कठोर फैसले से आएंगे अच्छे दिन?

By: | Last Updated: Tuesday, 20 May 2014 3:25 PM
कठोर फैसले से आएंगे अच्छे दिन?

नई दिल्ली. नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं. बीजेपी का नारा था अच्छे दिन आने वाले हैं. अच्छे दिन कैसे आएंगे? जाने माने आर्थिक विशेषज्ञों की राय में अच्छे दिन तभी आ सकते हैं जब मोदी लेंगे कठोर फैसले. सवाल उठता है क्या मोदी कठोर फैसले लेंगे.

 

बीजेपी के चुनाव प्रचार का सबसे बड़ा नारा था- अच्छे दिन आने वाले हैं. बीजेपी का चाहे विज्ञापन हो या फिर नरेंद्र मोदी की जनसभाएं. हर जगह एक ही गूंज सुनाई पड़ती थी- अच्छे दिन आने वाले हैं.

 

अच्छे दिन आने का नरेंद्र मोदी ने जो नारा दिया वह सुपरहिट हुआ. अच्छे दिन की उम्मीद में मतदाताओं ने मोदी की झोली को वोटों से भर दिया. चुनाव में मिली जबदस्त जीत के बाद मोदी ने खुद कहा अच्छे दिन आ गए.

 

अच्छे दिन लाने के लिए सरकार को उठाने पड़ेंगे अहम कदम. कठोर फैसले लेने होंगे. ऐसे फैसले जिसका ताल्लुक आपके किचन में आने वाले गैस सिलिंडर से है. सब्सिडी पर चलने वाली लाखों-करोड़ों की डीजल गाड़ियों से है.

 

पर पहले ये तो समझ लें कि अच्छे दिन होते क्या हैं. अच्छे दिन होने का मतलब है बेरोजगारों को रोजगार मिले, घर का किचन चलाने में मुश्किल न हो और नौकरी करने वालों की जेब गर्म रहे.

 

नरेंद्र मोदी अच्छे दिन कैसे लाएंगे, ये समझने से पहले ये तो जान लें कि इस समय आपके बुरे दिन क्यों चल रहे हैं. पढ़े-लिखे युवाओं को नौकरी नहीं मिल रही. खाने-पीने की चीजें लगातार महंगी होती जा रही है मतलब महंगाई पर लगाम नहीं लग रही और कामकाजी लोगों की कमाई बढ़ नहीं रही है.

 

केंद्र सरकार न तो खुद बहुत ज्यादा नौकरियां दे सकतीं हैं और न ही महंगाई पर जल्दी अंकुश लगा सकती है लेकिन जानकारों की राय में सरकार कठोर कदम उठा कर ऐसा माहौल बना सकती है जिससे रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं. पर मुश्किल ये है कि केंद्र सरकार इस समय भारी घाटे में है. सरकार का वित्तीय घाटा यानी आमदनी और खर्च का अंतर करीब 6 लाख करोड़ रुपये हो गया है. इसकी वजह से कंपनियां बाजार में निवेश नहीं कर रही हैं. निवेश नहीं करने से न तो नए रोजगार पैदा हो रहे हैं और न ही आर्थिक तरक्की हो रही है.

 

सरकार के 6 लाख करोड़ रुपये के घाटे से मुश्किल क्या हो रही है? मुश्किल ये हो रही है कि जिस पैसे से उद्योग धंधे लगाए जाते, कल कारखाने खोले जाते, स्कूल और अस्पताल बनाए जाते. जिनसे युवाओं को रोजगार मिलता, उस पैसे से सरकार को अपने घाटे की भरपाई के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. सरकार को 6 लाख करोड़ का वित्तीय घाटा क्यों हो रहा है? सरकार को इतना बड़ा घाटा इसलिए है क्योंकि उसे गैस सिलिंडर, डीजल और किसानों को दिया जाने वाला खाद उसकी लागत से कम कीमत पर बेचना पड़ रहा है.       

 

सरकार का वित्तीय घाटा इस समय 5,99,299 रुपये है. सरकार रसोई गैस पर 47 हजार करोड़ रुपये, डीजल पर 51 हजार करोड़ रुपये, खाद पर 68 हजार करोड़ रुपये और खाद्य सुरक्षा पर करीब सवा लाख करोड़ रुपये सब्सिडी देती है. जानकारों का कहना है कि अगर इस सब्सिडी में सरकार कटौती कर दे तो इससे देश का वित्तीय घाटा सीधे काबू में आ जाएगा और बची हुई राशि को विकास के काम में लगाया जा सकेगा.

 

कैसे आएंगे अच्छे दिन?

 

डीजल महंगी करनी होगी

अर्थिक जानकारों की राय में डीजल पर दी जाने वाली सब्सिडी को सरकार अब और बर्दाश्त करने की हालत में नहीं है. सरकार को प्रति लीटर 6 रुपये सब्सिडी देनी पड़ती है. इस तरह सरकार को अपने खजाने से एक साल में करीब 51 हजार करोड़ सब्सिडी देनी पड़ रही है. आर्थिक विशेषज्ञों के मुताबिक अगर डीजल पर दी जाने वाली सब्सिडी को कम कर दिया जाए तो इससे वित्तीये घाटे का पाटने में मदद मिल सकती है.

 

एलपीजी का भाव बढ़ाना होगा

आपके घर में आने वाले सिलिंडर पर सरकार को अपने खजाने से अतिरिक्त पैसा चुकाना पड़ता है. सरकार इस समय प्रति सिलिंडर करीब 450 रुपये सब्सिडी देती है. इस तरह घरेलू गैस पर सरकार को सालाना करीब 47 हजार करोड़ रुपये सब्सिडी देनी पड़ती है. आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि घरेलू गैस पर मिलने वाली सब्सिडी को सख्ती से कम करने का समय आ गया है ताकि सरकार अपने घाटा को कम कर सके.

 

खाद की कीमत बढ़ानी होगी

सरकार को अपने खजाने का एक बड़ा हिस्सा खेती में काम आने वाले खाद पर खर्च करना पड़ता है. किसानों को दिये जाने वाले खाद पर सरकार को साल में करीब 68 हजार करोड़ रुपये सब्सिडी देनी पड़ती है. आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि कई राज्य ऐसे हैं जहां किसानों की आर्थिक स्थिति काफी अच्छी है सवाल उठता है कि ऐसे किसानों को और सब्सिडी क्यों मिले.

 

किराना में एफडीई का विरोध छोड़ना होगा

 

यूपीए सरकार पहले ही किराना में एफडीआई को मंजूरी दे चुकी है. पर बीजेपी शुरू से इसके विरोध में रही है. हालांकि बीजेपी ने कभी ये नहीं कहा कि सत्ता में आने के बाद वो यूपीए के फैसले को पलट देगी. जानकारों की मानें तो बीजेपी को अपना रुख साफ करना चाहिए, क्योंकि किराना में एफडीआई के आने से न सिर्फ किसानों और उपभोक्ताओं को फायदा होगा बल्कि रोदगार के अवसर भी बढ़ेंगे.

 

सरकारी कंपनियों को बेचना पड़ेगा

आर्थिक विशेषज्ञों का एक बड़ा तबका हमेशा से ये कहता रहा है कि सरकार का काम नहीं है कि वो बिजली और पेट्रोल बेचे. सार्वजनिक क्षेत्र की कई ऐसी कंपनियां हैं जो लगाता घाटे में चल रही हैं. ऐसी कंपनियों को बेच कर सरकार अपने घाटे को कम कर सकती है.

 

नरेंद्र मोदी निर्णायक नेता के रूप में खुद को पेश करते रहे हैं. मतदाताओं से भी वो निर्णायक फैसले की अपील करते रहे ताकि मजबूत सरकार निर्णायक फैसले ले सके. मोदी को चुनाव में पूर्ण बहुमत मिला है. आर्थिक विशेषज्ञों को उम्मीद है कि नरेंद्र मोदी अर्थव्यवस्था की कायापलट के लिए कठोर और निर्णायक फैसले लेंगे. 

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Web Title: कठोर फैसले से आएंगे अच्छे दिन?
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