आडवाणी के इस्तीफे को लेकर बीजेपी में कोहराम

By: | Last Updated: Tuesday, 11 June 2013 12:21 AM
आडवाणी के इस्तीफे को लेकर बीजेपी में कोहराम

नई दिल्ली: गोवा में
बीजेपी की राष्ट्रीय
कार्यकारिणी की बैठक के
समापन के ठीक एक दिन बाद
सोमवार को पार्टी के कद्दावर
नेता लालकृष्ण आडवाणी के सभी
पदों से इस्तीफा देने के बाद
पार्टी में कोहराम मच गया.

गुजरात के मुख्यमंत्री
नरेंद्र मोदी के उन्नयन
विरोधी आडवाणी ने आरोप लगाया
है कि पार्टी के अधिकांश नेता
सिर्फ अपने निजी एजेंडे को
तरजीह दे रहे हैं.

गोवा में बीजेपी की
राष्ट्रीय कार्यकारिणी की
बैठक के आखिरी दिन रविवार को
आम चुनाव के लिए बीजेपी की
प्रचार समिति के अध्यक्ष के
रूप में नरेंद्र मोदी को
नियुक्त किया गया था.

आडवाणी का अप्रत्याशित
फैसला यदि नहीं बदलता है तो
इसका सीधा सा मतलब मोदी को 2014
के आम चुनाव में
प्रधानमंत्री पद का
प्रत्याशी के रूप में मंजूरी
प्रदान किया जाना होगा. शाम
तक चले घटनाक्रम में बीजेपी
के वरिष्ठ नेता आडवाणी को
मनाने के लिए उनके आवास पर
जमे रहे.

पार्टी के भीतर फूट
सार्वजनिक होने से घबराई
बीजेपी ने आनन फानन में अपनी
संसदीय बोर्ड की बैठक बुलाई.
संसदीय बोर्ड पार्टी की तीन
शीर्ष निकायों में से एक है.
दो अन्य निकाय राष्ट्रीय
कार्यकारिणी और चुनाव समिति
हैं.

गुजरात से मोदी ने
आडवाणी से अपना इस्तीफा वापस
लेने का आग्रह किया और अपने
नेता से पार्टी के लाखों
कार्यकर्ताओं को निराश नहीं
करने की अपील की.

1980 के दशक
में बीजेपी के गठन से लेकर
इसे राजनीतिक रूप से सबल
बनाने वाले और पार्टी को धुर
हिंदूवादी विचारधारा देने
वाले आडवाणी मोदी का उन्नयन
करने से रोकने में कामयाब
नहीं हो सके. अपना विरोध
जताने के लिए उन्होंने
राष्ट्रीय कार्यकारिणी,
संसदीय बोर्ड और चुनाव समिति
से ही इस्तीफा दे दिया.

आडवाणी
ने पार्टी अध्यक्ष राजनाथ
सिंह को एक नाराजगी भरा पत्र
लिखा है. तीन पैरे के पत्र में
मोदी का कहीं भी जिक्र नहीं
है, लेकिन इसके स्वर से
स्पष्ट है कि पार्टी की गोवा
बैठक में रविवार को मोदी का
कद बढ़ाए जाने से ही इस्तीफा
जुड़ा हुआ है.

आडवाणी ने
कहा है, “कुछ समय से मैं पार्टी
के मौजूदा कामकाज से और जिस
दिशा में पार्टी जा रही है,
उससे तालमेल बिठाने में
कठिनाई महसूस कर रहा हूं.”

आडवाणी
ने कहा है कि अब “किसी के मन
में यह भावना नहीं रह गई है कि
यह वही आदर्शवादी पार्टी है,
जिसे श्यामा प्रसाद मुखर्जी,
पंडित दीनदयाल उपाध्याय,
नानाजी देशमुख और अटल बिहारी
वाजपेयी ने खड़ा किया था,
जिनकी एक मात्र चिंता देश और
देश की जनता को लेकर थी.”

आडवाणी
ने पत्र में लिखा है, “हमारे
अधिकांश नेता अब मात्र अपने
निजी एजेंडे को लेकर चिंतित
हैं.” इस तरह आडवाणी ने बीजेपी
नेताओं की अबतक सबसे कड़ी
आलोचना की है, और इससे पार्टी
का आंतरिक कलह खुलकर बाहर आ
गया है.

आडवाणी ने आगे
लिखा है, “इसलिए मैंने पार्टी
के तीन प्रमुख पदों –
राष्ट्रीय कार्यकारिणी,
संसदीय बोर्ड और चुनाव समिति
से इस्तीफा देने का निर्णय
लिया है. इसे मेरा त्यागपत्र
समझा जा सकता है.” आडवाणी अब
सिर्फ बीजेपी के सदस्य भर रह
गए हैं.

आडवाणी के
इस्तीफे से बीजेपी सन्न रह गई
है. अधिकांश नेता, जो सोमवार
सुबह तक मोदी के उन्नयन के
खुमार में थे, उन्होंने शुरू
में इस पर कोई प्रतिक्रिया
देने से इंकार कर दिया.

बीजेपी
की वैचारिक रूप से अभिभावक
संस्था, राष्ट्रीय
स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने इस
घटना को अत्यंत
दुर्भाग्यपूर्ण बताया.

इस्तीफा
मिलने के एक घंटे के अंदर
बीजेपी ने कहा कि आडवाणी को
मनाने की कोशिश की जाएगी.
राजनाथ सिंह ने ट्वीट किया कि
उन्होंने आडवाणी का इस्तीफा
स्वीकार नहीं किया है.

राजग
के घटक दल, जनता दल-यूनाइटेड
(जदयू) के अध्यक्ष शरद यादव ने
कहा, “यह दुखद है.. यह राजग के
लिए अच्छा नहीं है.”

गोवा
से बीजेपी सांसद श्रीपद नाइक
ने कहा, “यह वाकई में
दुर्भाग्यपूर्ण है.” बीजेपी
नेता सुषमा स्वराज ने कहा कि
पार्टी को भरोसा है कि वह
आडवाणी को इस्तीफा वापस लेने
के लिए कह सकती है.

बीजेपी
में छिड़े गृहयुद्ध से
कांग्रेस खुश नजर आई.
कांग्रेस महासचिव जनार्दन
द्विवेदी ने कहा, “इस पर
बीजेपी को सोचना है. संबंधित
व्यक्ति को सोचना है. हमने
पहले ही कहा था कि इसके (मोदी
का उन्नयन) अपने नतीजे होंगे.”

आडवाणी
1947 में आरएसएस से जुड़े और जब
1951 में जनसंघ की स्थापना हुई
तो उससे भी जुड़ गए. 1986 में
उन्होंने बीजेपी के अध्यक्ष
पद की कमान तब संभाली थी जब
लोकसभा में इसके मात्र दो
सांसद थे.

अध्यक्ष बनने
के तत्काल बाद आडवाणी राम
मंदिर आंदोलन के प्रबल
समर्थक बन गए. इसी आंदोलन ने
बीजेपी को आगे बढ़ने में मदद
की और इसके बाद यह एक बड़ी
पार्टी के रूप में उभरी.

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