केजरीवाल सीएम की कुर्सी को 'झाड़ू' क्यों मारना चाहते हैं?

By: | Last Updated: Monday, 10 February 2014 3:21 PM
केजरीवाल सीएम की कुर्सी को ‘झाड़ू’ क्यों मारना चाहते हैं?

केजरीवाल क्यों दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से कुर्बानी देना चाहते हैं. सवाल ये उठता है कि अगर कुर्बानी ही देनी थी तो फिर क्यों मुख्यमंत्री बने. केजरीवाल ने कहा है कि देश से भ्रष्टाचार मिटाने के लिए 100 बार सीएम की कुर्सी कुर्बान करने को तैयार हैं. स्वराज के लिए और सत्ता सीधे जनता के हाथ में देने के लिए 1000 बार सीएम की कुर्सी कुर्बान करने को तैयार हैं.

 

इससे यही साबित हो रहा है कि केजरीवाल से सरकार नहीं चल रही है और वो अपनी जिम्मेदारी से भागना चाहते हैं. भागना इसलिए चाहते हैं क्योंकि आगे लोकसभा का चुनाव है और मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए वो लोकसभा चुनाव का प्रचार पूरी शक्ति के साथ नहीं कर सकते हैं ना ही वो पूरी शक्ति लोकसभा का चुनाव लड़ सकते हैं.

 

जनलोकपाल बिल के बहाने वो मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी से भागने का रास्ता ढूंढ़ रहें है यही वजह है कि हर मुद्दों पर दो-दो हाथ करने को तैयार है. ऐसा प्रतीत होना है कि दिल्ली में सरकार नहीं चल रही है बल्कि मदारी का शो चल रहा है. सोमनाथ भारती के मुद्दों को वेवजह तूल देने की कोशिश की और खुद मुख्यमंत्री धरने पर बैठ गये जब समर्थन नहीं मिला तो पीछे हटने का मजबूर हुए.

 

केजरीवाल ने फिर दोहराया, सीएम की कुर्सी हजार बार कुर्बान 

 

अब मामला फंस गया है कि दिल्ली विधानसभा में जनलोकपाल बिल पेश करने को लेकर. मुख्यमंत्री इस बिल को पेश करने को लेकर अड़े हुए हैं लेकिन कानून दांवपेंच की वजह से मुख्यमंत्री की किरकिरी हो रही है और किरकिरी को कम करने के लिए मुख्यमंत्री ने कुर्बानी का पासा फेंक दिया है.

 

जनलोकपाल पर कई पेंच फंसे हैं लिहाजा केजरीवाल की राह आसान नहीं दिख रही है जबकि इस मुद्दे पर टीम केजरीवाल ने लेफ्टिनेंट गर्वनर को कांग्रेस का एजेंट बता दिया था लेकिन दूसरे दिन ही केजरीवाल की टीम ने आशुतोष के बयान से पल्ला झाड़ लिया है. केजरीवाल चाहते हैं कि उनका जनलोकपाल बिल बिना केंद्र की मंजूरी के ही विधानसभा से पास हो जाए. लेकिन ये मुमकिन होता नहीं दिख रहा है क्योंकि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं है.

 

केजरीवाल टकराहट के मूड में क्यों है?

 

केजरीवाल जनलोकपाल बिल पास कराने के लिए जो तरीका अपना रहे हैं उस पर उप राज्यपाल ने सॉलिसिटर जनरल से राय मांगी थी. इसके साथ ही ट्रांजेक्शन बिजनेस रूल के तहत किसी बिल को सदन में रखने से पहले उप राज्यपाल के पास नहीं भेजा. ट्रांजेक्शन बिजनेस रूल के तहत कोई बिल बिना उप राज्यपाल को दिखाए कैबिनेट में नहीं आ सकता. बिना उप राज्यपाल की मंजूरी के विधानसभा में भी बिल नहीं आ सकता है. जाहिर है ऐसे में केजरीवाल की मुश्किलें हल होती नहीं दिख रही है. अब सवाल ये उठता है कि केजरीवाल क्या दूसरा रास्ता नहीं निकाल सकते हैं. केजरीवाल उप राज्यपाल को बिल दिखाए दे तो क्या हर्ज है इसके बाद उप राज्यपाल ना-नुकुर करते हैं तो बात बनती है. एक संवैधानिक पद पर रहते हुए क्यों संविधान की अवहेलना करना चाहते हैं. जैसे अरविंद केजरीवाल कहते हैं कि जनलोकपाल बिल पास कराना उनकी प्राथमिकता है तो अपनी प्राथमिकता से क्यों भटक रहें हैं .

 

क्या केजरीवाल खुद पैर पर कुल्हाड़ी मार रहें हैं?

 

केजरीवाल साहसी लीडर हैं वो रिस्क भी लेते हैं. उन्होंने देश की राजनीति को दिशा और दशा देने का काम भी किया है. राजनीतिक मैराथन में कूदने से राजनीतिक गेम भी बदल गया है. देशवासियों को उनसे काफी उम्मीद है. बीजेपी और कांग्रेस में केजरीवाल फैक्टर सिर चढ़कर बोल रहा है तो फिर क्यों कुर्बान होना चाहते हैं. ये सच है कि आम आदमी पार्टी में केजरीवाल की तूती बोलती है उनके फैसले को कोई काट नहीं सकता है ये भी सही है ये रुतबा किसी राजनीतिक दल के लिए ठीक नहीं है लेकिन इसके बावजूद केजरीवाल कम ही समय में काफी लोकप्रिय नेता हो गये है. दिल्ली को छोड़कर केजरीवाल अभी प्रचार नहीं किया है लेकिन हर राज्यों में केजरीवाल की ही चर्चा हो रही है. दिनों दिन उनकी लोकप्रियता बढ़ती जा रहा है.

 

15 दिनों में 1 करोड़ लोग आम आदमी पार्टी के सदस्य बने तो फिर मुख्यमंत्री पद से इतनी बेरुखी क्यों है.

 

केजरीवाल की सरकार के अंत से ज्यादा अहम है उन उम्मीदों का अंत हो जाना जो उनसे उम्मीदें पाल कर रखे हैं. ये संदेश जाने लगा है कि वो हर बात पर हंगामा खड़ा करना चाहते हैं. अभी तक भाषणबाजी हो रही है लेकिन दिल्ली में मुफ्त में पानी और बिजली के अलावा कोई काम नहीं हुआ है. सरकारी काम कम हो रहे हैं भाषणबाजी ज्यादा हो रही है. अगर वो इस्तीफा देते हैं तो ये संदेश जा सकता है कि दिल्ली का काम पूरा तो किया नहीं तो देश का क्या काम करेंगे जो सीएम पद को छोड़कर भाग सकते हैं तो पीएम का विश्वसीनय उम्मीदवार कैसे हो सकता है. ये तमाम सवाल हैं जिसपर केजरीवाल को इस्तीफे के पहले सोचने की जरूरत है.

 

क्यों केजरीवाल को इस्तीफा नहीं देना चाहिए?

 

शायद केजरीवाल सीएम नहीं बनते तो उनपर इतनी चर्चा नहीं होती. केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनने से हर दिन और हर पल दिल्ली सरकार पर चर्चो हो रही है. इससे बिना प्रचार किए हुए बिना आम आदमी पार्टी की चर्चा हो रही है. हर शहर, गली-मुहल्ले में केजरीवाल की सरकार पर लोग चर्चा कर रहे हैं. 15 दिनों में 1 करोड़ लोग आम आदमी पार्टी के सदस्य बन चुके हैं. अगर वो इस्तीफा देते हैं तो मीडिया में शायद उतनी चर्चा नहीं होगी इससे केजरीवाल टीम को नुकसान उठाना पड़ सकता है. खैर ये केजरीवाल को ही तय करना है कि वो अपनी कुर्सी को कुर्बानी देना चाहते हैं या खुद अपनी पार्टी को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं.

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