क्या अधिकार रैली नीतीश के पीएम बनने की लड़ाई है?

By: | Last Updated: Sunday, 17 March 2013 12:09 AM

नई दिल्ली: विशेष राज्य
का दर्जा देने की मांग को
लेकर आज दिल्ली में बिहार के
सीएम नीतीश कुमार की रैली है.

रामलीला मैदान में होने वाली
रैली में सबसे बड़ा सवाल ये
है कि क्या नीतीश बिहार के
बहाने दिल्ली में पीएम की
उम्मीदवारी की दस्तक देने
वाले हैं?

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश
कुमार की दिल्ली रैली कुछ
कहती है. 17 मार्च को होने वाली
ये रैली यूं तो बिहार को
विशेष राज्य का दर्जा दिलाने
के लिए है. लेकिन इस रैली से कई
ऐसे संकेत निकल रहे जो देश
में भविष्य की राजनीति पर असर
डाल सकते हैं.

दिल्ली का रामलीला मैदान
वैसे तो कई आंदोलनों और
रैलियों का गवाह बना है लेकिन
इस मैदान पर पहली बार है जब
किसी राज्य की सरकार के
मुखिया राज्य के विकास के नाम
पर रैली कर रहे हैं. खास ये भी
है कि इस रैली में उसने एनडीए
में अपने सहयोगी और बिहार की
सत्ता में साझेदारी बीजेपी
को भी शामिल नहीं किया है.

दिल्ली में नीतीश की रैली,
सिर्फ और सिर्फ जेडीयू की है
और जिसमें सबसे बड़ा चेहरा
हैं नीतीश कुमार. हाल के
सालों में नीतीश की दिल्ली
में ये पहली राजनैतिक रैली
है.

वैसे 6 फरवरी को दिल्ली के SRCC
कॉलेज से गुजरात के
मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी
ने दिल्ली की दौड़ शुरू की थी,
मुद्दा बनाया था विकास को. अब
SRCC कॉलेज से करीब आठ किलोमीटर
दूर रामलीला मैदान में नीतीश
की रैली इस बात का ऐलान है कि
नीतीश भी दिल्ली की इस दौड़
में शामिल हैं.

नीतीश कुमार बिहार को विशेष
राज्य का दर्जा देने की मांग
पिछले एक साल से जोर-शोर से
उठा रहे हैं. इसके लिए
उन्होंने पहले पूरे राज्य की
यात्रा की और फिर पिछले साल 4
नवंबर को पटना के गांधी मैदान
में रैली भी की और अब ये मांग
दिल्ली तक वो लेकर गए हैं. इस
रैली को जेडीयू आंदोलन का नाम
देकर जनसमर्थन जुटाने की
कोशिश में है.

शुरुआत में बिहार को विशेष
राज्य के दर्जे की मांग पर
केंद्र में यूपीए के साथ उनका
टकराव भी हुआ जब योजना आयोग
ने उनकी मांग को खारिज कर
दिया. लेकिन पिछले दिनों में
केंद्र सरकार ने अपना रूख बदल
दिया है. बजट में भी नीतीश की
मांगों पर विचार करने का
संकेत वित्तमंत्री ने दिया.

रैली के फायदे 

इस रैली से नीतीश का दोहरा
फायदा है. एक तो वो बिहार में
जातिगत फैक्टर से ऊपर उठकर
वोटरों को एकजुट कर सकते हैं.
और दूसरा ये कि इस रैली से
बीजेपी को दूर रखकर वो भविष्य
का रास्ता भी खुला रखा है जो
बीजेपी के लिए एक चेतावनी से
कम नहीं है.

इस रैली में नीतीश कुमार
पिछड़े राज्यों की बात भी उठा
सकते हैँ. नीतीश की कोशिश
होगी कि विकास का पत्ता खेलते
हुए वो नए ऐसे राजनैतिक
समीकरण की तरफ बढ़ें जहां
उनका समर्थन करने वालों की एक
बड़ी तादाद हो जिसका फायदा वो
आने वाले वक्त में उठा सकें.
पिछले राज्यों के नेतृत्व
करते हुए दिखने की कोशिश इस
रैली में हो सकती है.

राजनीतिक जानकार इस रैली को
दरअसल 2014 चुनावों की रणभेरी
की तरह देख रहे हैं. ये जेडीयू
के समर्थकों में जोश जगाने का
काम करेगी और साथ ही ये रैली
दिल्ली की दौड़ के लिए पार्टी
का एंजेडा भी तय कर सकती है.

क्या कांग्रेस के लिए होगा
इशारा?

इस रैली में इस बात पर सबसे
ज्यादा नजर रहेगी कि कि नीतीश
कांग्रेस के लिए किस तरह के
शब्दों का इस्तेमाल करने
वाले हैं.

पिछले कुछ दिनों में
कांग्रेस और नीतीश दोनों एक
दूसरे की पीठ थपथपाते करते
नजर आए हैं.

ऐसे में राजनीतिक हलकों में
नीतीश और कांग्रेस के नजदीक
आने की बातें कही जा रही हैं.
लेकिन नीतीश को विशेष राज्य
का दर्जा केंद्र की यूपीए
सरकार से चाहिए जिसकी अगुवाई
कांग्रेस ही कर रही है. ऐसे
में नजर इस बात पर भी होगी कि
नीतीश की 17 मार्च की रैली में
नीतीश कांग्रेस पर कितने
हमलावर होते हैं.

कांग्रेस के साथ-साथ बीजेपी
भी इस रैली पर निगाह बनाए
रखेगी. जेडीयू ने इस रैली में
बीजेपी को शामिल नहीं किया
है. दोनों पार्टियों के बीच
मतभेद की सबसे बड़ी वजह हैं
बीजेपी नेता नरेंद्र मोदी.
नरेंद्र मोदी की दिल्ली में
पीएम बनने की संभावना को लेकर
नीतीश और जेडीयू की नराजगी
किसी से छिपी नहीं है.

17 मार्च को मुंबई में नरेंद्र
मोदी भी रैली करना चाहते थे
लेकिन खबरों के मुताबिक
नीतीश के विरोध की वजह से
मोदी की ये रैली रद्द कर दी गई.
कहा गया कि बीजेपी फिलहाल
नीतीश को नाराज नहीं करना
चाहती.

ऐसे में बीजेपी जरूर इस बात
की उम्मीद करेगी कि नीतीश कम
से कम नरेंद्र मोदी के खिलाफ
मंच से कुछ ना बोलें और
मौजूदा तल्खी और ना बढ़े.
बीजेपी को मिशन 2014 के लिए
बिहार महत्वपूर्ण राज्य के
तौर पर नजर आ रहा है.

बिहार का गणित

बिहार में कुल 40 लोकसभा
सीट हैं जिसमें 2009 चुनाव में
जेडीयू और बीजेपी ने मिलकर 32
सीट जीती थीं. इसके बाद हुए
विधानसभा चुनाव में भी
बीजेपी और जेडीयू ने मिलकर 243
सीटों में से 206 विधानसभा सीट
जीती थीं. ऐसे में बीजेपी ये
बिल्कुल नहीं चाहेगी कि
बिहार का ये विनिंग
कॉम्बीनेश टूटे या फिर नीतीश
पाला बदलकर यूपीए की तरफ चले
जाएं.

इस रैली से नीतीश अपनी
दिक्कतें से भी ध्यान हटाने
की कोशिश में हैं.
कॉन्ट्रैक्ट शिक्षकों पर
लाठीचार्ज मामले में नीतीश
को विपक्ष पूरी तरह से घेर
रहा है. बिहार में कानून
व्यवस्था को भी लगातार
मुद्दा बनाए जाने की कोशिशें
की जा रही हैं. वहीं नीतीश के
विरोध में भी लालू यादव,
पासवान और उपेंद्र कुशवाहा
ने भी नए समीकरणों की तलाश
शुरू कर दी है. नीतीश की कोशिश
होगी कि रामलीला मैदान पर
विराट रूप दिखा कर अपने
कार्यकर्ताओँ और वोटरों में
नई उम्मीद जगाई जाए.

नीतीश इस रैली को कितना अहम
मान रहे हैं इसका अंदाजा इसी
बात से लगा सकते हैं कि
जेडीयू के कई विधायक दिल्ली
में कैंप कर लोगों से संपर्क
बनाने में जुटी है. दिल्ली और
आसपास के रहने वाले
बिहारियों को हर हाल में
अधिकार रैली के लिए रामलीला
मैदान पहुंचने की अपील की जा
रही है.

इस रैली की कामयाबी नीतीश के
लिए दिल्ली की दौड़ की शुरुआत
हो सकती है. नीतीश की टोन क्या
होगी, जेडीयू नेता क्या
बोलेंगे, किस पार्टी की तरफ
झुकाव होगा इन छोटी से छोटी
बात पर राजनैतिक विश्लेषकों
की निगाह बनी रहेगी क्योंकि
इस रैली का भविष्य के
राजनैतिक समीकरणों पर असर
पड़ने की पूरी संभावना है.

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