आखिर करोड़ों के साम्राज्य को खड़ा करने वाले सुब्रत रॉय सहारा क्यों गिरफ्तार हुए?

By: | Last Updated: Saturday, 1 March 2014 4:21 AM

नई दिल्ली: 2010 में  सहारा प्राइम सिटी नाम की कंपनी ने शेयर बाजार से पैसे जुटाने के लिए आईपीओ निकाला. निवेशकों का विश्वास जीतने के लिए आईपीओ के प्रोस्पेक्टस में लिखा था कि ग्रुप की दो अन्य कंपनियां डिबेंचर के ज़रिये सैकड़ों करोड़ पब्लिक से जुटा रही हैं. इसपर सेबी की नज़र पड़ी कि ये कौन सी कंपनियां पैसा जुटा रही हैं जिनका सेबी को ही पता नहीं?

 

सेबी ने नवंबर 2010 में ऑर्डर जारी किया कि SIREC यानी सहारा इंडिया रीयल एस्टेट कॉर्पोरेशन और SHIC यानी सहारा हाउसिंग इनवेस्टमेंट कॉर्पोरेशन पैसा जुटाना बंद करें. सहारा ने कहा कि हम पैसा पब्लिक से नहीं अपने परिवार से जुटा रहे है. सेबी ने कहा कि लाखों निवेशकों का सहारा परिवार कैसे हो सकता है, ये तो पब्लिक है.

 

सहारा ग्रुप हाई कोर्ट से स्टे ले आया तो सेबी सुप्रीम कोर्ट चला गया. तारीख पर तारीख पड़ती रही. तब सेबी में तैनात IAS अफसर के एम अब्राहम ने तहकीकात में पाया कि कंपनियों के पास सारे निवेशकों के नाम पते का ब्यौरा तक तैयार नहीं था. और दोनों कंपनियां 40,000 करोड़ जुटाने निकली थीं और करीब 24,000 करोड़ जुटा चुकी थीं.

 

अब्राहम का सेबी से तबादला हो गया लेकिन वो सहारा के खिलाफ अदालत में केस इतना पुख्ता कर गए कि सवाल ये नहीं रहा कि पैसा कहां है, बल्कि असली सवाल ये हो गया कि निवेशक कहां है? यानी निवेशक हैं भी या नहीं औऱ नहीं हैं तो ये हजारों करोड़ हैं किसके?

 

लंबी प्रक्रिया के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये कंपनियां जो अब कह रही हैं कि इनको बाकी 20,000 करोड़ लौटाना है, वो 20,000 करोड़ सेबी को दो और निवेशकों की लिस्ट दो. सेबी अपने आप वापस कर देगा पैसा. निवेशकों की पूरी नाम पते वाली सही से जानकारी और पैसा सेबी को नहीं दे पाया है सहारा जिसका नतीजा ये है कि सुब्रत रॉय़ गिरफ्तार हो गए.

 

 

सहारा ने सेबी के पास 5120 करोड़ जमा कराए हैं लेकिन सेबी ने पिछले सोलह महीनों में केवल एक करोड़ रुपये वापस किए हैं. यानी देश भर में रकम वापसी की कोई मांग नहीं है. वास्तव में 20 हजार करोड़ रुपये सिक्योरिटी के रूप में मांगे गए गए हैं क्योंकि 31 अगस्त का आदेश कहता है कि सेबी की जांच के बाद अगर आंशिक या पूरी तरह नकली खाते हों तो वो राशि सरकारी खाते में जाएगी. लेकिन पिछले 17 महीनों में सेबी ने एक प्रतिशत जांच भी नहीं की है.