जहां बहता है कच्चे शराब का दरिया

जहां बहता है कच्चे शराब का दरिया

By: | Updated: 26 Apr 2014 06:58 AM

खीरीः उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के गांजरी इलाके में शारदा व घाघरा नदियां ही नहीं, कच्चे शराब का दरिया भी बहता है. कच्ची शराब के उत्पादन और बिक्री में तहसील धौरहरा अव्वल है. इसके तीनों ब्लाकों ईसानगर, धौरहरा व रमियाबेहड़ की एक भी ग्राम पंचायत ऐसी नहीं है जहां ये शराब बनती और बिकती न हो.

 

कुटीर उद्योग के रूप में पांव पसार चुके इस कारोबार में स्थानीय पुलिस की हिस्सेदारी रहती है. यही वजह है कि शासन-प्रशासन के निर्देशों का कोई असर नहीं होता.

 

कस्बा धौरहरा व ईसानगर में ही जहां थाना है, कच्ची दारू बेचने के कई अड्डे खुलेआम चल रहे हैं. जिन पर प्रतिदिन हजारों रुपयों का कारोबार होता है. इस धंधे का संचालन पहले पुरुष ही करते थे, लेकिन अब इसमें महिलाएं भी उतर आई हैं और वे पुरुषों को पछाड़ रही हैं. थाना कोतवाली धौरहरा क्षेत्र के ग्राम जुगनूपुर, बबुरी, अमेठी, बसंतापुर, नरैनाबाबा, सुजानपुर, कफारा जैसे गांवों में दारू का निर्माण व बिक्री धड़ल्ले से होती है.

 

इस मामले में थाना ईसानगर क्षेत्र भी किसी तरह से पीछे नहीं है. ईसानगर, चिंतापुरवा, लोधपुरवा, वीरसिंहपुर, रामलोठ, ठकुरनपुरवा, रायपुर, डेबर, दुगार्पुर, पड़री, हसनपुर कटौली, अदलीसपुर, मूसेपुर, वेलागढ़ी, कैरातीपुरवा, मिजार्पुर, जगदीशपुर आदि सौ से ज्यादा गांवों में कच्ची दारू का कारबोर चल रहा है. इस अवैध उद्योग के उद्यमियों की संख्या निरंतर बढ़ती ही जा रही है.

 

कच्ची दारू के कुटीर उद्योग के रूप में पनपने के कई कारण हैं. पहला कारण है कम लागत में भारी मुनाफा का होना. दूसरा, इस धंधे में प्रयुक्त की जाने वाली कच्ची सामग्री क्षेत्र में आसानी से उपलब्ध है. तीसरा, आबकारी व पुलिस विभाग की कमाऊ-खाऊ नीति के चलते उनके द्वारा इस अवैध उद्योग पर नियंत्रण के लिए प्रभावी कदम न उठाया जाना.

 

गन्ने की खेती वाला क्षेत्र होने के कारण शराब को बनाने के लिए जिस गुड़ या शीरे की जरूरत होती है, वह यहां आसानी से मिल जाती है. कच्ची दारू सरकारी ठेकों पर बिकने वाली देसी शराब के मुकाबले काफी सस्ती होती है. इसकी उपलब्धता भी हर गांव व पुरई पुरवा में है.

 

त्योहारों और चुनावों के समय कच्ची दारू की मांग बहुत ज्यादा बढ़ जाती है. यह गैरकानूनी धंधा क्षेत्र के हजारों परिवारों की रोजी-रोटी का जरिया बन गया है और पुलिस के लिए ऊपरी कमाई का जरिया भी. बताया जाता है कि क्षेत्र के छोटे नेताओं व प्रधानों को यह दारू मुफ्त में या खास रियायती कीमत पर मिल जाती है. इसके बदले वे कच्ची दारू के उत्पादकों को संरक्षण देते हैं.

 

कच्ची दारू निमार्ताओं व विक्रेताओं पर पुलिस तभी शिकंजा कसती है, जब ऊपर से अधिकारी ज्यादा सख्ती करते हैं. पुलिस कुछ भट्ठियां व शराब पकड़ कर चंद लोगों को जेल भेज देते हैं जो जमानत कराकर फिर वही धंधा शुरू कर देते हैं.

 

खीरी के आबकारी अधिकारी एस.एन. दुबे का कहना है कि किन गांवों में कच्ची शराब का धंधा हो रहा है, यह पता चलते ही आबकारी टीम छापा मारकर उचित कार्रवाई करती है.

 

धौरहरा के कोतवाल नंद जी यादव का कहना है, "कुछ गांवों में लोग कच्ची शराब का धंधा करते हैं. जैसे ही ऐसे लोगों के बारे में पता चलता है इन लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाती है. अभी तो सारी फोर्स चुनाव ड्यूटी में लगी है, चुनाव के बाद कार्रवाई जरूर की जाएगी."

 

ईशानगर के एसओ आर.के. सिंह का कहना है कि उन्हें इस इलाके में हो रहे अवैध शराब के धंधे के बारे में जानकारी नहीं है.

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