गरीबों का मजाक बनाने के आरोप पर मोदी सरकार का पलटवार, कहा- गलतबयानी कर भ्रम फैला रही है कांग्रेस

By: | Last Updated: Monday, 3 February 2014 11:35 AM

अहमदाबाद. बीपीएल मसले पर कांग्रेस जानबूझकर कर रही है गलतबयानी और फैला रही है भ्रम ये आरोप है नरेंद्र मोदी सरकार और गुजरात बीजेपी का. पार्टी के मुताबिक, जिन आंकड़ों को लेकर कांग्रेस मोदी सरकार पर हमला करते हुए गरीबों का रोना रो रही है, उन्हीं आंकड़ों को सुधारने की कोई कोशिश खुद केंद्र में पिछले दस साल से बैठी यूपीए सरकार ने नहीं की है.

 

मोदी सरकार ने अपने तर्क के समर्थन में योजना आयोग के उस सर्कुलर को सामने रखा है, जो 12 जनवरी 2004 को जारी किया गया था. इस सर्कुलर में हर राज्य के शहरी और ग्रामीण इलाकों के लिए आय के आधार पर गरीबी रेखा तय की गई थी. इस सर्कुलर के मुताबिक, वर्ष 2001-2002 को आधार वर्ष बनाकर गुजरात के ग्रामीण इलाकों में प्रति व्यक्ति मासिक आय 324 रुपये रहने तक बीपीएल की सूची में रखने का निर्देश जारी किया गया, तो शहरी इलाकों के लिए ये सीमा 501 रुपये रखी गई. हर राज्य के लिए आय की सीमा अलग-अलग रखी गई. मसलन केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ के लिए ये सीमा 432 रुपये रखी गई यानी जो भी व्यक्ति वहां इस रकम तक की मासिक कमाई करता था, उसे बीपीएल की श्रेणी में रखे जाने का निर्देश दिया गया.

 

बीजेपी का तर्क है कि जो कांग्रेस इसी सीमा को सामने रखकर मोदी सरकार पर हमला बोल रही है, वो आखिर ये बताए कि केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ में 432 रुपये प्रति मास तक कमाने वाले व्यक्ति को ही बीपीएल में रखे जाने से उसे क्यों परेशानी नहीं है.

 

मोदी सरकार का कहना है कि राज्य सरकार दो मौकों पर यानी वर्ष 2010 और वर्ष 2013 में इस आय सीमा को बढ़ाने की गुहार केंद्र की यूपीए सरकार से कर चुकी है, लेकिन केंद्र के कान पर जूं नहीं रेंगी और इस सीमा को बढ़ाने से मना कर दिया गया.

 

मोदी सरकार ने ये भी साफ किया है कि बीपीएल परिवारों को चिन्हित करने का एक मात्र आधार सिर्फ मासिक आय नहीं है, जैसा प्रोजेक्ट करने की कोशिश कांग्रेस कर रही है. राज्य सरकार के मुताबिक, जो लोग परिसंपत्ति संबंधी नियमों के तहत बीपीएल की सूची में आ जाते हैं, उसके अतिरिक्त बीपीएल लोगों की पहचान करने के लिए आय का आधार रखा गया है न कि बीपीएल तय करने का संपूर्ण आधार आय है. उदाहरण के तौर पर अगर किसी गरीब के घर में बिजली का बल्ब होने या फिर झोपड़ी होने पर वो बीपीएल श्रेणी से बाहर चला जाता है, तो आय के आधार पर उसे बीपीएल के अंदर रखने की व्यवस्था अमल में लाई जाती है.

 

मोदी सरकार का ये भी तर्क है कि जिस संपत्ति आधारित बीपीएल चिन्हित का तर्क कांग्रेस रख रही है, उसके आधार पर गुजरात में कुल बीपीएल परिवार 21 लाख के करीब ही रह जाते हैं. आय का आधार लगाने के साथ ही इसमें 11 लाख परिवारों का और इजाफा हो जाता है. राज्य सरकार के मुताबिक, केंद्र सरकार तो पीडीएस योजना के तहत सिर्फ 21 लाख परिवारों को अंत्योदय और बीपीएल श्रेणी का राशन देती है, उपर के 11 लाख बीपीएल परिवारों के राशन की व्यवस्था मोदी सरकार खुद अपने स्तर से करती है. राज्य सरकार के मुताबिक, आखिर केंद्र ये बताए कि अगर वो गरीब परिवारों को लेकर इतनी ही चिंतित है तो इन 11 लाख अतिरिक्त बीपीएल परिवारों को वो स्वीकार करने को क्यों तैयार नहीं.

 

जहां तक खाद्य सुरक्षा कानून का सवाल है, उसके बारे में राज्य सरकार का ये कहना है कि मौजूदा व्यवस्था की तुलना में खाद्य सुरक्षा कानून के तहत गरीब परिवारों को ज्यादा नुकसान होगा. राज्य सरकार के मुताबिक, अभी गुजरात में बीपीएल परिवारों को प्रति सदस्य सात किलोग्राम अन्न दिया जाता है, जबकि खाद्य सुरक्षा कानून के तहत ये प्रति व्यक्ति पांच किलोग्राम ही है. ऐसे में खाद्य सुरक्षा कानून को लागू करने पर पांच सदस्यो के बीपीएल परिवार को मासिक दस किलोग्राम कम अन्न मिला करेगा. बीजेपी का कहना है कि आखिर कांग्रेस साफ करे कि गरीब परिवारों के लिए मौजूदा व्यवस्था ज्यादा अच्छी है या फिर खाद्य सुरक्षा कानून.

 

मोदी सरकार के मुताबिक, खाद्य सुरक्षा कानून की जगह मौजूदा व्यवस्था के तहत गुजरात सरकार को ज्यादा रकम खर्च करनी पड़ रही है. आंकड़ों के हिसाब से ये अतिरिक्त खर्च 32 लाख बीपीएल परिवारों के लिए 288 करोड़ रुपये प्रति माह है. राज्य सरकार का कहना है कि ज्यादा रकम खर्च कर गरीब परिवारों को ज्यादा सहायता मुहैया कराना उचित है या फिर खाद्य सुरक्षा कानून के तहत कम रकम मुहैया कराना, कांग्रेस ये तय कर ले.

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Web Title: गरीबों का मजाक बनाने के आरोप पर मोदी सरकार का पलटवार, कहा- गलतबयानी कर भ्रम फैला रही है कांग्रेस
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