चुनावी मुद्दों से गायब है मैला ढोने की प्रथा

चुनावी मुद्दों से गायब है मैला ढोने की प्रथा

By: | Updated: 24 Apr 2014 06:53 AM

नई दिल्ली: आजादी के 66 साल बाद भी देश के कई हिस्सों में मैला ढोने की शर्मनाक प्रथा कायम है. आज भी देश भर में करीब 10 लाख लोग मैला ढोने जैसा अमानवीय काम करते हैं, लेकिन हमारे नेताओं और उनकी चुनावी राजनीति के लिए उनका होना कोई मुद्दा नहीं है और न ही इस कुप्रथा को खत्म करना ही मुद्दा है.

 

सरकार ने हालांकि मैला ढोने की प्रथा को खत्म करने के लिए कानून लागू किए हैं और सुप्रीम कोर्ट ने भी उन लोगों को सहायता राशि दिलवाई है, जिनकी मौत मैला ढोने का काम करने से हुई. लेकिन फिर भी समाज की विडंबना यह है कि देश भर में कितने ही मैला ढोने वाले आज भी मिल जाएंगे.

 

2011 की जनगणना में मैला ढोने वालों की संख्या 7,50,000 दिखाई गई थी, लेकिन कार्यकर्ताओं का दावा है कि इनकी संख्या 10.2 लाख के आस-पास है. इनमें वे लोग भी शामिल हैं, जो गटर और सेप्टिक टैंकों की सफाई का काम करते हैं.

 

पिछले सप्ताह बंबई हाई कोर्ट का बयान आया, जिसमें पुष्टि की गई कि मैला ढोने की प्रथा अब भी कायम है, लेकिन हमारे राजनेताओं के लिए जैसे यह तबका और इनका अस्तित्व मायने ही न रखता हो.

 

सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक बिंदेश्वर पाठक ने आईएएनएस को बताया, "स्वच्छ माहौल की सुविधाएं और छुआछूत खत्म करना हमेशा से हमारे नेताओं की प्राथमिकता सूची में सबसे नीचे रहे हैं. मैला ढोने की प्रथा का मुद्दा न केवल चुनावी घोषणा-पत्रों से गायब है, बल्कि इस तबके के होने न होने से भी उन्हें कोई मतलब नहीं है."

 

पाठक कहते हैं कि मंगल ग्रह पर अंतरिक्ष यान भेजकर यहां विकास की बातें करना बेतुकी है, जब आपके देश में असंख्य लोग अमानवीय कार्य करने को मजबूर हैं. उन्होंने कहा, "हमारे देश में मैला ढोने की प्रथा को जड़ से मिटाना वैसे भी मुश्किल है, क्योंकि अब भी कई शहरों और कस्बों में यह काम होता है और इस प्रथा के निदान का कानून अब भी प्रभाव में लाया जाना बाकी है."

 

सुलभ इंटरनेशनल एक स्वयंसेवी संगठन है, जो छुआछूत और मैला ढोने वाले लोगों के साथ भेद-भाव जैसी कुरीतियों के खिलाफ अभियान चलाता है. सुलभ इंटरनेशनल 1970 से ही मैला ढोने वाली महिलाओं के लिए रोजगार और जीविकोपार्जन (दर्जी का काम और ब्यूटी पार्लर चलाने का प्रशिक्षण) की व्यवस्था करता आ रहा है.

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