जब सुरक्षाकर्मी मारे जाते हैं तब क्या लोकतंत्र ख़तरे में नहीं पड़ता?

By: | Last Updated: Friday, 28 February 2014 1:11 PM
जब सुरक्षाकर्मी मारे जाते हैं तब क्या लोकतंत्र ख़तरे में नहीं पड़ता?

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा ज़िले में हुई नक्सलियों की गोलीबारी के तेज धमाकों ने कांग्रेस और मोदी के बीच फंसे देश को मानो नींद से जगा दिया है. खुद को माओवादी कहने वाले आतंकवादियों ने घात लगाकर 7 पुलिसकर्मियों को मार डाला है. बेवजह की इस हिंसा में मारे गए इन पुलिसकर्मियों की चीखें गूंज रही हैं. कुछ महीने पहले छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में माओवादियों ने घात लगाकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल को मार गिराया था. उस वक्त राष्ट्रीय स्तर पर जुमला उछाला गया था कि लोकतंत्र खतरे में है. शहीदों के परिजन अब सवाल पूछ रहे हैं कि नेता मारे गए तो लोकतंत्र याद आया लेकिन जब सुरक्षाकर्मी मारे जाते हैं तब क्या लोकतंत्र ख़तरे में नहीं पड़ता?

 

इस साल गणतंत्र दिवस समारोह की शुरुआत एक नक्सली हमले में शहीद के पिता को सम्मानित करने से हुई थी. राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी से कुछ कदमों की दूरी पर शहीद के पिता सूनी आंखों और हलचल भरे दिल के साथ खड़े थे और उनके बीच की खामोशी को तोड़ती एक उद्घोषणा वहां लगे स्पीकर्स पर गूंज रही थी. इस उद्घोषणा में वाचिका ने बताया कि 16 अप्रैल 2013 को आंध्र प्रदेश के नक्सल विरोधी बल ग्रेहाउंड्स की एक टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे उपनिरीक्षक के. प्रसाद बाबू ने किस तरह नक्सलवादियों के जबरदस्त हमले का अकेले सामना किया और भयंकर गोलीबारी के बीच खुद की कुर्बानी देकर किस तरह अपने टुकड़ी के सभी जवानों को उन्हें बचाने आए हेलीकॉप्टर पर चढ़ने और वहां से निकल जाने का मौका दिया. माओवादियों से लड़ने में अद्म्य साहस, कर्तव्य के प्रति असाधारण समर्पण और अनुकरणीय नेतृत्व का परिचय देते हुए सर्वोच्च बलिदान देने पर के. प्रसाद बाबू को मरणोपरांत वीरता पुरस्कार अशोक चक्र से सम्मानित किया गया. बेटे की जगह उनके पिता ने राष्ट्रपति से ये सम्मान ग्रहण किया. लाख संभालने के बावजूद प्रसाद बाबू के पिता की आंखें डबडबा आईं और दर्शकों में बैठी उनकी मां तो फफक कर रोने लगीं.

 

तारीखें बदलीं, महीने गुजरे लेकिन 26 जनवरी का वो दृश्य मानो स्टिल हो गया है. सरकार एक छोर पर अपने कदमों को थामे किंकर्तव्यविमूढ़ सी खड़ी है और नक्सलियों के खूंखार हमले में जान गंवाने वाले जवान और उनके परिजन दूसरे छोर पर और नक्सली समस्या मानो ठोस बर्फ की तरह बीच में जमी हुई है. नक्सली समस्या पर अब न तो अखबारों में कॉलम लिखे जाते हैं और न ही कोई विदेशी पुरस्कार प्राप्त सामाजिक नेता इसके हल के लिए पहल करता है. न तो लीक से हटकर सामाजिक बदलाव की बातें करने वाले अन्ना हजारे नक्सल समस्या पर धरना देते हैं और न ही भ्रष्टाचार के युद्धवीरों से सजी आमआदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल के लिए ये कोई मुद्दा है. मीडिया के लिए नक्सल समस्या बस कुछ सेकेंड्स की हेडलाइन है. मोदी के लिए देश में बस एक एजेंडा है- कांग्रेस और इसी तरह देश की सरकार चलाने वाली कांग्रेस का भी बस एक ही निशाना है मोदी. हैरानी नहीं कि इस चुनावी मौसम में नक्सल समस्या का समाधान किसी भी प्रमुख राजनीतिक पार्टी की प्राथमिकता में नहीं है.

 

नक्सलबाड़ी में 1967 में शुरु होने के बाद से नक्सल आंदोलन ने बहुत सारे उतार-चढ़ाव देखे हैं. पहले आदिवासी से कहीं ज्यादा गैर आदिवासी इस आंदोलन से जुड़े हुए थे, लेकिन धीरे-धीरे नक्सलवाद सघन जंगल वाले इलाकों में सिमटता चला जा रहा है. पिछले कुछ सालों से नक्सली सरकार को खुली चुनौती दे रहे हैं. पश्चिम बंगाल से लेकर महाराष्ट्र तक उनकी गतिविधियां लगातार चल रही हैं. खुद देश के वर्तमान गृह सचिव यह मान चुके हैं कि देश में कुछ इलाके ऐसे हैं जहां सिर्फ नक्सलियों का ही राज है. ये इलाके सरकार की पहुंच से बाहर हैं. गृह मंत्रालय की जानकारी के मुताबिक, एक दर्जन राज्यों में नक्सली सक्रिय हैं. इस वक्त महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, यूपी, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश नक्सलवाद से प्रभावित हैं.

 

आंकड़े बताते हैं कि नक्सली हिंसा से सबसे ज्यादा नुक़सान  आदिवासियों को ही हुआ. कभी वो नक्सलियों के हाथों मारे गए तो कभी सुरक्षा बलों या एसपीओ के हाथों. आदिवासी गहरे जंगल में जहां रहते हैं पुलिस और सुरक्षाबल वहां जाने की हिम्मत ही नहीं करते, फिर स्थानीय नेता या अधिकारी की तो बिसात ही क्या? व्यवस्था कुछ इस कदर लुंज-पुंज है कि एक तरह से आदिवासियों को नक्सलियों के रहमो-करम पर ही छोड़ दिया गया है. दवाई जैसी साधारण चीज के लिए भी आदिवासी नक्सलियों के ही मोहताज हैं. इन हालात में असंगठित आदिवासियों के सामने नक्सलियों के सामने झुकने के अलावा कोई दूसरा विकल्प ही नहीं है.

 

नक्सल प्रभावित हर ज़िले को केंद्र और राज्य सरकार इतना पैसा देती है कि अगर उसे पूरी तरह खर्च किया जाए तो ज़िलों की तस्वीर बदल जाए. लेकिन इतने पैसों के बावजूद बस्तर के लोग बिना बिजली और शौचालय के रहते हैं.  नक्सली हमेशा से कहते आ रहे हैं कि उन्हें स्थानीय जनता का समर्थन प्राप्त है. लेकिन सच ये है कि डरे हुए आदिवासियों के सामने नक्सलियों का समर्थन करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प ही नहीं है.  गरीब आदिवासी नक्सली-ठेकेदार-नौकरशाह और नेताओं की चौकड़ी के शिकार हैं.

 

नक्सल समर्थक नारा देते हैं कि जब अन्याय और शोषण हद से गुजर जाता है तो नक्सली पैदा होते हैं. शायद इसमें सच्चाई भी हो. लेकिन क्या इन समर्थकों को ये भी नहीं नजर आता कि नक्सली देश को एकजुट रखने वाले परंपरागत धागों को दीमक की तरह चाट रहे हैं. सरकार बेबस सी नजर आ रही है और नक्सली हमारे जवानों का खून बहा रहे हैं.

 

नक्सली समस्या का समाधान तो दूर सरकार के स्तर पर भी नक्सलियों को लेकर एक अस्वाभाविक भी नरमी है. सरकारी स्तर पर नक्सल समस्या को लेकर कोई नीति ही नहीं है. वोटों की राजनीति का दबाव इस कदर है कि ज्यादातर प्रमुख राजनीतिक दल भी नक्सलियों को आतंकवादी नहीं मानते.

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