आखिर किसको हुआ लैंड यूज़ बदलने से फायदा?

आखिर किसको हुआ लैंड यूज़ बदलने से फायदा?

By: | Updated: 17 Oct 2012 05:23 AM


नई
दिल्ली:
कांग्रेस अध्यक्ष
सोनिया गांधी के दामाद
रॉबर्ट वाड्रा पर नए खुलासे
से सवालों के घेरे में हैं
हरियाणा के मुख्यमंत्री
भूपिंदर सिंह हुड्डा.




अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान
टाइम्स के मुताबिक गुड़गांव
के जिस साढ़े तीन एकड़ जमीन
को बेंचकर वाड्रा ने सिर्फ
पैंसठ दिन में करोड़ों कमाए
उस जमीन का लैंड यूज हुड्डा
के आदेश से बदला गया था.




डीएलएफ-वाड्रा डील को लेकर ये
सवाल लगातार उठ रहे हैं कि
क्या हरियाणा की कांग्रेस
सरकार वाड्रा को बचा रही है,
अभी ये सवाल बरकार है इसी बीच
नया खुलासा हुआ है.




हिंदुस्तान टाइम्स के
मुताबिक गुड़गांव की जिस
साढ़े तीन एकड़ की जमीन को
बेंचकर वाड्रा ने सिर्फ
पैंसठ दिन में करीब पचास
करोड़ रुपये कमाए उस जमीन को
रेजिडेंशियल से कमर्शियल
मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह
हुड्डा के आदेश से किया गया
था.




हिंदुस्तान टाइम्स का दावा
है कि वो दस्तावेज मौजूद हैं
जिसमें हुड्डा के उस वक्त के
एडिशनल प्रिंसिपल
सेक्रेट्री छतर सिंह ने लिखा
है कि ये केस कमर्शियल विकास
के लिए जरूरी सभी शर्तों का
पालन करता है. मुख्यमंत्री ने
कमर्शियल करने के प्रस्ताव
को मंजूरी दे दी है.




रॉबर्ट वाड्रा ने 12 फरवरी 2008
में साढ़े सात करोड़ रुपए में
रेजिडेंशियन जमीन खरीदी थी
जिसे 21 मार्च 2008 को इस जमीन का
लैंड यूज बदल दिया गया.

इस
पूरे विवाद पर गुड़गांव के
डिप्टी कमिश्नर पीसी मीना का
पक्ष


पीसी मीना ने कहा
कि यह बिक्री चार साल में हुई
थी न कि 65 दिनों में जैसा कि
खबरों में कहा जा रहा है.

2008
में 45 लाख रुपये में प्लॉट का
रजिस्ट्रेशन किया गया.
(सर्किल रेट के अनुसार यह फीस
10 लाख रुपये होनी चाहिए थी.
खरीदने वाले ने सर्किल रेट से
ज्यादा भुगतान किया.)

2012
में डीएलएफ ने 2.90 करोड़ की
ड्यूटी चुका कर इस जमीन को
रजिसेटर कराया. (सर्कल रेट के
हिसाब से ये फीस करीब 25 लाख
रुपये होनी चाहिए थी. खरीददार
ने सर्कल रेट से अधिक का
भुगतान किया.)
 
इन दोनों
ही केसों में सरकार का कोई
नुकसान नहीं हुआ जैसा की
खबरों में दिखाया जा रहा है.


असिस्टेंट कोनसोलिडेशन
अधिकारियों को म्यूटेशन के
लिए अधिकृत किया हुआ है,
हरियाणा सरकार के 1989 के ऑर्डर
के अनुसार. शिकोहपुर गांव में
150 से अधिक म्यूटेशन स्वीकृत
किए गए.

डीएलएफ का पक्ष


2008
में वाड्रा ने डीएलएफ से 3.5
एकड जमीन का सौदा किया.
डीएलएफ जमीन खरीदने के लिए
तैयार हो गया.

जून 2008 में
डीएलएप ने पांच करोड़ का
एडवांस दिया. दिसंबर 2008 में दस
करोड़ रुपये दिए गए. दिसंबर 2009
में 35 करोड़ रुपये दिए गए.
स्टांप ड्यूटी के बतौर आठ
करोड़ और चार करोड़ रुपये
चुकाए गए. इसके बाद प्रॉपर्टी
मार्केट में गिरावट आई.

अगस्त
2012 में डीएलएफ ने आठ करोड़
रुपये चुकाए और प्लॉट का
रजिस्ट्रेशन करा लिया.

आईएएस
अशोक खेमका का पक्ष


राबर्ट
वाड्रा ने 3.5 एकड का प्लॉट
राबर्ट वाड्रा ने 7.5 करोड़ में
खरीदा. 45 लाख रुपये स्टांप
ड्यूटी और रजिस्ट्री में
चुकाए गए.

लैंड यूज़
बदलने से जमीन के दाम बढ़ गए
थे और वो 58 करोड़ की हो गई थी.
खेमका ने कहा था कि अगर लैंड
यूज़ बदलने से जमीन के दाम
बढ़े तो वो पैसा गुडगांव
अथॉरिटी को मिलने की बजाय
वाड्रा को क्यों मिला.




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