क्या लालू की हवा सिर्फ हवा में है ?

क्या लालू की हवा सिर्फ हवा में है ?

By: | Updated: 05 May 2014 12:10 PM

मीडिया में इस बात की चर्चा खूब हो रही है कि क्या नरेंद्र मोदी के रथ को लालू ने बिहार में रोक दिया है ? लालू भी अपने मुंह मियां खूब मिट्ठू बन रहे हैं . लेकिन क्या सच में बिहार में लालू लौट रहे हैं . जानकारों की राय बंटी हुई है . और इसके पीछे कई कारण भी हैं .

 

बिहार से जो जानकारी आ रही है उसके मुताबिक लालू के दावे में जमीनी हकीकत नहीं है . लोगों का कहना है कि नीतीश कैंप की ओर से जान बूझकर इस तरह की खबरें फैलाई जा रही है . क्योंकि नीतीश को जिस तरीके से मुस्लिम वोटों की उम्मीद थी उस तरीके से उन्हें मुस्लिम वोट नहीं मिल रहे .

 

नीतीश सवर्णों के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए लालू की वापसी की चर्चा को हवा दे रहे हैं . ताकि लालू के डर की वजह से सवर्ण वोट बीजेपी को एकमुश्त न मिलने पाए .

 

नीतीश इस चुनाव में अति पिछड़ा और मुस्लिम समीकरण के दम पर उतरे हैं . इसी हिसाब से उन्होंने उम्मीदवारों का चुनाव भी किया था . नीतीश के रणनीतिकार ये मान रहे थे कि उम्मीदवार की जाति के वोट के साथ उन्हें अति पिछड़ा और मुस्लिमों का थोक वोट मिलेगा . लेकिन मुस्लिमों का वोट थोक के भाव में बंट गया है .

 

जहां जहां नीतीश ने मुस्लिम उम्मीदवारों को उतारा था वहां मुसलमानों के वोट जेडीयू और आरजेडी में बंट गए हैं . भागलपुर और मधुबनी में मुस्लिम वोट सिर्फ एक पार्टी को नहीं मिला है . खबर तो ये भी है सारण में राबड़ी की स्थिति भी ठीक नहीं है . सारण में जेडीयू के सलीम परवेज को मुस्लिमों का अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है . राजपूत रूडी के साथ हैं . लेकिन यादवों की गोलबंदी भी राबड़ी के पक्ष में नहीं है . लोकसभा क्षेत्र की 6 विधानसभा सीटों में से आरजेडी के पास एक सीट भी नहीं है . दो यादव विधायक हैं भी तो वो जेडीयू के हैं . जो किसी भी कीमत पर यादवों का वोट राबड़ी को देने से रोकने में जुटे हैं . कहा जा रहा है कि राबड़ी की गाड़ी की तलाशी कांड को लालू बिरादरी की प्रतिष्ठा से जोड़कर तूल देने की कोशिश कर रहे हैं . ताकि यादवों को गोलबंद किया जा सके .

 

महाराजगंज में प्रभुनाथ सिंह बुरी तरह फंस गए हैं . जनार्दन सिंह सिग्रीवाल को बहुत ही कमजोर उम्मीदवार माना जा रहा था लेकिन धीरे धीरे वो मजबूत हो रहे हैं . उमाशंकर सिंह के बेटे जीतेद्र स्वामी के साथ आने से और ज्यादा ताकत मिली है . यादवों के वोट के बदले राजपूतों का वोट सारण और सीवान में आरजेडी को दिलाने की जिम्मेदारी प्रभुनाथ ने ली थी लेकिन सारण में राजपूत रूडी के साथ हैं और सीवान में मनोज सिंह के साथ . सारण प्रमंडल की चारों सीटों पूरा सियासी समीकरण राजपूत, यादव और मुस्लिमों के त्रिकोण में फंस गया है . तुम यहां हमारी जाति को दो तो हम वहां तुम्हारी जाति को दिलवाएंगे वाला फॉर्मूला फेल हो गया है .

 

पाटलिपुत्र में भी मीसा भारती को यादवों ने उम्मीद के मुताबिक वोट नहीं दिया . कहा जा रहा है कि मुस्लिमों ने रंजन यादव को मीसा की तुलना में ज्यादा वोट दिया . जिस ग्रामीण इलाके से मीसा को ज्यादा उम्मीद थी वहां के यादवों का वोट लेने में रामकृपाल भी कामयाब रहे . सो मीसा भी जीत ही जाएंगी इसके लिए इंतजार करना होगा . इसलिए ही राबड़ी के लिए लालू पूरा जोर लगा रहे हैं .

 

नवादा में जरूर यादवों ने गिरिराज सिंह के खिलाफ गोलबंदी दिखाई . चुनाव के दिन राज बल्लभ यादव और कौशल यादव नें हाथ मिला लिया .

 

लेकिन मधुबनी में यादवों ने स्वजातीय नेता और बीजेपी उम्मीदवार हुकुमदेव नारायण यादव को वोट दिया . मधेपुरा में यादवों ने जरूर इस बार पप्पू यादव को वोट दिया . शरद यादव की हालत यहां खराब है . बीजेपी उम्मीदवार भी काफी ताकतवर हैं जो नतीजे पलट सकते हैं . हालांकि थोड़े बहुत अंतर से पप्पू जीतेंगे भी तो अपने दम पर . जो सीटें लालू को मिलती दिख रही है उसमें मधेपुरा, आरा, बक्सर, वैशाली की सीट शामिल है .

 

वैशाली में रघुवंश सिंह जीतते हैं तो अपने दम पर और कमजोर विरोधी की वजह से जीतेंगे न कि लालू की वजह से . अगर यादवों और पिछडों के बीच लालू लहर की कोई बात होती तो फिर यादवों के सारे वोट सिर्फ लालू की पार्टी को ही मिलने चाहिए थे लेकिन खगड़िया, बांका, उजियारपुर, सीवान में ऐसा नहीं दिख रहा .

 

जहां तक अपनी जाति को वोट देने की बात है तो ये कोई पहली बार नहीं हो रहा . 2010 के विकास लहर में एनडीए को दो सौ से ज्यादा सीटें मिली तब भी लालू को करीब 20 फीसदी वोट मिले थे . लालू को तब विधानसभा की सिर्फ 22 सीटें मिली थी .  लालू ने इस बार सियासी समीकरण को ध्यान में रखते हुए ही यादव जाति के 8 और 6 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे . 13 अन्य को टिकट दिया था . लेकिन बाकी पार्टियों ने लालू के इस जातीय समीकरण को अपने समीकरण से साफ करने की रणनीति अपनाई . अब 16 मई को ही पता चलेगा कि लालू मोदी के रथ को रोकने में कामयाब रहे या फिर जंगल राज की वापसी की आशंका ने उन्हें बिहार से साफ कर दिया .

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