जब एक भारतीय मां की हिम्मत ने हिमालय को भी झुका दिया

By: | Last Updated: Thursday, 23 January 2014 2:36 PM
जब एक भारतीय मां की हिम्मत ने हिमालय को भी झुका दिया

लेह: बच्चे का जन्म किसी भी परिवार के लिए सबसे बड़ी खुशी का मौका होता है. हममें में से ज्यादातर काफी खुशनसीब हैं कि उनके बच्चों का जन्म अस्पताल के आरामदेह और सुरक्षित माहौल में हुआ है. लेकिन उत्तर भारत के लद्दाख में रहने वाले इस परिवार के लिए हालात बिल्कुल अलग थे. बच्चे के जन्म के लिए इस परिवार की गर्भवती मां को हिमालय के तमाम खतरनाक पहाड़ों और ग्लेशियर को पैदल पार कर 72 किलोमीटर दूर मौजूद अस्पताल तक जाना पड़ा. ये अदभुत कहानी मां के उस अदभुत धैर्य की है, जिसके आगे हिमालय को भी झुकना पड़ा.

 

    लेह में तापमान शून्य से 35 डिग्री सेंटीग्रेड तक नीचे था. शहर की सड़कें सूनसान थीं और लोग घरों में भीतर दुबके हुए थे. लेकिन ऐसे में एक गर्भवती मां अपने दूसरे बच्चे को जन्म देने के लिए लंबे सफर की तैयारी कर रही थी. क्योंकि बच्चे के जन्म से पहले मां को सबसे करीब के अस्पताल में पहुंचना था और ये सबसे करीब का अस्पताल भी 72 किलोमीटर दूर लिंगशेड में था, जहां साफ मौसम में सड़क से जाने में भी 5 दिन लगते हैं.

 

अपने पति और देवर के साथ मिलकर मां ने सफर के लिए सभी जरूरी तैयारियां कर लीं. हर दिन अगर 8 घंटे पैदल चला जाए तब जाकर अस्पताल पहुंचने में 8 दिन लगते हैं. मां ने परिवार की दो अनुभवी महिलाओं को साथ लिया और 5 बरस के अपने पहले बेटे के लिए खास डलिया तैयार की. और कड़ाके की ठंड और बर्फबारी के बीच परिवार ने अस्पताल के लिए अपना सफर शुरू कर दिया.

 

डेली मेल की रिपोर्ट के मुताबिक पीठ पर अपने छोटे बेटे और रास्ते के लिए सभी जरूरी साजो-सामान को लादकर ये परिवार बर्फ से ढंके हिमालय के पहाड़ों को पार करने के लिए चल पड़ा. मां के साथ ये परिवार हर दिन 8 घंटे पहाड़ों और ग्लेशियरों को पैदल पार करता और सांझ होते किसी पहाड़ी गुफा में रात गुजारने के लिए शरण ले लेता.

 

इस तरह 9 दिन के पैदल सफर के बाद प्रसव पीड़ा से जूझती मां लिंगशेड के अस्पताल पहुंच सकी. जानलेवा खतरों और तमाम कठिनाइयों से भरे इस सफर की सारी थकान उस पल काफूर हो गई जब परिवार को चांद से दूसरे बेटे के जन्म की खुशखबरी मिली. मां और बेटा दोनों को सकुशल देख परिवार की खुशी का ठिकाना न रहा.

करीब 7 दिन अस्पताल में गुजारने के बाद परिवार ने वापसी के सफर की तैयारियां शुरू कर दीं. मां ने इस बार एक और छोटी डलिया बनाई, अपने चांद से नन्हे बेटे के लिए. पीठ पर अपने दूसरे बेटे को लादकर मां ने परिवार के साथ लेह के लिए वापसी का पैदल सफर शुरू कर दिया.

 

इसी वापसी के सफर के दौरान जब ये परिवार रात गुजारने के लिए एक पहाड़ी गुफा में आग सुलगा रहा था, कि यहीं उनकी मुलाकात फोटोग्राफर टिम वॉल्मर से हुई. आइसलैंड के फोटोग्राफर टिम अपने दोस्तों के साथ हिमालय की ट्रैकिंग के लिए यहां आए थे. आगे लेह तक के पूरे 9 दिनों के सफर के दौरान फोटोग्राफर टिम इस परिवार के साथ रहे और उन्होंने अपनी तस्वीरों के जरिए एक मां के हौसले की इस अनोखी दास्तान से दुनिया को परिचित कराया. 

 

टिम कहते हैं, “जब मैं इस परिवार और इसके छोटे बच्चों, जिनमें से एक तो नवजात शिशु था, से मिला तो मैं हैरान रह गया. हड्डियों को चीर देने वाली ठंड और हर पल जान के खतरे के बावजूद इस परिवार के हर सदस्य के चेहरे पर मुस्कान थी.”

 

फोटोग्राफर टिम ने लिखा है कि मेरे लिए ये बिल्कुल अनोखी बात है, पश्चिमी दुनिया में यहां तक कि भारत के आधुनिक शहरों में भी लोग बच्चे के जन्म जैसी मेडिकल अर्जेंसी के लिए कितनी सहजता से अस्पताल की शानदार देखभाल और दूसरी मदद ले लेते हैं. लेकिन जब मैं इस छोटे बच्चे और नवजात शिशु को देखता हूं तो सोंच में पड़ जाता हूं कि इन्होंने कितना खतरा उठाया, कितनी जबरदस्त ठंड सही. ये और कर भी क्या सकते थे? लेह के रास्ते में मैंने इस परिवार के साथ कई ग्लेशियर पार किए, जमी हुई नदियों पर चला और बर्फीले पहाड़ों के संकरे खतरनाक दर्रों को पार किया. परिवार की इस मां ने भी ये सब किया, बस अपने बच्चे को सुरक्षित जन्म देने के लिए.

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Web Title: जब एक भारतीय मां की हिम्मत ने हिमालय को भी झुका दिया
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