क्या सोनिया के ‘लाल’ ने किया लालू का बंटाधार?

By: | Last Updated: Thursday, 3 October 2013 9:51 AM
क्या सोनिया के ‘लाल’ ने किया लालू का बंटाधार?

जिस तरह इंदिरा गांधी को कभी
राजनीति में गूंगी गुड़िया
कहा जाता था उसी तरह दबी
ज़ुबान में लोग राहुल गांधी
को गूंगा गुड्डा कहना शुरू कर
दिया था.

लेकिन इतिहास गवाह है कि
गूंगी गुड़िया लौह महिला के
रूप में उभरकर सामने आई. जब
विपक्ष ने इंदिरा गांधी के
इस्तीफ़े की मांग शुरू की तो
उन्होंने इंदिरा हटाओ के
नारे का जवाब गरीबी हटाओ से
दिया.

इंदिरा के उस नारे का ही असर
था कि वह विपक्ष को मुंह तोड़
जवाब देने वाली एक मजबूत और
साहसी पीएम के तौर मशहूर हो
गईं.

कहने का मतलब ये है कि
राजनीति में और आम जीवन में
किसी को कम नहीं आंकना चाहिए
क्योंकि कभी कोई भी जीरो से
हीरो और हीरो से जीरो बन सकता
है. इसके लिए सिर्फ एक फैसला
काफी है.

जो देश का राजनीति माहौल और
जो परिस्थिति है उसमें ऊपर
पहुँचकर ही सिस्टम में बदलाव
कर सकते हैं इसके पहले आपको
समझौता करना पड़ सकता है,
घूटन महसूस हो सकती है और
जलालत भी झेलनी पड़ सकती है
लेकिन आपके इरादे चट्टान की
तरह है तो सत्ता और पद हाथ
लगते ही अपनी सोच को अंजाम दे
सकते हैं इसके पहले हावी गुट
आपके अरमानों पर पानी फेर
सकता है.

देर से ही सही राहुल गांधी को
भी मौका मिला और पावर का
इस्तेमाल और वो एक बार में ही
दागियों पर नकेल कसने के
मुद्दे पर हीरो बन गये.

इतिहास उसी चीज को याद करता
है जो अहम और कड़े फैसले लेते
हैं हालांकि राहुल गांधी ने
अपनी गलती को मानते हुए कहा
है कि दागियों को बचाने के
लिए अध्यादेश को लेकर जो शब्द
उन्होंने कहे थे वो ठीक नहीं
थे और उनकी मानें तो उन्हें
उन शब्दों का इस्तेमाल नहीं
करना चाहिए था और इस मामले
में उनकी भावना गलत नहीं थी.

राहुल तो इस मुद्दे पर हीरो
हो गये लेकिन उनके फैसले से
लालू यादव का करियर चौपट हो
गया. अगर राहुल कड़े फैसले
नहीं लेते तो लालू प्रसाद जेल
तो ज़रूर जाते लेकिन संसद का
दरवाज़ा उनके लिए बंद नहीं
होता. वही लालू जो सोनिया के
बुरे वक्तों मे डटकर खड़े थे
और उसी सोनिया के लाल ने लालू
के भविष्य को घुप्प अंधेरे
में धकेल दिया.

क्या राहुल की वजह से लालू
सदमे में हैं?

चारा घोटाला केस में दोषी
आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद
यादव को 5 साल की सजा मिली है
और उनपर 25 लाख का जुर्माना भी
लगाया गया है.

सजा मिलने के बाद लालू की
संसद सदस्यता खत्म हो जाएगी
और 11 साल तक चुनाव नहीं
लड़ेंगे यानि 2024 तक चुनाव
नहीं लड़ सकेंगे. शायद लालू
सजा से उतने सदमे में नहीं है
जितने वो राहुल गांधी के
फैसले से सदमे में है. अगर
अध्यादेश को वापस नहीं लिया
जाता तो उनकी सदस्यता बनी
रहती और आगे भी चुनाव लड़ते
रहते.

राजनीति में कोई स्थाई दोस्त
नहीं होता है ना ही दुश्मन
लेकिन दोस्त ही जब दुश्मनी
निकाल जाए तो फिर क्या बात है.

राहुल गांधी ने अपनी और
पार्टी के हित को सर्वोपरि
रखा है लेकिन जिस तरह लालू
सोनिया गांधी पर आंख बांधकर
भरोसा करते थे उस भरोसे का
कत्ल ही माना जाए.

अध्यादेश तो लालू को बचाने के
लिए ही लाया गया था लेकिन कौन
जानता था कि यही अध्यादेश
लालू के गले का फांस बन जाएगा.
यूं कहें कि सदमा तो सोनिया
को भी होगा लेकिन वो अब क्या
करें. खैर पार्टी के नुकसान
के डर से ही राहुल एक अहम काम
कर गए लेकिन ये काम अभी अधूरा
है सिर्फ दागी नेताओं पर नकेल
कसने से काम नहीं चलेगा.

क्या भ्रष्टाचार और
दागियों पर राहुल का काम
अधूरा है?

कहते हैं कि कानून के हाथ
लंबे होते हैं लेकिन ये कानून
पहले आम आदमी को अपने गिरफ़्त
में तो लेता था लेकिन नेता बच
जाते थे. अब मामला उल्टा हो
गया है अब कानून के हाथ लंबे
नहीं चौड़े भी हो गये हैं अब
कानून के निशाने पर हैं नेता
लेकिन क्या सिर्फ दागियों पर
अध्यादेश वापस लेने से यूपीए
सरकार और राहुल का काम खत्म
हो गया है तो बड़ी भूल होगी,
क्योंकि पुलिस रिफ़ॉर्म और
न्यायिक रिफ़ॉर्म के बिना
इसका दुरुपयोग हो सकता है.

पुलिस और निचले स्तर पर
न्यायिक व्यवस्था कैसे काम
करती है सबको मालूम है.
केन्द्र सरकार, राज्य सरकार
और सत्ता धारी पार्टियाँ
अपने विरोधियों के खिलाफ
अपने हित साधने के लिए इसका
बेजा इस्तेमाल कर सकती है.
झूठे केस में फंसाकर
विरोधियों का राजनीतिक
विरोधियों का करियर चौपट कर
सकती है.

दागियों पर सुप्रीम कोर्ट का
फैसला अहम है लेकिन इसका
दायरा स्थानीय चुनावों पर भी
पड़ सकता है चूंकि राजनीति से
जुड़े लोग आंदोलन और
प्रदर्शन करते हैं इसमें भी
सजा हो सकती है और संसद और
विधानसभा का दरवाज़ा उनके
लिए बंद हो सकता है.

अब सरकार और कोर्ट को निचली
अदालत से फैसला आने के बाद इस
तरह के मामले को जल्द से जल्द
निपटाने की व्यवस्था करनी
पड़ सकती है. बेहतर होता इस
तरह के मामले से निपटने के
लिए फास्ट ट्रैक बनतीं, ताकि
झूठे मामले में फंसे लोगों को
समय पर न्याय मिल सके.

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Web Title: क्या सोनिया के ‘लाल’ ने किया लालू का बंटाधार?
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