डीएमके ने यूपीए सरकार से समर्थन वापस लिया

By: | Last Updated: Tuesday, 19 March 2013 12:20 AM
डीएमके ने यूपीए सरकार से समर्थन वापस लिया

चेन्‍नई/नई
दिल्‍ली:
श्रीलंकाई तमिलों
के मुद्दे पर सरकार के अहम
सहयोगी डीएमके प्रमुख
करुणानिधि ने यूपीए सरकार से
समर्थन वापस ले लिया है.
डीएमके के कुल 18 सांसद हैं.
फिलहाल सरकार को खतरा नहीं
है.

चेन्नई में आज डीएमके
अध्यक्ष करुणानिधि ने
समर्थन वापसी का ऐलान किया.
करुणानिधि ने कहा है कि
केंद्र सरकार में उनकी
पार्टी के मंत्री बुधवार शाम
तक अपना इस्तीफा दे देंगे.

तमिलनाडु के पूर्व
मुख्यमंत्री और डीएमके के
अध्यक्ष एम. करुणानिधि ने
कहा, ‘इस सरकार में शामिल रहना
श्रीलंकाई तमिलों के साथ
अन्याय होगा.’

इसी के साथ करूणानिधि ने यह
भी कहा कि अगर सरकार
श्रीलंकाई तमिलों के मुद्दे
पर सरकार 21 मार्च से पहले
संयुक्‍त राष्‍ट्र
मानवाधिकार परिषद
(यूएनएचसीआर) के प्रस्ताव में
संशोधन तैयार कर ले तो समर्थन
वापसी के फैसले पर दोबारा
विचार कर सकते हैं.

करुणानिधि यूएनएचसीआर में
श्रीलंका पर अमेरिकी
प्रस्ताव में संशोधन कराने
के लिए कदम उठाने की मांग कर
रहे हैं.

वे चाहते हैं कि प्रस्ताव में
इस बात की घोषणा की जाए कि
श्रीलंका की सेना ने तमिलों
का ‘नरसंहार’ तथा उनके खिलाफ
‘युद्ध अपराध’ किए थे. साथ ही
वे श्रीलंका में तमिलों के
खिलाफ कथित अत्याचार की
अंतर्राष्ट्रीय जांच कराने
की मांग कर रहे हैं. इस मामले
पर अमेरिका 21 मार्च को
प्रस्ताव लाएगा और अमेरिकी
प्रस्ताव पर 22 मार्च को
वोटिंग होनी है.

करुणानिधि सरकार से जो चाहते
हैं उसमें कई अड़चनें हैं.
यूएनएचआरसी के प्रस्ताव पर
भारत के संशोधन पेश करने की
डेडलाइन सोमवार को निकल चुकी
है, लेकिन प्रस्ताव देने वाला
अमेरिका संशोधन पेश कर सकता
है.

सूत्र बता रहे हैं कि बीच का
रास्ता निकालने के लिए भारत
अमेरिका के संपर्क में है.
यानी भारत करुणानिधि की मांग
मनवाने के लिए अमेरिका पर
निर्भर है.

इसके अलावा डीएमके प्रमुख
करुणानिधि चाहते हैं कि
सरकार श्रीलंकाई तमिलों पर
संसद में प्रस्ताव लाए और इसे
पास कराए. सूत्रों के मुताबिक
सरकार श्रीलंका तमिलों के
मुद्दे पर प्रस्ताव लाने को
तैयार है, लेकिन सरकार ये भी
चाहती है कि स्पीकर की तरफ से
ये प्रस्ताव लाया जाए और संसद
के दोनों सदनों सर्वसम्मति
से पास हो.

सरकार की मुसीबत ये भी है कि
श्रीलंका के खिलाफ भारतीय
संसद में प्रस्ताव पास कराना
किसी देश के आंतरिक मामलों
में दखल हो सकता है.

वित्त मंत्री पी चिदंबरम,
रक्षा मंत्री एके एंटनी और
स्‍वास्‍थ्‍य तथा परिवार
कल्‍याण मंत्री गुलाम नबी
आजाद सोमवार को करुणानिधि से
मिलने चेन्‍नई पहुंचे थे.
लेकिन तीनों ही नेता
करुणानिधी को मनाने में
नाकाम रहे.

गौरतलब है कि श्रीलंकाई
तमिलों पर अत्याचार के
मुद्दे पर तमिलनाडु में
पिछले कुछ दिनों से प्रदर्शन
हो रहे हैं.

सरकार पर
कितना खतरा?

डीएमके के
समर्थन वापसी के फैसले के
बावजूद यूपीए सरकार पर कोई
खतरा नहीं है. डीएमके के कुल 18
सांसद हैं.

डीएमके
को हटाने के बाद भी यूपीए के
पास 233 सांसद होते हैं जिनमें
203 कांग्रेस और बाकी एनसीपी
जैसे सहयोगी दलों के हैं.

यूपीए
सरकार को बाहर से समर्थन दे
रही समाजवादी पार्टी के 22,
बहुजन समाज पार्टी के 21,
आरजेडी के चार और जेडीएस के
तीन सांसदों को जोड़ दें तो
ये आंकड़ा 283 हो जाता है, जो
बहुमत के 272 के आंकड़े से कहीं
ज्यादा है.

जाहिर है अब
यूपीए सरकार को बहुमत के लिए
मुलायम सिंह और मायावती पर
ज्यादा निर्भर रहना पड़ेगा.

असमंजस
में क्यों सरकार?

यूपीए
सरकार को इस बात का डर है कि
अगर उसने अमेरिकी प्रस्ताव
में श्रीलंका के खिलाफ
संशोधन पेश किया तो आनेवाले
समय में पाकिस्तान और चीन
जैसे देश कश्मीर और
पूर्वोत्तर राज्यों के मसले
को इसी अंदाज में
अंतर्राष्ट्रीय मंच पर उठा
सकते हैं. इसके अलावा भारत
सरकार श्रीलंका की राजपक्षे
सरकार से अपने रिश्ते भी खराब
नहीं करना चाहती है.

सवाल
ये है कि करुणानिधि
श्रीलंकाई तमिलों के मुद्दे
को लेकर इतने गर्म क्यों हैं?
आखिर क्या वजह है कि वो
केंद्र सरकार से नाता तोड़ने
तक की धमकी दे रहे हैं?

करुणानिधि
की मजबूरी

डीएमके प्रमुख
करुणानिधि श्रीलंका की
महिंदा राजपक्षे सरकार के
खिलाफ कड़ी कार्रवाई के लिए
दबाव बना रहे हैं. इसकी एक वजह
ये है कि राजपक्षे सरकार पर
गंभीर आरोप है कि 2009 में आतंकी
संगठन लिट्टे के सफाए के
दौरान तमिलों का नरसंहार
किया गया.

इस मामले को
तमिलनाडु की मुख्यमंत्री और
एआईएडीएमके प्रमुख जयललिता
ने 2011 के विधानसभा चुनाव में
काफी जोरशोर से उठाया था.
जयललिता ने तो राजपक्षे को
युद्ध अपराधी तक कहा था और
आर्थिक पाबंदी की मांग की थी.
उस वक्त करुणानिधि की पार्टी
इस मुद्दे पर चुप रही थी और
चुनाव में बुरी तरह हार गई थी.

ऐसा
माना जा रहा है कि जयललिता को
श्रीलंकाई तमिलों के मुद्दे
का काफी चुनावी फायदा मिला
था. अब 2014 के लोकसभा चुनावों
में डीएमके इस मुद्दे को हाथ
से जाने नहीं देना चाहती थी
और तमिलनाडु के तमिलों का
ध्यान खींचने के लिए उसने
केंद्र सरकार पर दबाव बनाया

सरकार
की मजबूरी

करुणानिधि की
मांग थी कि केंद्र सरकार
संयुक्त राष्ट्र में
श्रीलंका के खिलाफ अमेरिकी
प्रस्ताव में संशोधन करवाए
और श्रीलंका सरकार के खिलाफ
कड़ी कार्रवाई के लिए दबाव
बनाए.

केंद्र सरकार की
मजबूरी ये है कि उसके महिंदा
राजपक्षे सरकार के साथ काफी
अच्छे रिश्ते हैं. भारत ने तो
युद्ध के बाद श्रीलंका की
संसद में पेश ‘लेसेंस लर्न्‍ट
एंड रिकॉ‍नसीलिएशन कमीशन
रिपोर्ट’ का भी स्वागत किया
था जिसमें राष्ट्रपति
महिंदा राजपक्षे को सही
ठहराया गया था.

इस
रिपोर्ट में युद्ध के बाद
शांति की कोशिशों के भी कई
सुझाव दिए गए थे जिसे भारत ने
सराहा था. ऐसे में केंद्र
सरकार काफी दुविधा में हैं.
हालांकि भारत ने
अंतर्राष्ट्रीय मंच पर ये
साफ जरूर किया है कि श्रीलंका
में मानवाधिकार हनन की
निष्पक्ष जांच होनी चाहिए.

सयुंक्त
राष्ट्र के मुताबिक युद्ध
में आतंकी संगठन लिट्टे के
साथ-साथ 40 हजार श्रीलंकाई
तमिल मारे गए थे. लिट्टे वही
संगठन है जिसका भारत के पूर्व
प्रधानमंत्री राजीव गांधी
की हत्या में हाथ था.

 संबंधित ख़बरें

आखिर
क्‍या है करुणानिधि की
मजबूरी?

करुणानिधि
को नहीं मना पाई सरकार

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