चार राज्यों में नकारी गई कांग्रेस के लिए बड़ा सबक

By: | Last Updated: Tuesday, 6 March 2012 6:31 AM

नई दिल्ली: पांच
राज्यों के विधान सभा
चुनावों  के नतीजे कांग्रेस
की मनमोहन सिंह सरकार के लिए
खतरे की घंटी हैं. यूपी में
पूरा जोर लगाने के बाद भी
कांग्रेस पिछले विधानसभा
चुनावों से कुछ सीटें ही
ज्यादा हासिल कर सकी.

पंजाब में 1967 से हर बार सरकार
बदलने की परंपरा रही है,
लेकिन यहां भी कांग्रेस बुरी
तरह से पिटी. गोवा में उसे हार
का सामना  करना पड़ा.

अकेले मणिपुर की जीत पर
कांग्रेस इतरा नहीं सकती.
नतीजों  से  तय है कि
कांग्रेस के  खिलाफ एक हवा है,
लोग कांग्रेस से नाराज है,
लोगों ने 2009 में मनमोहन सिंह
सरकार को दोबारा मौका दिया था
तो सिर्फ सोनिया गांधी, राहुल
गांधी और मनमोहन सिंह पर
भरोसा करके. लेकिन यूपी में 
राहुल पांच साल सिर्फ पांच
साल मांगते रह गए लेकिन  जनता
ने उनपर यकीन नहीं किया .

भ्रष्टाचार और मंहगाई को अब
गंभीरता से लेने की पूरी
जरुरत है. इसके साथ ही जुड़ा
है बेरोजगारी का मुद्दा. ये
ऐसे मुद्दे हैं  जो सीधे जनता
से जुड़ें हैं. इस पर काबू
नहीं किया गया तो अगले  साल
राजस्थान,  मध्यप्रदेश,
दिल्ली, छत्तीसगढ़ में चुनाव
होने हैं. इस साल के अंत में
गुजरात और हिमाचल में भी
चुनाव हैं. फिर 2014 का  लोकसभा
चुनाव है.

अगर कांग्रेस हर तीन महीने 
बाद मंहगाई कम करने की नई डेड
लाइन देती रही तो लोकसभा
चुनावों में उसकी बुरी  गत बन
सकती है.

अभी तक कांग्रेस को लग रहा था
कि  गरीबों, दलितों  के लिए
योजनाऐं बनाओं . मनरेगा के 
जरिए साल में सौ दिन का
रोजगार दो, भोजन चूल्हा चौके
की व्यवस्था करो और वोट बटोर
लो. इस वोट के भरोसे सरकार बना
लो. लेकिन यूपी में जबरदस्त
हार से तय हो गया है कि प्रो
पुअर योजनाओं के  सहारे
हमेशा ही सत्ता में नही आया
जा सकता.

राहुल का मैजिक नहीं चला

आखिर राहुल गांधी लगातार
कहते रहे कि दिल्ली से पैसा
आता है और लखनऊ में बैठा  हाथी
पैसा  खा जाता है. मनरेगा में
गड़बड़ी है. एनआरएचएम में
घोटाला  है . जनता ने सुना.
ताली बजाई लेकिन कांग्रेस
पर  भरोसा नहीं किया जो
दिल्ली से  पैसा भेज रही है .

इसके विपरीत मुलायम के  हाथ
में सत्ता सौंप दी. ऐसा ही
पंजाब में हुआ और गोवा में भी.
सवाल उठता  है कि ऐसा क्यों 
हुआ.

सरकार को ये भी देखना होगा कि
मनरेगा, एनआरएचएम जैसी
योजनाओं पर लाखों करोड़ों
रुपये खर्चने के बावजूद न तो
जनता का भला हो रहा है और न ही
कांग्रेस को वोट ही हासिल हो
रहा है. अब कांग्रेस को देखना
पड़ेगा कि गरीबों के हित में
चलाई जा रही योजनाओं पर उसे
क्या  नीति बनानी चाहिए
जिससे गरीब आदमी का वास्तव 
में भला हो और वो कांग्रेस का
हाथ भी थामे.

उत्तराखण्ड में  पूर्व
मुख्यमंत्री बी सी खंडूडी का
हारना टीम अन्ना  की बहुत
बड़ी हार है. खंडूड़ी एक
मजबूत लोकायुक्त बिल ले कर आए
थे और खुद अन्ना  हजारे ने 
इसकी तारीफ की थी. बाकायदा
कहा गया, बार बार कहा गया  कि
सभी मुख्यमंत्री ऐसा ही बिल
लेकर आए. लेकिन वहीं खंड़ूडी
हार गए.

लोग कह रहे हैं कि निशंक ने
हरवा दिया. हो सकता है कि
इसमें सच्चाई हो लेकिन इससे
अन्ना  टीम के  अभियान की
विफलता कम नहीं  होती हैं.

आम जनता में टीम  अन्ना का 
इतना  ही असर होता तो वो
भितरघात के बाद भी खंडू़डी को
जितवा देती.

यूपी में अन्ना का कोई  असर
नहीं दिखा. अब वो कह रही है कि
गोवा में उसका असर रहा
क्योंकि वहां कांग्रेस हार
गई. टीम अन्ना के  लिए  सबक है
कि वो भ्रष्टाचार के मूल
मुद्दे  पर ही पूरा ध्यान दें
और राजनीति के मैदान में
कूदने  की गलती नहीं करें.

मायावती  के लिए सबक है कि
मूर्तियां लगवाने से काम
नहीं चलता. सबके विकास का काम
होना चाहिए. अखिलेश ने महेनत
की लेकिन पिता मुलायम ही
मुख्यमंत्री होंगे लेकिन
अखिलेश के लिए जरुरी है कि वो
मायावती की गलतियों  से सबक
लें. विकास करें लेकिन
विनम्रता के साथ. गुंडागर्दी
को बढ़ावा देने वाली छवि से
सपा को मुक्त करना  भी बहुत
जरुरी होगा.

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