011:
संसद का विशेष सत्र
बुलाया गया. सरकार ने संसद
में अन्ना की प्रमुख तीन
मांगों पर बहस कराई. रात आठ
बजे तक संसद के दोनों सदनों
ने ध्वनिमत से इन शर्तों के
पक्ष में विचार करने के लिए
उसे स्थाई समिति के पास भेजने
का प्रस्ताव पारित कर दिया.
इसके बाद अन्‍ना ने घोषणा की
कि वे अपना अनशन तोड़ देंगे.
आज तक किसी भी आंदोलन की वजह
से संसद के विशेष सत्र नहीं
बुलाया गया था.

28 अगस्‍त
2011:
अन्‍ना ने दो बच्चियों के
हाथों नारियल पानी पीकर अपना
अनशत तोड़ दिया. इसके बाद
अन्‍ना हजारे को गुड़गांव
स्थित मेदांता अस्‍पताल में
भर्ती करा दिया गया.




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