'आप' की सोनी ने मोदी से सोनिया तक को किया परेशान

By: | Last Updated: Saturday, 5 April 2014 7:50 AM

दिल्ली: छत्तीसगढ़ की राजनीति में अहम स्थान रखने वाला और अंतररास्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुका बस्तर के सियासी गलियारो में इन दिनों आम आदमी पार्टी कि चर्चा हर ज़ुबान पर सुनाई दे रही है. इस चर्चा के पीछे कि वजह अरविन्द केजरीवाल नहीं बल्कि बस्तर से आम आदमी पार्टी कि प्रत्यासी सोनी सोरी हैं.

 

सोनी सोरी के लिए देश-विदेश के करीब 120 सामाजिक संगठन इन दिनों बस्तर के अलग-अलग क्षेत्रों में जाकर प्रचार कर रहे हैं तो वहीँ रास्ट्रीय और अंतररास्ट्रीय मीडिया भी इस पूरे मुहीम को कवर कर रहा है. एबीपी न्यूज़ पहुंचा बस्तर के उन नक्सल प्रभावित छेत्रों में जहाँ गाँव-गाँव में सोनी सोरी के साथ प्रचार कर रहे हैं स्वामी अग्निवेश.

 

आम आदमी पार्टी ने बस्तर लोकसभा सीट से सोनी सोरी को अपना प्रत्यासी बनाया है. सोनी सोरी नक्सलियों को मदद पहुचाने के आरोप में ढाई साल तक जेल में रह चुकीं हैं. देश कि प्रमुख राजनैतिक पार्टियां बीजेपी और कांग्रेस सोनी सोरी को लेकर हमेशा अरविन्द केजरीवाल और और आम आदमी पार्टी पर नक्सल विचारधारा को समर्थन करने का आरोप लगाते रहे हैं. हालांकि सुप्रीम कोर्ट से सोनी सोरी बरी हो चुकी हैं, लेकिन आरोप अब तक पीछा नहीं छोड़ रहे हैं.

 

अब स्वामी अग्निवेश का सोनी सोरी के साथ रोड शो करना बस्तर के चुनावी माहौल को एक बार फिर गर्म कर दिया है. स्वामी अग्निवेश नक्सल मामले में हर दम पुलिस और रमन सरकार पर हमला बोलते रहे हैं. अग्निवेश पर भी नक्सल समर्थक होने के आरोप लगते रहे हैं. अग्निवेश अति संवेदनशील दंतेवाड़ा जिले के ऐसे गाँव में जाकर सोनी सोरी के लिए प्रचार कर रहे हैं जहाँ कांग्रेस और बीजेपी के उम्मीदवार बिना सुरक्षा जाने का सोच भी नहीं सकते. 

 

स्वामी अग्निवेश का कहना है कि वो आम आदमी पार्टी से न तो जुड़े हैं और न ही आम आदमी पार्टी के सदस्य हैं लेकिन सोनी सोरी का प्रचार वो इसलिए कर रहे हैं क्यूंकि सोनी सोरी के साथ अत्याचार हुआ है. उनका यह भी कहना है कि राज्य और केंद्र सरकार नक्सल समस्या को कभी ख़त्म ही नहीं करना चाहती. इसलिए ये समस्या बरकरार है. सोनी सोरी के आने से बदलाव होगा इसलिए वो लोगों से वोट डालने कि अपील कर रहे हैं. अग्निवेश सोनी सोरी के ऊपर लगे आरोपों को भी झूठ बतातो हैं.

 

आम आदमी पार्टी कि प्रत्यासी सोनी सोरी भी शहरी इलाका छोड़ के जंगलों में ज्यादा प्रचार-प्रसार कर रही हैं. उनका कहना है कि शहर में तो सभी पार्टियां जाती हैं गाँव के लोगों कि समस्या सुनना ज्यादा ज़रूरी है इसलिए वो गाँव को ज़्यादा फोकस कर रही हैं. सोनी सोरी जल, जंगल, ज़मीन कि बात अपने घोषणा पत्र में शामिल करने कि बात करती हैं. नक्सली भी हमेशा जल, जंगल, ज़मीन और आदिवासियों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ आवाज़ उठाते रहे हैं.

 

नक्सलियों कि हमेशा यह मांग रही है कि जेल में बंद आदिवासियों पर सरकार झूठे आरोप लगाती है. इतना ही नहीं उन्हें नक्सली बनाकर उनके साथ अत्याचार करती है. सोनी सोरी भी कहती हैं कि उनके साथ जेल में जिस तरह अत्याचार हुआ है वो अब अपने आदिवासी भाई-बहनों के साथ नहीं होने देंगी. नक्सलियों और सोनी सोरी कि विचारधारा में इतनी समानता होना भी सोनी सोरी के नक्सल समर्थक होने के आरोपों को बल देता है.

 

नक्सली समर्थक होने के आरोप लगने के जवाब में उनका कहना है कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल चुकी है इसलिए अब इस बात का जवाब रमन सरकार को देना होगा कि उन्हें ढाई सालों तक जेल में क्यूँ रहना पड़ा. सोनी सोरी के लिए देश-विदेश के करीब 120 सामाजिक संगठन इन दिनों बस्तर के अलग-अलग छेत्रों में जा-जाकर वोट मांग रहे हैं.  इन्हे कवर करने के लिए अंतररास्ट्रीय मीडिया भी बस्तर के जंगलों में डेरा जमाये हुए है.

 

जो लोग सोनी सोरी के लिए काम कर रहे हैं उनका कहना है कि सोनी सोरी के साथ जिस तरह से अत्याचार हुआ और वो उसके बाद भी हार नहीं मानी और आदिवासियों के हित कि बात करती रहीं हैं. इसलिए वो सोनी सोरी का समर्थन करते हैं. विदेशी सामाजिक संगठन ज्यादातर जंगलों में ही घूमते हैं और वहीँ प्रचार करते हैं. सोनी सोरी को बीजेपी लोकसभा के इस चुनाव में कोई चुनौती नहीं मानती.

 

बीजेपी का यह आरोप है कि वो नक्सल समर्थक हैं इसलिए उनसे बीजेपी का कोई मुक़ाबला नहीं है. बस्तर से बीजेपी सांसद दिनेश कश्यप का कहना है कि सोनी सोरी भले ही सुप्रीम कोर्ट से छूट चुकी हों लेकिन उन्हें आज भो लोग नक्सल समर्थक के तौर पर लोग जानते हैं. इसलिए उनसे बीजेपी का कोई मुक़ाबला नहीं है. आपको बता दें कि कांग्रेस ने बस्तर से महेंद्र कर्मा के बेटे दीपक कर्मा को और बीजेपी ने दिनेश कश्यप को अपना लोकसभा उम्मीदवार बनाया है.

 

लोकसभा चुनाव में बस्तर से किस पार्टी कि जीत होती है यह तो लोकसभा के परिणाम ही बताएँगे, लेकिन सोनी सोरी ने जिस तरह से प्रचार-प्रसार करना शुरू किया है और उन्हें बाहर से जैसा समर्थन मिल रहा है वह बीजेपी और कांग्रेस के लिए चिंता का सबब ज़रूर बन गया है. नक्सल प्रभावित छेत्रों के आदिवासी नक्सलियों के डर से वोट डालने नहीं जाते हैं. यदि इस बार के चुनाव में गाँव वाले वोट डालने में सफल होते हैं, तो परिणाम अप्रत्याशित हो सकते हैं.

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