खुद को बदनसीब मानते हैं अयोध्या में रहने वाले

By: | Last Updated: Sunday, 25 August 2013 9:30 PM

अयोध्या: वर्ष 1984 में न
जाने किस मुहूर्त में
अयोध्यावासियों का धर्म
आधारित आंदोलन से
साक्षात्कार हुआ जो अब भी
उनका पीछा नहीं छोड़ रहा है.
अयोध्या में दुनिया की चाहे
जो भी रुचि हो, लेकिन
अयोध्यावासियों को इससे
केवल निराशा ही हाथ लगी है.

लंबे-लंबे कर्फ्यू झेल चुके
अयोध्यावासी अपने को कश्मीर
के बाद देश के सबसे बदनसीब
देशवासी मानते हैं. न जानें
कब पानी, दूध, सब्जी, बिजली,
स्कूल, अस्पताल की सुविधा
उनसे छिन जाए, यह सोचकर यहां
के लोग सहम जाते हैं.

अयोध्या
के नए घाट पर रविवार भोर में
स्नान करने गए 92 वर्षीय बाबा
रामगोपाल दास को सुरक्षा
बलों ने रोका तो उनका एक ही
सवाल था कि क्या भारत फिर से
गुलाम हो गया है?

दास से जब
आईपीएन ने पूछा कि स्नान पर
पुलिस के पहरे से आप कितना
प्रभावित हैं तो उन्होंने
कहा कि जो प्रतिबंध मुगल और
अंग्रेज नहीं लगा पाए थे वो
प्रतिबंध राजनीति ने लगवा
दिया. देश आजाद हो गया और धर्म
गुलाम.

उन्होंने बताया कि
अयोध्या में श्रीरामजन्म
भूमि पर शुरू हुए विवाद को
मैं 1949 से ही देख रहा हूं. आज
जहां यह पहुंचा है, यदि
सरकारें और इस देश के नेता
ईमानदार रहे होते तो
तीर्थराज अयोध्या की यह
दुर्गति नहीं होती.

अयोध्या
में बुढ़िया माई के नाम से
प्रसिद्ध 82 वर्षीया एक
वृद्धा ने कहा, “यह सब
देखते-देखते जिंदगी के अंतिम
पड़ाव पर खड़ी हूं. अब तो यही
दुख हमेशा सालता है कि हमारे
बच्चों को ये सरकारें कहीं
भूखों न मार डालें.”

उन्होंने
बताया कि जब से अयोध्या में
पुलिस गोली चलाने लगी (1990) तब
से यह भय बना रहता है कि कहीं
फिर अनहोनी तो नहीं होने वाली
है.

पुलिस विभाग में
उपाधीक्षक पद से पन्ना (मध्य
प्रदेश) से 1987 में
सेवानिवृत्त होकर यहां आकर
साधु हुए धीरज सिंह यहां के
माहौल से इतना निराश हो चुके
हैं कि उन्हें लगता है कि अब
अयोध्या केवल कहानी बनकर रह
जाएगी.

उन्हें मलाल है कि
शहर के अंदर हर स्थानीय
व्यक्ति तीर्थ यात्रियों की
प्रतीक्षा में है, लेकिन 84
कोसी परिक्रमा परिधि के बाहर
से लेकर अयोध्या तक पुलिस की
त्रिस्तरीय स्थायी सुरक्षा
चक्र के सामने चाहकर भी कोई
सामान्य तीर्थ यात्री
अयोध्या में नहीं घुस सकता.

वह
कहते हैं कि 13 सितंबर तक यहां
ऐसा ही माहौल रहेगा. अभी से
यहां सब्जियों, फलों और दूध
के दाम चढ़ गए हैं, आगे क्या
होगा?

अयोध्या के साकेत
विश्वविद्यालय में संस्कृत
विभाग के अध्यापक
प्रेमचंद्र मिश्र ने बताया,
“हमने तो अक्टूबर-नवंबर 1990 और
नवंबर-दिसंबर 1992 का मंजर देखा
है. अब राम स्वयं आकर अयोध्या
को संभालें तो भले संभल जाए,
नहीं तो राजनीति और राजनेता
इसे कहां ले जाएंगे पता नहीं.”

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