अमेठी में बेटे, बहू और विश्वास के बीच के संघर्ष पर पूरी दुनिया की मीडिया की नज़र

By: | Last Updated: Saturday, 12 April 2014 5:01 AM
अमेठी में बेटे, बहू और विश्वास के बीच के संघर्ष पर पूरी दुनिया की मीडिया की नज़र

लखनऊ: गांधी परिवार की परंपरागत सीट मानी जाने वाली अमेठी लोकसभा इस समय दुनिया के तमाम अख़बारों और मीडिया चैनल में सुर्खियों में है. अमेठी संसदीय सीट पर बीजेपी प्रत्याशी की घोषणा और एसपी के इनकार के बाद यहां की सियासी तस्वीर साफ हो गई है. यहां बिजली, पानी, सड़क व शिक्षा कहीं पीछे छूट गए हैं.

 

अमेठी में मुकाबला गांधी परिवार के राहुल गांधी, टीवी सीरियल की ‘बहू’ स्मृति ईरानी और आप के कुमार विश्वास के बीच होना तय हो गया है. इस चुनाव में बीएसपी 14 नंबर के खिलाड़ी की तरह नजर आ रही है.

 

अगर अमेठी की पहचान राहुल गांधी के परिवार से है, तो बीजेपी की स्मृति ईरानी भी ‘सास भी कभी बहू थी’ में किरदार निभाने के कारण घर-घर में पहचान रखती हैं. इसके साथ ही विश्वास की कविता भी किसी परिचय की मोहताज नहीं है. राहुल का हमेशा से आधी आबादी पर फोकस रहा है और अब उसी का प्रतिनिधित्व करने वाली स्मृति ईरानी भी लोगों को लुभाने की कोशिश कर रही हैं.

 

कांग्रेस उपाध्यक्ष तीसरी बार भावनात्मक रिश्तों के सहारे अपने ही पुराने रिकार्ड को तोड़ने की फिराक में हैं. ‘आप’ के कुमार भी प्रेम के महाकवि मलिक मोहम्मद जायसी की जन्म व कर्मस्थली में अपनी ‘कविता’ के साथ विश्वास जीतने की फिराक में पिछले दो माह से कांग्रेस पर हमला बोल रहे हैं.

 

बीएसपी प्रत्याशी डा. धर्मेद्र सिंह पार्टी की थाती को लेकर खासे उत्साहित हैं. जैसे-जैसे चुनाव प्रचार गति पकड़ रहा है, स्थानीय मुद्दे भी चर्चा से ठीक उसी गति से दूर हो रहे हैं. अब तो मुख्य मार्ग का चौराहा हो या गली का नुक्कड़, हर जगह बेटे, बहू और विश्वास की ही बात है.

 

सांसद राहुल गांधी का संसदीय क्षेत्र करीब 100 किलोमीटर के दायरे में है, लेकिन अमेठी लोकसभा क्षेत्र मात्र इसलिए चर्चित रही है क्योंकि गांधी परिवार के सदस्य इस क्षेत्र से चुनाव लड़ते रहे हैं. हालांकि देश की वीवीआईपी सीट होने के बावजूद अमेठी अपनी दुर्दशा की दास्तां खुद-ब-खुद बयान करती है.

 

अमेठी ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का शासन भी देखा और पिछले 10 साल से राहुल गांधी का भी. लेकिन दोनों में ही बहुत बड़ा फर्क था. अमेठी की जनता नेहरू-गांधी परिवार को सिर-आंखों पर बिठाती रही है, लेकिन यह मुहब्बत एक बार गड़बड़ा गई. साल था 1977. जनता नाराज थी और नेहरू परिवार इस बात से बेखबर थी कि अगले 25 महीनों तक उसे वनवास झेलना पड़ेगा. 18 महीने की इमरजेंसी और 28 महीने का वनवास.

 

साल 1977 के आम चुनावों में इस सीट से संजय गांधी को पराजय का सामना करना पड़ा. यह चुनाव ऐतिहासिक था. अमेठी सीट पर पूरे विपक्ष की निगाह थी. यहां से संजय गांधी चुनाव लड़ रहे थे. उनके प्रतिद्वंद्वी जनता पार्टी के रविन्द्र प्रताप थे. संजय गांधी की 76 हजार से अधिक मतों से हार हुई. रविन्द्र प्रताप को 176410 और संजय गांधी को 100566 मत मिले. जनता पार्टी के उम्मीदवार को 60.47 फीसद और संजय गांधी को 34.47 फीसद मत मिले थे.

 

इसके बाद 1980 के लोकसभा चुनाव में संजय गांधी अमेठी संसदीय सीट से लोकसभा के लिए चुने गए. अमेठी के संसदीय इतिहास में केवल दो चुनावों में यहां कांग्रेस के प्रत्याशी की पराजय हुई. 1977 में जनता पार्टी के उम्मीदवार ने संजय गांधी को परास्त किया और इसके बाद 1998 में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के संजय सिंह ने कांग्रेस को शिकस्त दी. इन दो मौकों को छोड़कर इस संसदीय सीट पर कांग्रेस का ही प्रभुत्व रहा है.

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Web Title: अमेठी में बेटे, बहू और विश्वास के बीच के संघर्ष पर पूरी दुनिया की मीडिया की नज़र
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