एक गांव जहां मंदिर तोड़ दिए गए और मुर्तियां नदी में बहा दी गयीं

By: | Last Updated: Thursday, 20 February 2014 3:36 AM

रायपुर: छत्तीसगढ़ के दुर्ग और राजनांदगांव जिले की सीमा पर स्थित है एक गांव कसही. दुर्ग जिला अंतर्गत गुंडरदेही ब्लॉक के इस गांव में लगभग 70 परिवार के 400 लोग रहते हैं. इस आबाद गांव में न तो कोई मंदिर है और न ही शराब की कोई दुकान है. ग्रामीणों के मुताबिक गांव वाले मांसाहार से भी कोसों दूर हैं. गांव में मुर्गियां और बकरियां पालना भी कोई मुनासिब नहीं समझता. गांव में हर धर्म को मानने वाला ग्रामीण, संत कबीर को मानता है. गांव में एक मात्र प्रतीकात्मक मठ मंदिर संत कबीर का है.

 

ग्रामीणों के मुताबिक इसके पीछे भी एक किंवदंती है. गांव के मोतीराम साहू और नंदू निषाद बताते हैं कि 95 साल पहले गांव के मुखिया अंजोरदास की चार संतानें थीं. उनकी एक-एक कर मृत्यु हो गई. गांव के मुखिया ने अपनी आखिरी संतान पुत्री की सुरक्षा के लिए शीतला मंदिर में जाकर खूब मन्नत मांगी, पर कुछ दिन बाद वह भी चल बसी. बताते हैं कि पुत्री की मौत के बाद मुखिया अंजोरदास ने गांव के देवी-देवताओं की मूर्तियां खरखरा नदी में बहा दी. मंदिर भी तोड़ दिए. तब से आज तक गांव में देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना नहीं होती. गांव वाले केवल संत कबीरदास को ही पूजते हैं.

 

जब पूरे गांव वाले कबीर के अनुयायी हुए तो मुनादी कराई गई कि कोई भी मुर्गियां और बकरियां नहीं पालेगा. बीते 50 सालों से कसही में कोई भी मुर्गी और बकरी नहीं पालता. गांव में 90 फीसदी साहू समाज के लोग हैं तो 8 फीसदी मानिकपुरी भी रहते हैं. संत कबीर दास का महोत्सव और सत्संग साल में कई बार होता है. साल में एक बार कबीर जयंती धूम धाम से मनाई जाती है. इसमें पूरा गांव शामिल होता है. खर्च गांव के लोग ही उठाते हैं. इसे भी संत कबीर के नाम की खेती करके जुटाते हैं. गांव के मुखिया ने डेढ़ एकड़ जमीन दान में दी थी. इसमें खेती होती है, फसल उत्पादन में से कुछ बेचते हैं और कुछ भंडार में रहता है.

 

बताया जाता है कि हर साल बारिश से गांव में बाढ़ आती है. गांव नदी और नाले से घिरा हुआ है. बारिश के दिनों में गांव टापू बन जाता है. प्रशासन से कहा गया लेकिन अभी तक किसी ने इस ओर ध्यान भी नहीं दिया. गांव के सरपंच उत्तम साहू ने बताया कि हर साल बारिश में परेशानी होती है. नदी का कटाव भी धीरे-धीरे बढ़ रहा है. जो गांव के लिए सबसे बड़ा खतरा है. उन्होंने बताया कि इस ओर अगर जल्द ही ध्यान नहीं दिया गया, तो भविष्य में दिक्कतें और भी ज्यादा बढ़ जाएगी.

 

ग्रामीण दीपावली में मातर भी नहीं मनाते. वहीं दोनों नवरात्रि में यहां देवी की पूजा भी नहीं होती है. गांव के बीएल साहू, लोकेश साहू, यादुराम साहू ने बताया कि यहां दोनों नवरात्रि में कोई देवी की पूजा नहीं होती है. यहां तक क्वार नवरात्रि में दुर्गा और सरस्वती स्थापना भी नहीं होती. 15 साल पहले गांव में दिवाली के अवसर पर मातर मनाने की परंपरा शुरू की गई थी. मातर के अगले दिन ही यादव परिवार से 1 महिला की मौत हो गई. तब से इसे भी बंद कर दिया गया. अब हर साल कबीर जयंती के अवसर पर गौठान में चौका आरती होती है.

 

कुछ साल पहले गांव के बंदू साहू ने शिवलिंग की स्थापना कराने की कोशिश की. इसे लेकर गांव में विवाद भी हुआ. ग्रामीणों की आपत्ति के बाद खरखरा नदी किनारे बंदू ने शिवलिंग की स्थापना की है.

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Web Title: एक गांव जहां मंदिर तोड़ दिए गए और मुर्तियां नदी में बहा दी गयीं
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