आतंकी अजमल आमिर कसाब का पूरा कबूलनामा

By: | Last Updated: Wednesday, 21 November 2012 1:31 AM
आतंकी अजमल आमिर कसाब का पूरा कबूलनामा

नई
दिल्‍ली:
मैंने फरीदकोट के
एक गांव के सरकारी स्‍कूल से
चौथी क्‍लास तक पढ़ाई की थी.
स्‍कूल छोड़ने के बाद मैं
लाहौर आ गया. मेरा भाई अफजल
लाहौर की यादगार मीनार के पास
तोहित अबाद की गली नं. 54, रोड
नं. 12 में रहता था.

मैंने 2005 तक अलग-अलग जगहों पर
मजूदरी की. इस दौरान मैं अपने
गृह नगर जाया करता रहता था.
साल 2005 में पिता से मेरा झगड़ा
हो गया. इसके बाद मैंने घर
छोड़ दिया और मैं लाहौर के
अली हजवेरी दरबार चला गया.

यह
वह जगह थी जहां घर से भागे हुए
लड़कों को पनाह दी जाती थी.
यहां से लड़कों को रोजगार के
लिए अलग-अलग जगहों पर भेजा
जाता था. जब मैं वहां था तो एक
दिन मेरे पास शफीक नाम का
लड़का आया और मुझे अपने साथ
ले गया. वह कैटरिंग का धंधा
करता था. वह झेलम से था. मैं
दिहाड़ी पर उसके साथ काम करने
लगा. मुझे हर रोज 120 रुपये
मिलते थे. कुछ दिनों बाद मेरी
तनख्‍वाह बढ़कर 200 रुपये
रोजाना हो गई. मैंने उसके साथ
2007 तक काम किया.

जब मैं शफीक
के साथ काम कर रहा था तब मैं 22
साल के मुजफ्फर लाल खान के
संपर्क में आया. वह
पाकिस्‍तान के सरहद राज्‍य
के अटक जिले का रहने वाला था.
चूंकि हमें ज्‍यादा पैसे
नहीं मिल पा रहे थे इसलिए
हमने चोरी-डकैती शुरू कर दी
और नौकरी छोड़ दी. इसके बाद हम
रावलपिंडी चले गए. हमने यहां
की बंगश कॉलोनी में एक फ्लैट
किराए पर लिया और उसमें रहने
लगे. मुजफ्फर लाल ने ऐसी जगह
पर घर लिया था जहां से हमें
ढेर सारे पैसे मिल सकते थे.

मुजफ्फर
लाल ने उस पूरे इलाके का
सर्वे कर एक मैप भी तैयार
किया था. हमें अपने मकसद के
लिए कुछ बंदूकों की जरूरत थी.
मुजफ्फर लाल ने मुझे बताया कि
वो अपने गृह नगर से कुछ
हथियार ला सकता है, लकिन ये
काम काफी जोखिम भरा था
क्‍योंकि वहां सघन जांच होती
थी.

जब हम बंदूकों की तलाश
में थे तभी हमने बकरी-ईद के
मौके पर रावलपिंडी के राजा
बाजार में लश्‍कर-ए-तैयबा के
काउंटर देखे. हमने सोचा कि
अगर हमें हथियार मिल भी जाते
हैं तो भी हम उनको चला नहीं
पाएंगे. इसलिए हमने लश्‍कर
में शामिल होने का फैसला
किया.

जानकारी लेने के बाद
हम लश्‍कर के दफ्तर में
पहुंचे. वहां हमने एक शख्‍स
से मुलाकात की और उसे बताया
कि हम लश्‍कर में शामिल होना
चाहते हैं. उसने हमसे थोड़ी
पूछताछ की और हमारा नाम और
पता लिखकर अगले दिन बुलाया.

अगले
दिन उसी शख्‍स ने हमें 200
रुपये और कुछ रसीदें दी. इसके
बाद उसने हमें मरक़स तैयबा
मुरीदके नाम की एक जगह का पता
दिया और वहां जाने के लिए कहा.
यही वह जगह थी जहां लश्‍कर का
ट्रेनिंग कैंप चल रहा था. हम
बस से उस जगह पर पहुंचे. हमने
वहां पहुंचकर गेट पर रसीदें
दिखाईं और हमें अंदर जाने
दिया गया. शुरुआत में हमारा
चयन दौरा-ए-सफा नाम की 21 दिन की
ट्रेनिंग के लिए किया गया.

इसके
बाद अगले कैंप में भेजे जाने
के लिए हमें चुना गया पर उससे
पहले दो महीने की खिदमत के
लिए हमें भेजा गया. इस दो
महीने की खिदमत के बाद मुझे
मेरे मां-बाप से मिलने की
इजाजत दी गई. मैं एक महीने
अपने मां-बाप के साथ रहा. फिर
अगले कैंप के लिए मुझे
मुजफ्फराबाद के साइलवैनाला
भेजा गया. यहां मेरी फोटो
खींची गई और कुछ फॉर्म भरवाए
गए. इसके बाद ट्रेनिंग के लिए
चेलाबंदी पहाड़ी में ले जाया
गया. ये ट्रेनिंग लश्‍कर की
भाषा में दौर-ए-खास कहलाती है.
ये तीन महीने की ट्रेनिंग थी
यहां पर हमें बड़े हथियारों
को चलाने की ट्रेनिंग दी गई,
जिसमें ग्रेनेड, रॉकेट
लॉन्‍चर और मोर्टार शामिल थे.

रोजाना तकरीबन 10 घंटे की
ट्रेनिंग के लिए अब हमारा
उस्‍ताद केवल एक था, जिसका
नाम अबू माविया था. यहीं पर
जकी-उर-रहमान उर्फ चाचा ने एक
खास ऑपरेशन के लिए 32 में से 16
लोगों को चुना था. इनमें से
तीन कैंप से भाग गए थे, जिसके
बाद चाचा ने बाकी 13 को काफा
नाम के शख्‍स के पास मुरिदके
कैंप में भेज दिया था. यहां पर
हमें तैराकी और मछुआरों के
तौर-तरीके सिखाए गए, जिसका
मकसद समुद्री मुश्किलों के
खिलाफ तैयार करना था. यहां
रहते हुए हमने तेज समुद्री
नावों पर दौरे किए.

हमें
बताया गया कि
हिन्‍दुस्‍तानी मुसलमानों
पर अत्‍याचार होता है. हमें
भारतीय सुरक्षा एजेंसियों
की भी जानकारी दी गई. इसके बाद
हमें अपने घर जाने की इजाजत
दी गई. मैं सात दिनों के लिए
अपने घर गया. मैं वहीं से
मुजफ्फराबाद के लश्‍कर के
कैंप में लौटा. यहां से हमें
जकी-उर-रहमान ने काफा की
सरपरस्‍ती में मुरदिके भेज
दिया. यहां फिर एक महीने की
ऐसी ट्रेनिंग के लिए भेजा
जिसमें सब कुछ समुद्र और उसकी
तकलीफों और उनके खिलाफ
तैयारी से जुड़ा था. यहीं
हमें पहली बार भारती खुफिया
एजेंसी रॉ के बारे में बताया
गया और सिक्‍युरिटी एजेंसी
से निपटने के तरीके सिखाए गए.
साथ ही हमें खास हिदायत दी गई
थी कि हिन्‍दुस्‍तान
पहुंचने के बाद पाकिस्‍तान
फोन न करें. यहीं हमारे गुट भी
बना दिए गए थे और कोड नेम दिया
गया था. मेरा कोड नेम अबू
मुजाहिद था. बाकी की टोलियों
में शामिल लोगों के कोड नाम
हैं अबू इस्‍माइल, अब्‍दुल
रहमान बड़ा, अबू अली सोहेब,
अबू ओमेर, अबू उमर, अबू अकाशा,
अब्‍दुल रहमान छोटा और अबू
फरहद. 

एक महीने की मरीन
ट्रेनिंग के बाद जकी-उर-रहमान
ने 13 लोगों में से 10 को चुना और
फिर उनकी पांच टीमें बनाई.
मेरी टीम में इस्‍माइल था और
हमारा टारगेट वीटी स्‍टेशन
था. गूगल अर्थ नक्‍शे पर हमें
वीटी स्‍टेशन की लोकेशन
दिखाई गई. फिर स्‍टेशन की कुछ
तस्‍वीरें और वीडियो दिखाए
गए. साथ ही आजाद मैदान की
तस्‍वीरें भी दिखाईं गईं और
हमें कहां उतरना है यह भी
बताया गया. हमें सुबह 7:00 से 11:00
या फिर शाम के 7:00 से 11:00 के बीच
भीड़ पर हमला करने, कुछ लोगों
को बंधक बना किसी ऊंची इमारत
की छत पर चढ़ जाने की हिदायत
दी गई थी. जहां जकी-उर-रहमान
हमें फोन पर भारतीय मीडिया के
नंबर देता और हम उनके जरिए
अपनी मांग सामने लाते.
जकी-उर-रहमान मांगे बताता. 27
सितंबर 2008 का दिन हमले के लिए
तया हुआ, लेकिन प्‍लान टल गया.

हमें कराची में रोका गया
और फिर मरीन ट्रेनिंग दी गई. 23
नवंबर 2008 को हम यहां से
जकी-उर-रहमान उर्फ चाचा और
काफा के साथ चले. हम एजाजाबाद
के करेही समुद्र तट पर
पहुंचे. सुबह करीब 4:15 बजे हम
यहां से नावों के जरिए चले.
फिर 25 से 30 किलोमीटर का सफर तय
कर एक बड़ी नाव पर बैठे. फिर उस
नांव पर एक घंटे के सफर के बाद
अल-हुसैनी जहाज पर पहुंचे.
यहीं पर मुझे एक झोला दिया
गया, जिसमें आठ ग्रेनेड, एक
एके-47 रायफल, 200 कारतूस, दो
मैगजनी और एक सेलफोन था. सभी
लोगों को ऐसा ही झोला दिया
गया था. फिर हम भारतीय तट की ओर
चले.

भारतीय सीमा पर हमने
एक हिन्‍दुस्‍तानी जहाज
कुबेर का अपहरण कर लिया. उस
नाव के बाकी आदमी अल-हुसैनी
में डाल दिए गए और एक नाविक को
बंदूक की नोंक पर रख के आगे
बढ़े. तीन दिन चलने के बाद हम
मुंबई के करीब पहुंचे. यहां
मेरे साथी इस्‍माइल और दूसरी
टीम के अब्‍दुल्‍ला ने नाविक
को कुबेर के निचले हिस्‍से
में मार डाला. फिर हम छोटी
नावों में सवार हुए. पहले से
तय प्‍लान के मुताबिक हम
बुधवार पार्क दिघी पर पहुंचे.
फिर मैं और इस्‍माइल वहां से
टैक्‍सी लेकर वीटी स्‍टेशन
पहुंचे.

स्‍टेशन के कॉमन
बाथरूम में हमने औजार निकाले.
उन्‍हें तैयार किया और हम
पैसेंजर की तरफ बढ़ ही रहे थे
कि एक पुलिसवाला हमारे सामने
आ गया. वो हम पर फायरिंग करने
लगा. हमने उस पर ग्रेनेड
फेंका और फायरिंग शुरू कर दी.
पुलिसवालों के बाद
मुसाफिरों को मारा और
स्‍टेशन से बाहर आ गए.

अब
हम एक ऐसी इमारत खोज रहे थे
जिसकी छत पर लोगों को बंधक
बना सकें. एक इमारत की तीसरी
या चौथी मंजिल तक हम चढ़ भी गए
थे. पर बाद में पता चला कि वो
अस्‍पताल है. हम अस्‍पताल से
बाहर निकलने लगे तो पुलिस ने
हम पर फायरिंग की. हमने उन पर
कुछ ग्रेनेड फेंके और फिर हम
आगे बढ़े. हमें एक पुलिस की
गाड़ी आते दिखी और हम
झाड़‍ियों में छिप गए. हम
झाड़ि‍यों में छिपे हुए थे
तभी हमारे सामने से पुलिस की
एक और गाड़ी निकली. वो कुछ दूर
जाकर रुक गई. उससे एक
पुलिसवाला उतरा और उसने हम पर
फायरिंग शुरू कर दी. उसी
दौरान एक गोली मेरे हाथ में
लगी और मेरी रायफल गिर गई. मैं
उसे उठाने के लिए झुका तभी
दूसरी गोली उसी हाथ में लगी.
मैं बेकार हो गया तो इस्‍माइल
ने उस गाड़ी पर ताबड़तोड़
फायरिंग की.

कुछ देर बाद
गाड़ी से फायरिंग रुक गई.
हमने थोड़ी देर इंतजार किया
तब इस्‍माइल और मैं गाड़ी की
ओर बढ़े. इस्‍माइल ने गाड़ी
से तीन लाशों को बाहर फेंककर
स्‍टेयरिंग संभाला और मैं
आगे की तरफ बगल में बैठ गया.
हमने गाड़ी भगाई. पुलिसवालों
ने इस दौरान हम पर फायरिंग कर
रोकना चाहा. इस्‍माइल ने उन
पर फायर किया. फिर एक बड़े
मैदान के बगल में हमारी गाड़ी
का टायर पंचर हो गया. इसके बाद
इस्‍माइल ने बंदूक की नोंक पर
एक कार अगवा की और उस पर सवार
तीन औरतों को निकाल फेंका.

हम
इस कार पर जा रहे थे कि पुलिस
ने समुद्री किनारे के पास
हमारी गाड़ी रोकी. इस्‍माइल
ने उन पर फायरिंग की और पुलिस
ने हम पर फायर किया. इस्‍माइल
इसमें घायल हो गया. तब
पुलिसवाले हम दोनों को
अस्‍पताल ले गए और वहीं मुझे
पता चला कि इस्‍माइल मर गया. 

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