किन्नर अब भी जीते हैं सामाजिक दाग के साये में, चुनाव से रहते हैं दूर

By: | Last Updated: Wednesday, 9 April 2014 7:02 AM

नई दिल्ली: भले ही चुनाव आयोग ने किन्नरों के उत्थान के अपने प्रयास के तहत ‘अन्य’ लिंग का विकल्प शुरू किया हो लेकिन अब इस समुदाय का कहना है कि वे अब भी सामाजिक दाग के साये में जीते हें और उन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल किया जाना बाकी है.

 

राष्ट्रीय राजधानी में 15-20 हजार किन्नर रहते हैं लेकिन उनमें से महज 839 के नाम ही मतदाता सूची हैं और वे 10 अप्रैल को लोकसभा चुनाव में वोट डाल पायेंगे.

 

किन्नर जया ने कहा, ‘‘किन्नरों की संख्या और मतदाता सूची में दर्ज उनकी संख्या के बीच काफी फासला है. यह आंकड़ा इसलिए कम है क्योंकि हम जिस सामाजिक भेदभाव से गुजरते हैं, उसकी वजह से मतदाता सूची में नाम शामिल करने में सहज नहीं महसूस करते. ’’

 

जया ने कहा, ‘‘समाज को अब भी हमें स्वीकार करने की जरूरत है. हम वास्तविकता है न कि कपोल कथा. हमें ‘हिजड़ा’ कहा जाता है और हेय दृष्टि से देखा जाता है. सरकार एवं लोग जब हमें सम्मान की नजर से देंखेंगे और स्वीकार करेंगे तब स्वैच्छिक भागीदारी बढ़ेगी. ’’ हालांकि किन्नर समुदाय के लोग चुनाव आयोग की पहल का स्वागत करते हैं और महसूस करते हैं कि अन्य विभागों एवं संगठनों को इसे मिसाल के रूप में लेना चाहिए ताकि वे एक ‘पहचान’ के साथ समाज में खुलकर सामने आ पाएं.

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Web Title: किन्नर अब भी जीते हैं सामाजिक दाग के साये में, चुनाव से रहते हैं दूर
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